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आर्य महासम्मेलन देश और समाज लिए जरुरी क्यों..?

यह सर्वविदित है कि 19 वीं सदी के इतिहास को जितनी बार भी निचोड़ा जायेगा उतनी बार ही आर्य समाज के समर्पण और बलिदान की धारा बहकर सामने आएगी या ये कहें उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय इतिहास और साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखने वाले, देश और समाज पुनर्जीवित करने वाले आर्य समाज की गाथा के सामने सभी भारतीय आन्दोलनों की गाथा बोनी नजर आएगी. करीब 143 साल पहले भारत ही नहीं, विश्व क्षितिज पर ज्ञान के जिस आन्दोलन का आविर्भाव हुआ था. जिसके कारण भारत ही नहीं मारीशस, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम बर्मा जैसे देशों में एक सामाजिक, धार्मिक राजनितिक क्रांति का उदय हुआ था. आज की दुनिया उस आन्दोलन को आर्य समाज के नाम से जानती है. भारत को आत्मगौरव, और चरित्र निर्माण का संदेश देने वाले इस सामाजिक आन्दोलन की लड़ाई आज भी उसी वेग से जारी है.

आज से 70 साल पहले आर्य समाज के आन्दोलन के कारण देश को पूर्ण स्वतन्त्रता तो मिली किन्तु धर्म को कुरूतियों और विसंगतियों से पूर्ण स्वतन्त्रता अभी तक नहीं मिल पाई. कारण आर्य समाज के सिपाही एक कुरूति, अंधविश्वास को खंडित करते तो धर्म के पाखंडी दूसरी कुरूति और अंधविश्वास खड़ी कर देते थे. अंत में इन विसंगतियों से किस तरह एकजुट होकर लड़ा जाये तो आर्य समाज के पूर्व विद्वानों ने वैचारिक मंथन कर सन् 1927 में आर्य महासम्मेलन की नीव रखी थी. जिसके उपरांत समय-समय पर आर्य समाज अलग-अलग देशों और स्थानों पर कार्यकर्ताओं को एकत्र कर निरंतर देश और विदेशों में अपनी संस्कृति अपने वैदिक धर्म का प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य से आर्य महासम्मेलन आयोजित करता आ रहा है. इसी पावन कार्य को आगे बढ़ाते हुए एक बार फिर सार्वदेशिक सभा और दिल्ली सभा सामूहिक प्रयास से इस वर्ष 25 से 28 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन दिल्ली में होने जा रहा है.

बात केवल पाखंड और अंधविश्वास तक सीमित रहती तो शायद महासम्मेलन की उतनी आवश्यकता नहीं होती अंतरंग सभाओं में चर्चा कर इससे लड़ने की बात की जा सकती थी लेकिन आज तो चारों ओर अपने धर्म और संस्कृति के विरुद्ध एक षड्यंत्र सा रचा जा रहा है. किशोर-शिक्षा के नाम पर एक अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय चल पड़ा है, जो यौन-रोगों को रोकने के नाम पर भारत में ऐसी शिक्षा परोसी जा रही है मानो बच्चों को यौन-संबंध तो बनाना ही है. बस, जरा ‘सुरक्षित’ बनाएं. आखिर इस मान्यता का आधार क्या है यही कि किशोर बच्चे यौन-संबंध के बिना नहीं रह सकते? यह स्थिति पश्चिमी संस्कृति में हो सकती है, जो ब्रह्मचर्य चेतना से अपरिचित है. हमारे यहाँ तो ऋषि मुनि इन सब बिमारियों से बचने के लिए ब्रह्मचर्य जैसी ठोस मजबूत चेतना से परिचित करा गये हैं.

दूसरा आज हमारे सामने हमारे बौद्धिक जीवन में नया युद्ध खड़ा कर दिया गया है अपनी मूलभूत शिक्षाओं की उपेक्षा करते हुए विदेशी भाषाओँ, वैचारिक फैशनों का अंधानुकरण चल पड़ा है. शिक्षा के पाठ्यक्रमो में विदेशी कहानियाँ विदेशी नायक खड़े किये जा रहे है. हमारे महापुरुषों और अनेक मनीषियों को लगभग विस्मृत कर दिया हैं. यहाँ तक कि समाज को दिशा देने वाले साहित्य पर भी आज अश्लीलता ने डेरा जमाया लिया हैं. सूचना क्रांति में अग्रणी भूमिका निभा रहे सोशल मीडिया जैसे प्लेटफार्म पर इन विचारों से भारतीय संस्कृति को हानि पहुंचाई जा रही है.

लड़ाई सिर्फ एक मोर्चे पर नहीं है आज हम अपनी संपूर्ण शिक्षा, विमर्श, पाठ्यचर्या आदि को उलटें, तो हमारे एतिहासिक नायकों की कही गयी बातों में एक भी शायद ही कहीं मिलें. फिर देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं, टेलीवीजन चैनलों की संपूर्ण सामग्री पर ध्यान दें जहाँ ये लिखा जाना चाहिए था कि वैदिक संस्कृति के साथ चलो आज वहां मोटे-मोटे अक्षरों में छापा जाता है कि कंडोम के साथ चलो! यह सब पढने में जितनी शर्म महसूस होती है. अब उतना ही लिखने में भी शर्म महसूस हो रही है लेकिन क्या करें जिस तरह आज ये सब परोसा जा रहा है तो शायद कल कुछ भी बचाने को हमारे पास शेष न रहे.

इस अंधानुकरण मानसिकता से हमारा घोर सांस्कृतिक पतन होता जा रहा है. इसी की परिणति बच्चों समेत सब को खुले व्यभिचार की स्वीकृति देने में हो रही है. सिनेमा, विज्ञापन आदि उद्योग हमारे बच्चों, किशोरों में ब्रह्मचर्य की उलटी गतिविधियों की प्रेरणा जगाते हैं. यह हमारे सबसे अग्रणी पब्लिक स्कूलों की शिक्षा है. महर्षि दयानन्द सरस्वती समेत सभी महापुरुषों की सारी बातें कूड़े में और विकृत भोगवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है. इसीलिए अधिकतर लोग भोग के अलावा नितांत उद्देश्यहीन जीवन जीते हैं. लोगों को सिर्फ उत्तेजक भोजन, उत्तेजक सिनेमा, उत्तेजक विज्ञापन, उत्तेजक संगीत, चित्र, मुहावरे आदि सेवन करने को परोसे जा रहे है.

एक ओर कथित बाबा देश धर्म के नाम पर हमारी प्राचीन वैदिक संस्कृति की गरिमा को तार-तार कर रहे है तो दूसरी तरफ इनके कारनामों का फायदा उठाकर विरोधी धर्मांतरण करने में लगे पड़े है. युवा बहनें भी इस धार्मिक कुचक्र का शिकार बनाई जा रही है. चारों ओर चुनोती है, धर्म से लेकर शिक्षा तक संस्कार से लेकर संस्कृति तक. सामाजिक उन्नति के मूलमंत्रों और सारतत्वों का खुलेआम दहन किया जा रहा है. बचाव का कोई सहारा नहीं दिख रहा है इस कारण इस डूबती संस्कृति को बचाने के लिए सिर्फ और सिर्फ आर्य समाज ही एक टापू के रूप में दिखाई दे रहा है.

देश ज्यों-ज्यों आगे बढ़ रहा है, त्यों-त्यों सामाजिक -समस्या गहरी और व्यापक हो रही है. हमारी उन्नति के मार्ग में ऐसे काफी विघ्न हैं. विवादों के बाजार में राजनीती सर चढ़कर बोल रही है. छुट-मूट नेता चुनाव जीतने के लिए धर्म के नाम पर भाषण दे जाते है लेकिन कितने लोग मानते है कि उन्हें अपनी राजनीति से ज्यादा धर्म से प्यार हो? आज एक आर्य समाज ही हैं जो स्वदेश के हितार्थ में सदा कमर कसे तैयार रहता हैं जिसकी अपने पूर्वजों महापुरुषों और अपनी वैदिक संस्कृति पर आंतरिक श्रद्धा और भक्ति है,  किन्तु ये काफी नहीं है हमारी लड़ाई लम्बी है जो सभी आर्यों के सहयोग से पूर्ण हो सकती है. हमारी आध्यात्मिकता और देश ही हमारा जीवनरक्त है. यदि यह साफ बहता रहे, यदि यह शुद्ध है तो सब कुछ ठीक है. चाहे देश की निर्धनता ही क्यों न हो, यदि खून शुद्ध है, तो संसार में हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा. यदि इस खून में ही व्याधि उत्पन हो गयी तो क्या होगा! यह आप स्वयं अनुमान लगा सकते है. इन सब विसंगतियों, कुप्रथाओं, अंधविश्वासो से हो रही सांस्कृतिक हानि से किस प्रकार बचना है कैसे इस देश को पुन: राम और कृष्ण के विचारों भूमि बनाना है. किस प्रकार महर्षि देव दयानन्द जी के सपनों को पूरा करना है. यही सब विचार करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है. आशा है आप सभी लोग देश-विदेश के जिस भी कोनें में होंगे इस महासम्मेलन में हिस्सा बनकर अपने पूर्ण सहयोग से देश और समाज हित के इस कार्य में अपनी वैचारिक आहुति जरुर देंगे तथा अन्य लोगों को प्रेरित भी करेंगे…राजीव चौधरी

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