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अहंकार : अभिमान क्या है

Jul 31 • Arya Samaj • 237 Views • No Comments

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संसार में लोगों की अनगिनत इच्छायें होती हैं और उनकी पूर्ति के लिए व्यक्ति जीवनभर प्रयत्नशील रहता है । जब इन इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है और व्यक्ति जब उन योग्यता आदि से युक्त हो जाता है तब व्यक्ति के अन्दर अभिमान उत्पन्न हो जाता है, इसी अभिमान को ही अहंकार कहा जाता है ।

अहंकार एक पदार्थ का नाम भी है जिसे ईश्वर ने हम सब जीवात्माओं के लिए इस सृष्टि के निर्माण के समय बनाया है । सांख्य दर्शन के अनुसार ईश्वर जब सत्व-रज-तम रूप मूल-प्रकृति से सृष्टि की रचना करता है तो पहली वस्तु महतत्व अर्थात् बुद्धि नमक तत्व को बनाता है जिसके माध्यम से हम किसी भी विषय में निर्णय करते हैं । उसके पश्चात् इस अहंकार नामक वस्तु का निर्माण करता है जिसके माध्यम से हम अपने आपको अनुभव करते हैं । यदि ईश्वर यह अहंकार ही बनाकर न दे तो हम इतना भी जान नहीं सकते कि, – “मैं हूँ” । अपने आप को जानने का यह एक साधन मात्र है ।

इस साधन के अतिरिक्त अहंकार एक और ऐसी वस्तु है जब व्यक्ति मिथ्याभिमान के कारण यह कहता है कि “मैं ही हूँ” । जिसको हम अभिमान, घमण्ड, गर्व और अहंकार आदि शब्दों से कहते या व्यवहार करते हैं ।

अहंकार का मुख्य कारण है अविद्या, अज्ञानता । वास्तव में हमें अपने स्वरुप के विषय में अज्ञानता रहती है और अपने आप के प्रति व्यक्ति अधिक आसक्त हो जाता है, कुछ भी भौतिक उन्नति कर लेता है तो उसको व्यक्ति अपने साथ जोड़ लेता है और उसको अपना ही स्वरुप वा स्वभाव मान लेता है । यदि किसी के पास क्रोध और अहंकार (अभिमान) है तो उसको किसी दूसरे शत्रुओं की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यही उस व्यक्ति को समूल नाश करने के लिए पर्याप्त हैं । क्योंकि किसी ने कहा भी है कि “घमण्ड न करना जिंदगी में तक़दीर बदलती रहती है, शीशा वही रहता है बस तस्वीर बदलती रहती है ।

यदि हम एक प्याज के बारे में विचार करते हैं तो, जब हम उसे छीलते हैं, तो उसमें से एक के बाद एक परत निकलती जाती है, क्योंकि उसके अंदर कोई गूदा ही नहीं होता है। इससे पृथक उसका अपना कोई अलग स्वरुप होता ही नहीं है, इस प्रकार जीवात्मा का जो कुछ भी अर्जित किया हुआ है वह सबकुछ उसके अपने स्वरुप से अलग ही है और सदा अलग ही रहेगा, वह सब कुछ कभी भी उसका अपना हो ही नहीं सकता । जिस पर हम घमण्ड करते या अहंकार महसूस करते हैं, अर्थात् हम उन उपलब्धियों से, योग्यताओं से, सफलताओं से अपने आपको जुड़ा हुआ मानते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के पास अपने-अपने क्षेत्र में काम, सफलता, परिवार या प्रसिद्धि, पद-प्रतिष्ठा, धन-संपत्ति, मान-सम्मान आदि से संबंधित मिथ्याभिमान, गर्व, घमण्ड या अहंकार होता है। अहंकार एक व्यक्ति या दूसरे व्यक्तियों के बीच अंतर पैदा करता है। प्रत्येक व्यक्ति बिना नाम और पहचान के ही पैदा होता है। वह भूल जाता है कि – वह मूल रूप से ईश्वर की ही एक रचना है और जो कुछ भी योग्यता प्राप्त की है वह सब इसी सृष्टि में ही ईश्वर की कृपा से प्राप्त की है।

व्यक्ति अहंकार से ग्रस्त क्यों होता ? उसके मुख्य कारण हैं मूर्ख व्यक्ति को अल्प ज्ञान की प्राप्ति हो जाना, अन्यायी-अधर्मी को शारीरिक बल और कंजूस व्यक्ति को धन-वैभव की प्राप्ति हो जाना । लेकिन जो व्यक्ति इन सब योग्यताओं, उपलब्धियों, सफलताओं को प्राप्त करते हुए भी, वैदिक योग्य गुरुओं के सानिध्य में रहकर आध्यात्मिक शुद्धज्ञान प्राप्त कर तदनुसार व्यवहार करता है और वैदिक शास्त्रों का अध्ययन, ईश्वर के प्रति समर्पण, ईश्वर के गुण तथा महिमा का स्मरण, मन्त्रों का जप करना तथा अपने से अधिक योग्य व्यक्तिओं को देखना आदि कार्य करता है, तो उसमें अहंकार बहुत कम होता है अथवा धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है । जो योगाभ्यासी होता है वह सबकुछ प्राप्त ज्ञान,बल, सामर्थ्य, योग्यता आदि का मूल स्रोत ईश्वर को ही स्वीकार करते हुए अपने वास्तविक स्वरुप को स्मरण करते हुए अभिमान को छोड़कर विनम्रता से युक्त हो जाता है वही व्यक्ति अहंकार से मुक्त हो जाता है ।

यदि हम में किसी विषय को लेकर अधिक अहंकार या अभिमान भरा हुआ है, तो उसी मिथ्या अहंकार के कारण कभी हमें अत्यधिक दु:ख और हानि का समाना भी करना पड़ता है। यदि किसी एक सुन्दर व्यक्ति या महिला की समय के साथ-साथ सुन्दरता नष्ट होती जाती है और वृद्धावस्था आती जाती है या बीमार हो जाती है तो वह उसे अपने अभिमान के कारण स्वीकार ही करना नहीं चाहता या चाहती और दु:खी हो जाते हैं । और इसी प्रकार अगर कोई धन-संपन्नता से युक्त व्यक्ति की अचानक किसी कारण वशात् ऐश्वर्य-सम्पन्नता नष्ट हो जाये तो वह उस स्थिति को सहन नहीं कर पाता और इसके लिए अत्यन्त दु:खी हो जाता है, क्योंकि उसने अपनी अहंकार से मिथ्या-मान्यता बना रखी है कि मैं ही सबसे संपन्न व्यक्ति हूँ और सदा ऐसा ही रहूँगा, कभी भी विपन्नता नहीं आएगी । कभी-कभी अहंकार की वजह से व्यक्ति को जो मानसिक दु:ख प्राप्त होता है वह शारीरिक कष्ट से भी कहीं ज्यादा असहनीय होता है।

यह अहंकार या अभिमान एक ऐसा दोष है कि बहुत सूक्ष्मभाव से भी व्यक्ति के अन्दर घर किया हुआ रहता है । जब व्यक्ति योगाभ्यास करते हुए ऊँची स्थिति को प्राप्त कर लेता है और अनेक प्रकार के दोषों को छोड़ देता है, शांत, सरल, विनम्र, इर्ष्या-द्वेष रहित, क्रोध-रहित बन जाता है तो भी उसको अभिमान हो जाता है कि हमने ऐसी ऊँची स्थिति को प्राप्त कर लिया है । अतः इस दोष को बहुत ही सूक्ष्मता से निरीक्षण करके ईश्वर की सहायता से सब संस्कारों को नष्ट करना होता है, उसके पश्चात् ही हम ईश्वर के आनन्द में मग्न होने के अधिकारी बन पाते हैं ।

लेख – आचार्य नवीन केवली

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