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इमरान खान ने जो कहा उसमें कितना सच है..?

Aug 10 • Samaj and the Society • 158 Views • No Comments

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अतीत का इतिहास बिना प्रमाण के अतिशयोक्ति बन जाता है, इसलिए इतिहास की बात आये तो प्रमाण होने जरुरी हो जाते है। हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इस्लामाबाद में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक दिवस पर आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि “बंदूक की नोंक पर या जबरदस्ती शादियां करके किसी को मुसलमान बनाना गैर-इस्लामी है, ये ताकत तो अल्लाह ने पैगंबर तक को नहीं दी थी कि किसी को जबरन ईमान में लाए, कुरान के अंदर हुक्म है कि दीन में कुछ भी जबरदस्ती नहीं है” बंदूक़ की नोंक पर किसी को आप मुसलमान बनाएं या किसी को मुसलमान नहीं होने के कारण मारें यह पूरी तरह से गैर-इस्लामिक है। यही नहीं आगे इमरान खान ने ये भी कहा कि पैगंबर ने अल्पसंख्यकों को धार्मिक स्वतंत्रता दी थी और उनके धार्मिक स्थलों की रक्षा भी की थी।

मुझे नहीं पता इमरान खान को इस संर्दभ में कितनी जानकारी है लेकिन उनके भाषण से ये जरुर दिख रहा है कि उन्होंने न कुरान का अध्यन किया और न इस्लामिक इतिहास का। आमतौर पर पैगंबर के बारे में यही कहा जाता है कि मुहम्मद साहब अल्लाह द्वारा दिए गए शांति के सन्देश के प्रचारक थे। लेकिन इस्लाम की यह शाब्दिक शान्ति व्यावहारिक रूप में कितनी परिवर्तित हो पाई इससे विश्व इतिहास के पाठ्यक्रम भरे पड़े है। कहा जाता है किसी भी मत को समझना या धारण करना हो तो पहले उसका इतिहास जान लेना चाहिए। यानि  किसी भी मत की मान्यताएं उसके इतिहास से प्रदर्शित होती हैं।

शायद इमरान खान किसी और मत की पुस्तक पढ़ी होगी वरना ऐसा बयान नहीं देते क्योंकि कुरान मजीद, सूरा 9, आयत 5 कहती हैं कि जब पवित्र महीने बीत जाऐं, तो ‘मुश्रिको’ (मूर्तिपूजको ) को जहाँ-कहीं पाओ कत्ल करो, और पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। इसके अलावा कुरान सूरा 4, आयत 56 जिन लोगों ने हमारी ”आयतों” का इन्कार किया (इस्लाम व कुरान को मानने से इंकार) , उन्हें हम जल्द अग्नि में झोंक देंगे। जब उनकी खालें पक जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल देंगे ताकि वे यातना का रसास्वादन कर लें। एक और आयत कुरान सूरा 9, आयत 123 कहती हे कि ‘ईमान’ लाने वालों! (मुसलमानों) उन ‘काफिरों’ (गैर-मुस्लिमो) से लड़ो जो तुम्हारे आस पास हैं, और चाहिए कि वे तुममें सखती पायें।”

इसके अलावा यदि इस्लामिक इतिहास देखा जाये तो 613 में मुहम्मद ने उपदेश देना शुरू किया था तब मक्का, मदिना सहित पूरे अरब में यहू‍दी मुशरिक, सबायन,  ईसाई आदि आदि अनेकों मतों को मानने वाले लोग थे। लोगों ने मोहम्मद का विरोध किया। विरोध करने वालों में यहूदी सबसे आगे थे, तो युद्ध शुरू हो गया। इसके बाद वह सन 622 मक्का से निकलकर मदीना के लिए कूच कर गए। मदीना में मोहम्मद ने लोगों को इक्ट्ठा करके एक इस्लामिक फौज तैयार की और फिर शुरू हुआ जंग का सफर. खंदक, खैबर, बदर और ‍फिर मक्का को फतह कर लिया गया। इसका सीधा अर्थ है यह जंग फूलों से तो नहीं लड़ी गयी होगी? जंग नाम ही इंसानियत का कत्ल का है। इसके बाद इस्लाम ने यहूदियों को अरब से बाहर खदेड़ दिया वह इसराइल और मिस्र में सिमट कर रह गए. कहा जाता जंग-ए-बदर के बाद यहूदियों जो कि अल्पसंख्यक थे जिसने इस्लाम स्वीकार किया उनकी जान बच गयी बाकियों को या तो मरना पड़ा या वहां से भागना पड़ा।

सातवीं वीं शताब्दी आते-आते इस्लाम समूचे अरब जगत का मत बन चुका था इसने भारत, और अफ्रीका का रुख किया जब यह कथित शांति की विचारधारा विश्व भर में फैली तो इस्लामवाद ने बेहद तेज गति से अपने पंख फैलाये, सिर्फ फैलाये ही नहीं बल्कि सामने आने किसी भी दूसरी संस्कृति और सभ्यताओं के पर भी काटे। उदहारण के लिए अरब से चली कथित शांति की यह विचारधारा जब ईरान पहुंची तो यहाँ का मूल निवासी पारसी था जो जरथ्रुस्त को अपना पैगम्बर मानता था। यहाँ जिन्होंने अपना पैगम्बर बदल लिया सिर्फ उनकी जान बची बाकियों का वही हाल हुआ जो सूरा 9, आयत 5 कहती हैं। इसके बाद जब यह विचारधारा अफगानिस्तान आई तो यहाँ महात्मा बुद्ध के अनुयायी और हिन्दुओं का निवास था। जिन लोगों ने पैगम्बर को अपना मसीहा माना उनकी जिन्दगी बक्श दी गयी, जिन्होंने इंकार किया उन्हें मरना पड़ा या भागना पड़ा। इसके बाद बलूचिस्तान की हिन्दू-बौद्ध मिश्रित संस्कृति खत्म हुई आज भी खंडहरों को संस्कृति अवशेषों के रूप में देखा जा सकता हैं। आगे बढ़े तो खुद जहाँ खड़ा होकर इमरान भाषण दे रहे है वहां गुरु नानक की जन्मभूमि का पवित्र स्थान था, लाहौर जो कभी सिखों का स्थान था और कश्मीर जो कभी पंडितों की भूमि थी आज  किसी उदहारण की मोहताज नहीं हैं। न ही किसी धार्मिक विश्लेषण की! बाकि बची शेष जगहों पर भी धार्मिक आस्था के लिए चुनौतियां क्या कम हैं?

लेकिन इसके बाद भी इस्लाम से जुड़े लोग स्वीकार करने को तैयार नहीं होते कि इस्लाम की प्रारंभिक शताब्दियों मे जिहाद की व्याख्या निश्चित रुप से आक्रामक और विस्तारवादी रही जब विजय का सिलसिला थम गया। तब जिहाद की सूफी अवधारणा गढ़ी गयी कि मतलब आत्म विकास और आत्म अवलोकन है। किन्तु कट्टरपंथी संगठन आज भी सातवीं सदी इस परम्परा का पालन कर रहे है।

इस्लामिक इतिहास कहता है जब खैबर के लोगों ने इस्लाम नहीं कबूला तो उन पर अचानक आक्रमण कर दिया गया और उन्हें संभलने का मौका तक नहीं दिया गया औरतों को बंदी बना लिया गया और लुट के माल के तरह उनको भी बाँट लिया गया। खैबर की सम्पदा लूट ली गयी। इस्लाम के इतिहास की ये केवल एक घटना नहीं है। इतिहास में अनेकों ऐसी घटनायें हैं। अपने मत से सहमत न होने पर किसी व्यक्ति या समूह या देश पर आक्रमण कर उसे तबाह कर देना सम्पदा को लूट लेना औरतों को लूट के माल की तरह बाँट लेना और इसको शान्ति का सन्देश करार देना कहाँ तक तर्कसंगत है, इमरान खान खुद विचार करें?

लेख-राजीव चौधरी 

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