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ईसाई मिशनरीज की दया या दानवता

Jul 13 • Samaj and the Society • 182 Views • No Comments

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क्या यह मात्र एक खबर है कि महान संत की उपाधि से नवाजी गयी मदर टेरेसा द्वारा शुरू की गई संस्था मिशनरीज ऑफ चैरिटी के रांची के ईस्ट जेल रोड स्थित ‘‘चौरिटी होम निर्मल हृदय’’ में नवजात बच्चों को बेचने के मामले में दो नन और एक महिला कर्मचारी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। चलो मान भी लिया जाये कि अन्य खबरों की तरह यह भी एक खबर है पर क्या इस बात को यहीं समाप्त कर दिया जाये! लेकिन इस मामले एक महिला कर्मचारी अनिमा इंदवार ये भी स्वीकारा है कि इस रैकेट में ‘‘निर्मल हृदय’’ की सिस्टर कोनसीलिया भी शामिल थी और दोनों इससे पहले आधा दर्जन बच्चे बेच चुकी हैं। शायद अब ये खबर नहीं है क्योंकि ये ईसाई मिशनरीज के निर्मल हृदय का वह काला सच है जिसे दुनिया के सामने लाया जाना चाहिए ताकि लोगों को पता चले कि इन मिशनरीज की दया के अन्दर एक रूप दानवता का भी समाया हुआ है।

इस मामले में पुलिस और अन्य अधिकारियों की प्रारंभिक जांच में जो सच सामने आया है वह बेहद चौकाने वाला है। निर्मल हृदय में रह रहीं पीड़िताओं से जन्मे और शिशु भवन में रखे गए 280 बच्चों का कोई अता-पता नहीं है। अब तक की जांच के दौरान जब्त किए गए कागजात के अनुसार 2015 से 2018 तक उक्त दोनों जगहों (निर्मल हृदय, शिशु भवन) में 450 गर्भवती पीड़िताओं को भर्ती कराया गया। इनसे जन्मे 170 बच्चों को बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया या जानकारी दी गई। शेष 280 बच्चों का कोई अता-पता नहीं है, यानि दया की आड़ में दानवता का यह खेल कई वर्षों से खेला जा रहा था।

ऐसा ही एक मामला साल 2016 में पश्चिम बंगाल में उजागर हुआ था जब मुफ्त क्लीनिक और बच्चों का स्कूल चलाने वाले एक ईसाई संस्था के यहां से कब्र खोद कर दो बच्चों के कंकाल निकाले गए थे और खुफिया विभाग ने 45-50 बच्चों को संतानहीन दंपतियों को बेचने का आरोप इस संस्था पर लगाया था। असल में ईसाई मिशनरीज द्वारा किया जा मानवता की आड़ में यह धंधा कई वर्ष पहले 2011 में स्पेन से उजागर हुआ था वहां इस गिरोह में डॉक्टर, नर्स, पादरी एवं चर्च के उच्चाधिकारी शामिल पाए गये थे और बताया गया था मानवता और दया के घूंघट से अपना असली दानवता का चेहरा ढ़ककर इस गिरोह ने पिछले 50 साल में 3 लाख बच्चे बेचे थे। गिरोह की कार्यप्रणाली के अनुसार नवप्रसूता से कह दिया जाता था कि ‘‘बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ था, इसलिए दफना दिया गया।’’ इस बात को पुख्ता स्वरूप देने के लिए कैथोलिक चर्च के पादरी से पुष्टि करवाई जाती थी, फिर निःसंतान दंपतियों को वह बच्चा मोटी रकम में बेच दिया जाता था। यह गोरखधंधा इतने वर्षों तक इसलिए चल सका, क्योंकि दुखी माता-पिता सम्बन्धित पादरी की बात पर आसानी से विश्वास कर लेते थे।

बात बच्चे बेचने तक सीमित नहीं है भारत जैसे देशों में यह मिशनरीज अन्य कार्यों को अंजाम देने से नहीं चूक रही है। गौरतलब है कि इसी महीने इन मिशनरीज का एक दूसरा मामला सामने आया था जब झारखंड के दुमका में आदिवासियों के बीच कथित तौर पर धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश में जुटे 16 ईसाई धर्म प्रचारकों जिनमें सात महिलाएं भी शामिल थीं को गिरफ्तार किया गया है। इन पर आरोप है कि शिकारीपाड़ा थाना क्षेत्र के सुदूर फूलपहाड़ी गांव में ग्रामीणों के बीच गैरकानूनी ढंग से प्रचार करते हुए उन्हें काल्पनिक शैतान से डराकर उन पर अपना धर्म बदलने के लिए जोर दे रहे थे।

पिछले महीने ही खूंटी के कोचांग गांव में पांच महिलाओं के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना में स्कूल के फादर अल्फांसो आइंद को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था और इसी दौरान केरल में 5 पादरियों के द्वारा चर्च में प्रार्थना करने गई एक महिला का बलात्कार करने का मामला भी सामने आया था। इससे पहले साल 2014 में केरल के कोट्टियूर में एक पादरी द्वारा नाबालिगा से बलात्कार, फिर उस पीड़िता के एक शिशु को जन्म देने का मामला प्रकाश में आया था और इसी वर्ष अप्रैल 2014 में ही केरल में 3 कैथोलिक पादरी बच्चों से बलात्कार के मामले में कानून की पकड़ में आए थे। वर्ष 2016 में प. बंगाल में भी एक पादरी पर महिला से दुष्कर्म किए जाने का आरोप लगा था। इन सभी मामलों में गिरजाघरों ने शर्मिंदा होने की बजाय केवल अपने पादरियों का ही बचाव किया था। इन सभी मामले पर छद्म-पंथनिरपेक्षक, उदारवादी और मानवाधिकार व स्वयंसेवी संगठन तो चुप रहे ही थे, मीडिया का एक बड़ा भाग भी या तो इस पर मौन रहा या फिर कुछ ने इस घृणित मामले को एक साधारण समाचार के रूप में प्रस्तुत किया था। इन सभी मामलों में उस तरह का हंगामा, समाचार पत्रों के मुखपृष्ठों में सुर्खियाँ और न्यूज चैनलों पर लम्बी बहस नहीं दिखी, जो कथित भारतीय बाबाओं पर लगे यौन-उत्पीड़न के आरोपों के बाद नजर आई थी।

जबकि दानवता के ये मामले कम संगीन नहीं और न ही यही समाप्त नहीं होते, कुछ महीने पहले की ही तो बात है जब तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले के सलवक्कम गाँव में एक पादरी थॉमस ‘लाइट आफ द ब्लाइंड’ संस्था की आड़ में मानव अंग और हड्डियां बेचता पकड़ा गया था। उस समय यह भी सवाल उठा था कि मानवता को दया का सन्देश देने वाले पादरी और चर्च के अधिकारी आध्यात्मिकता और नैतिकता के बजाय अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए गैरकानूनी कार्यों में लिप्त हैं? दरअसल ये सब कोई मामूली खबर नहीं है बल्कि भारतीय धराधाम पर हो रहे पाप और ईसाई मिशनरीज के राक्षसों की लपलपाती लहू चाटती जीभ के सजीव उदाहरण हैं। ईसाइयत की पवित्रता के नाम पर दानवता के इस खेल का ये एक ऐसा किस्सा है, जिसमें मासूम नवजात बच्चों की खरीद फरोख्त से लेकर यौन शोषण और धर्मांतरण तक के खेल जारी हैं।

लेख-राजीव चौधरी

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