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ये मजहब नहीं दादगिरी है

Jul 8 • Samaj and the Society • 93 Views • No Comments

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इस खबर को दो तरीके पढ़ सकते है एक तो इस तरह कि पुरानी दिल्ली के चावड़ी बाजार क्षेत्र में एक स्कूटर खड़ा करने को लेकर हुए झगड़े ने सांप्रदायिक रंग ले लिया। विवाद खड़ा होने के बाद यहां असामाजिक तत्वों द्वारा एक धर्मस्थल में तोड़फोड़ की गई। दूसरा इस तरह कि आस मोहम्मद नाम का युवक एक इमारत के बाहर अपना स्कूटर खड़ा कर रहा था। इसे लेकर वहां रहने वाले संजीव गुप्ता ने आपत्ति जतायी उस समय आस मोहम्मद वहां से चला गया। लेकिन बाद में उसके साथ मुसलमानों की भीड़ आई और दुर्गा, शिव और राम दरबार समेत अन्य हिन्दू देवी-देवताओं की झांकियों वाले 100 साल पुराने मंदिर में तोड़-फोड़ की जिस तरह वीडियो फुटेज में दंगाई इस्लाम समर्थित नारे लगा रहे थे उसे देखकर यही लग रहा था जैसे भीड़ किसी बड़ी हिंसा के लिए सडक पर उतरी हो! हालाँकि थोड़े दिन पहले ही दिल्ली के जगतपुरी इलाके में झूठी अफवाह के बाद नमाजियों ने डीटीसी की बसों में जिस तरह तोड़-फोड़ की थी वह नजारा भी पूरे देश ने देखा था।

 पिछले कुछ समय से पश्चिम बंगाल के मालदा, धुलागढ़, बशीरहाट और अब दिल्ली क्या देश का मुस्लिम यही चाहता है कि हर चीज सड़क पर निबटाई जाये? एक तरफ रोजाना ये बयान आना की देश का अल्पसंख्यक मुस्लिम डरा हुआ है दूसरी तरफ इस तरह की हिंसा की खबर आना क्या मुस्लिम समुदाय इस तरह के बयानों के आड़ में अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है? चांदनी चौक में मंदिर में तोड़फोड़ इसलिए हुई क्योंकि आस मोहम्मद को संजीव गुप्ता ने अपनी ईमारत के नीचे स्कूटर खड़ा नहीं करने दिया। यदि आस मोहम्मद को कोई इरफान या हबीब अपनी ईमारत के नीचे स्कूटर खड़ा करने से रोक देता तो क्या फिर ये भारी भरकम भीड़ किसी मस्जिद में तोड़फोड़ करने जाती?

 प्रश्न का उत्तर साफ है कि मुगलकाल से लेकर अभी तक धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने में उपद्रवी मुसलमानों की भीड़ ही हमलावर रही है। मुगलकाल में जो हुआ उसपर आज दुःख मनाना समय गवाना है किन्तु आज जिस तरह विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र की राजधानी में नारा एक तकबीर लगाकर मंदिर तोड़ दिया गया तो सोचो सैंकड़ों साल पहले क्या उधम मचाया होगा। दिल्ली की घटना गुस्सा और नफरत बयाँ कर रही थी इस घटना के गंगा जमुनी तहजीब का पाठ पढ़ाने वाले दिखाई नहीं दे रहे है। समस्त कथित सेकुलर तबका खामोश है। यदि किसी कारण मामला इसके विपरीत होता तो इसकी गूंज समस्त विश्व के अखबारों में सुनाई देती।

 इस घटना के बाद साल 2016 की बांग्लादेश की वह घटना जेहन में ताजा हो उठी जब बाग्लादेश में फेसबुक पर एक आपत्तिजनक पोस्ट किए जाने के बाद बांग्लादेश के ब्राह्मणबरिया जिले के नासिरनगर में उपद्रवियों ने हिंदू समुदाय के 20 से ज्यादा घरों को आग लगा दी थी और 15 मंदिरों को निशाना बनाकर लूटपाट और तोड़फोड़ की थी। तब यह खबर इस तरीके से कहकर खारिज की थी कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं की संपत्तियों पर इस तरह के हमले कोई नई बात नहीं हैं, ये तो होता रहता है। भारत में भी राजनैतिक शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति वोट के लालच में ऐसी घटनाओं को दबाने की कोशिश करती है। ये अफसोस की बात है 2019 में भी आकर इस्लाम को औरंगजेब और गजनवी के चश्मे से ही देखा जा रहा है।

 हर जगह बवाल की शुरुआत से लेकर अंजाम तक एक जैसा है, तोड़फोड़ और हिंसा करने वाले और उसके शिकार भी सभी शहरों में एक जैसे ही हैं। कहने का मतलब ये है कि इस तरह की हिंसा और आगजनी बिना सुनियोजित, संगठित और नियंत्रित हुए मुमकिन नहीं है। इन घटनाओं के जरिए अन्य समुदायों में डर पैदा किया जा रहा है। मुस्लिम बाहुल आबादी वाले क्षेत्रों से हिन्दू समेत अन्य समुदायों के लोगों के पलायन की खबरें हर रोज आ रही है। यह नफरत का एक राजनितिक कदम है, लेकिन इसे मिलने वाले धार्मिक समर्थन के दायरे को बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। अन्य मतों ख़िलाफ नफरत को ज्यादा से ज्यादा समर्थन पाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसी किसी सांप्रदायिक घटना को राजनितिक संरक्षण मिल रहा है। यानि कोशिश है कि बिना कोई आतंकी घटना घटे ही आतंक पैदा कर दिया जाए। दूसरे समुदाय को इतना झुकाया जाए कि बिल्कुल बेबस हो जाए।

 पिछले कुछ समय पहले ताबिश सिद्दीकी ने ठीक लिखा था कि अगर आप मुसलमान हैं और आपको मेरी बात बुरी लग रही है तो जान लीजिये कि आप पूरी तरह से अरबी दादागिरी की गिरफ्त में हैं। ये सब धर्म नहीं है। ये राजनीति है और शुद्ध राजनीति. अरबों का इस्लाम, धर्म नहीं है। मस्जिदों में दूसरे समुदायों को बद्दुआ देना मजहब नहीं है। मजहब का नाम लेकर सहारनपुर में दूसरे समुदाय दुकाने लूट लेना उन्हें जला देना मजहब नहीं है। ये शुद्ध राजनैतिक दादागिरी है और आपके धर्म का ढांचा कुछ नहीं अब सिर्फ राजनीति है। बस गड़बड़ ये हुई कि आपकी इस दादागिरी को शुरू से लोगों ने अब तक सहा है। तो आपको ये अपने धर्म का हिस्सा लगने लगा है।

 इराक और सीरिया में इसी मजहब का नाम लेकर दूसरे समुदायों की मासूम बेटियां उठा ली जाती है। बांग्लादेश में इस मजहब का नाम लेकर सरेआम लेखकों को मार दिया जाता है। पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम न जाने कितने लोगों को मार दिया गया है। और यहां चूंकि आपका बस नहीं चल रहा है तो आप दुकानें जला के, मंदिर तोड़ के, दूसरे समुदायों की बेटियों को प्रेम जाल में फंसा के काम चला ले रहे हैं? दिन पर दिन ये बीमारी बढ़ रही है क्योंकि सारी दुनिया ने इसे स्वीकार कर लिया। ये आक्रामक बने रहे और लोग इसे स्वीकार करते रहे। ये मजहब है कि सारी दुनिया आपसे डरे? दादागिरी और मजहब में फर्क समझिये। जल्दी समझिये क्योंकि दुनिया का भरोसा और सब्र अब टूट रहा है।

राजीव चौधरी

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