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नसबंदी जरुरी है पर किसकी ..?

अगर किसी कारण केंद्र की मोदी सरकार जनसंख्या नियंत्रण कानून कानून ले आये तो उसका विरोध सबसे पहले विपक्षी शासित राज्यों में होगा और सीएए की तरह उस कानून को लागू करने से मना करेंगे। किन्तु आजकल मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार ने नसबंदी को लेकर नया फरमान जारी किया है। कमलनाथ ने नसबंदी को लेकर स्वास्थ कर्मचारियों को टारगेट दिया है। सरकार ने कर्मचारियों के लिए हर महीने 5 से 10 पुरुषों के नसंबदी ऑपरेशन करवाना अनिवार्य कर दिया है. अगर कर्मचारी नसबंदी नहीं करा पाते हैं तो उनको नो-वर्क, नो-पे के आधार पर वेतन नहीं दिया जाएगा।

यानि मध्यप्रदेश में नशबंदी सुचारू रूप से चलनी चाहिए ये नशबंदी किसकी होगी कौन इसमें शामिल होगा आप बखूबी जानते है। क्योंकि अल्पसंख्यक समुदाय की तो हरगिज नहीं होगी क्योंकि उनके यहाँ क्वांटिटी को खुदा की देन कहा जाता है और भला वोट बेंक के लिए खुदा देन में कमलनाथ कैसे हाथ अड़ा सकते है।

हालाँकि जब-जब नशबंदी का जिक्र आता है तो सबसे पहले जेहन में संजय गाँधी का नाम उभरकर आता है। क्योंकि आपातकाल के दौरान जिस संजय गांधी ने जोर-शोर से नसबंदी अभियान चलाया था वह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के दोस्त थे। लेकिन कमलनाथ के उलट थे संजय गांधी ने फैसला किया था कि यह काम देश की राजधानी दिल्ली से शुरू होना चाहिए और वह भी पुरानी दिल्ली से जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है वहां से शुरू किया गया उन दिनों नसबंदी को लेकर कई तरह की भ्रांतियां थीं। मुस्लिम समुदाय के बीच तो यह भी धारणा थी कि यह उसकी आबादी घटाने की साजिश है।

लेकिन इसके उलट संजय गांधी का मानना था कि अगर वे मुस्लिम समुदाय के बीच नसबंदी कार्यक्रम को सफल बना पाए तो देश भर में एक कड़ा संदेश जाएगा। शुरुआत में लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें जमीनें भी दी गईं। लेकिन फिर वह घटते-घटते पांच किलो घी और एक घड़ी पर आ गया। ऐसे भी लोग थे जिन्हें नसबंदी करवाने पर जमीन देने का वादा तो किया गया था लेकिन मिली नहीं। शुरू में तो नसबंदी रजामंदी से की जानी थी लेकिन बाद में यह क्रूरतापूर्वक की जाने लगी।

इस पर जोर इतना ज्यादा था कि कई जगह पुलिस द्वारा गांवों को घेरने और फिर पुरुषों को जबरन खींचकर उनकी नसबंदी करने की भी खबरें आईं थी। कुछ लोग तो ये भी कहते है कि इस अभियान में करीब जो सरकारी आंकड़े है वो 40 लाख है अनेकों जानकर इसमें 60 लाख लोगों की नसबंदी बताते है। जिनमें 60 फीसदी मुसलमान थे जिनमें गलत ऑपरेशनों से करीब दो हजार लोगों की मौत भी हुई थी।

हालाँकि संजय जैसा एक अभियान 1933 में जर्मनी में भी चलाया गया था। हिटलर द्वारा इस अभियान में करीब चार लाख लोगों की नसबंदी कर दी गई थी। असल में संजय गांधी के सिर पर नसबंदी का ऐसा जुनून क्यों सवार हो गया था कि वे इस मामले में हिटलर से भी 15 गुना आगे निकल गए थे? दरअसल ऐसा कई चीजें एक मोड़ पर मिलने से मुमकिन हुआ था। एक तो संजय की कम से कम समय में खुद को प्रभावी नेता के तौर पर साबित करने की महत्वाकांक्षा थी और दूसरा आपातकाल के दौरान मिली निरंकुश शक्ति हाथ लग गयी थी।

असल में 25 जून 1975 को देश के ऊपर आपातकाल थोप दिया गया था विपक्ष के सभी नेता एक एक कर गिरफ्तार किये गये और जेल में ठूस दिए गये थे। क्योंकि आपातकाल लगने के बाद ही राजनीति में आए संजय गांधी के बारे में यह साफ हो गया था कि आगे गांधी-नेहरू परिवार की विरासत वही संभालेंगे।

आपातकाल शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों का एक गुट भारत में जोरशोर से नसबंदी कार्यक्रम लागू करने की वकालत करने लगा। इंदिरा गांधी ने यह बात मान ली। यह उनकी मजबूरी भी थी क्योंकि वे खुद कुछ ऐसा करना चाह रही थीं जिससे लोगों का ध्यान उस आपातकाल और अदालती मामले से भटकाया जा सके। जिससे उनकी किरकिरी हो रही थी। उन्होंने संजय गांधी को नसबंदी कार्यक्रम लागू करने की जिम्मेदारी सौंप दी जो मानो इसका इंतजार ही कर रहे थे।

इसके बाद कुछ महीनों तक इतने बड़े कार्यक्रम के लिए कामचलाऊ व्यवस्था खड़ी करने का काम हुआ। यही वजह है कि उन्होंने आपातकाल के दौरान मिली निरंकुश ताकत का इस्तेमाल करते हुए यह अभियान शुरू कर दिया। अधिकारियों को महीने के हिसाब से टारगेट दिए गए और उनकी रोज समीक्षा होने लगी।

संजय इस फैसले को युद्ध स्तर पर लागू कराना चाहते थे. सभी सरकारी महकमों को साफ आदेश था कि नसंबदी के लिए तय लक्ष्य को वह वक्त पर पूरा करें, नहीं तो तनख्वाह रोककर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इस काम की रिपोर्ट सीधे मुख्यमंत्री दफ्तर को भेजने तक के निर्देश दिए गए थे। साथ ही अभियान से जुड़ी हर बड़ी अपडेट पर संजय गांधी खुद नजरें गड़ाए हुए थे। ऐसी सख्ती से लेट-लतीफ कही जाने वाली नौकरशाही के होश उड़ गए और सभी को अपनी नौकरी बचाने की पड़ी थी।

वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता अपनी किताब द संजय स्टोरी में लिखते हैं,  संजय का यह दांव बैक फायर कर गया और 1977 में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनने के पीछे नसबंदी के फैसले को भी एक बड़ी वजह माना गया। 21 महीने बाद जब आपातकाल खत्म हुआ तो सरकार के इसी फैसले की आलोचना सबसे ज्यादा हुई। बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी ने तो नसबंदी की आलोचना में एक कविता तक लिखी थी। इस कविता के बोल थे, आओ मर्दो, नामर्द बनो। संजय गांधी का यह अभियान आपातकाल का सबसे दमनकारी अभियान साबित हुआ और आजतक इस अभियान के नाम से लोग सिहर जाते हैं। अब कमलनाथ का अभियान देखते है कितना कारगर होगा अपने दोस्त जैसा हाल होगा या उससे आगे निकल जायेंगे। लेकिन नसबंदी कराने से पहले 2011 की जनगणना के आंकड़े उठाकर जरुर देख ले कि आबादी किसकी बढ़ रही है और नशबंदी पहले किसकी जरुरी है।

विनय आर्य

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