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करतार सिंह सराभा जिसनें खून में कलम डुबो कर इंकलाब लिखने की हिम्मत की

Nov 16 • Arya Sandesh • 327 Views • No Comments

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15 नवम्बर बलिदान दिवस पर विशेष

पंजाब का दर्द आपकी सोच से भी ज्यादा है। ये वो धरती है जिसने देश को सबसे ज्यादा शहीद भी दिए और अपने पीठ पर सबसे ज्यादा वार भी सहे। जिस्म छलनी रहा, कराहटें निकलती रहीं लेकिन जुबान ने भारत माता की जय कहना बंद नहीं किया। कितनी कहानियां सुनाएं, कितने शहीदों के नाम गिनवाएं, कितनी कुर्बानियां याद दिलाएं। आज भी लोग भगत सिंह को याद करते हुए गर्व से भर जाते हैं, उधम सिंह द्वारा माइकल ओ’ ड्वायर पर चलाई गई गोली की गूंज आज भी भारतियों के सर को ऊंचा कर देती है। ऐसे कितने सूरमों ने पंजाब की मिट्टी में जन्म लिया और देश के लिए हंसते हंसते अपने प्राण दे दिए। इन्ही नामों में एक नाम आता है एक नौजवान का, जिसने मात्र 19 वर्ष आयु में हंसते हुए सूली पर चढ़ जाना स्वीकार किया। इस लड़के को शहीद भगत सिंह ने अपना गुरु माना। दुनिया उस लड़के को सरदार करतार सिंह साराभा के नाम से जानती है। जी हां वही करतार सिंह साराभा जिसने गदर मचाया था। जिसने अंग्रेजों के मन में पहली बार ये डर जगाया था कि अगर भारतीय एक हो गए तो उन्हें सब छोड़ छाड़ कर भागना पड़ेगा। वही करतार सिंह साराभा जिन्होंने विदेशों में रह रहे भारतियों के मन में वापिस देश लौट कर देश को आजाद कराने की ललक जगाई थी। वही करतार सिंह साराभा जो 19 साल की उम्र में हंसता हुआ फांसी के फंदे पर झूल गया था।

करतार सिंह का जन्म 24 मई 1896 में लुधियाना के एक गांव साराभा में हुआ था। करतार अपने दादा के संरक्षण में पले बढ़े। इसका कारण ये था कि उन्होंने बचपन में ही अपने पिता मंगल सिंह तथा माता साहिब कौर को खो दिया था। अपनी प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद, आगे की शिक्षा के लिए करतार को उनके रिश्तेदारों के यहाँ उड़ीसा भेज दिया गया। इसके आगे की पढ़ाई के लिए वे अमेरिका चले गए। अमेरिका जाने के बाद एक के बाद एक ऐसी कई घटनाएं घटीं जिससे उन्हें समझ आने लगा कि भारतियों के साथ सिर्फ इसलिए भेदभाव किया जाता है क्योंकि वो एक गुलाम देश से आये हैं। सबसे पहले तो करतार को सैन फ्रांसिस्को पहुँचते ही भेदभाव का सामना तब करना पड़ा जब इमिग्रेशन डिपार्टमेंट में उनसे ऐसे सवाल पूछे गए जिसके लिए एक 16 वर्ष का लड़का तैयार नहीं था। वो जिस माकन में रहा करते थे उसकी मालकिन एक दिन पूरा घर सजा रही थी। साराभा ने उनसे घर सजाने का कारण पूछा तो मकान मालकिन ने बताया कि आज के दिन उनका देश आजाद हुआ था इसीलिए वो घर सजा कर इस दिन की खुशी मना रही हैं। इस घटना के बाद साराभा के दिमाग में ये बात आई कि क्या हम लोग ऐसा दिन नहीं मना सकते! बस यही कुछ घटनाएँ थीं जिन्होंने साराभा के दिमाग में आजादी का फितूर भर दिया।

रोजगार ढूंढते हुए बहुत से भारतीय विदेशों में जा बसे थे। उनके साथ भी इसी तरह भेदभाव किया जाता था। धीरे धीरे वहां के भारतीय एक जुट हो कर आवाज उठाने लगे। 1912 में अमेरिका के पोर्टलैंड में भारतीय लोगों का बहुत बड़ा सम्मलेन हुआ। हरनाम सिंह, सोहन सिंह भकना सहित कई भारतीय इस सम्मलेन में हिस्सा लेने पहुंचे। इसी दौरान लाला हरदयाल ने वहां अपना भाषण दिया जिसे सुन कर साराभा बहुत प्रभावित हुए। ये भारत का वो दौर था जब देश के नौजवान कांग्रेस की नरम दल नीतियों से बहुत खफा हो चुके थे। उन्हें लगने लगा था कि बिना हथियार उठाये आज़ादी नहीं पाई जा सकती।

इन्ही कारणों ने आजादी के लिए चल रही मुहीम को तेज किया। भारत की आज़ादी के लिये 1913 में गदर आंदोलन की शुरुआत हुई। ये अपनी तरह का पहला आंदोलन था जिसकी नींव विदेश में रखी गई थी। यहां, भारतीय विद्यार्थी इस आंदोलन की सभा में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे। गदर पार्टी का एक ही मकसद था किसी भी तरह से भारत की आज़ादी। यहां इनका एक ही नारा था “देश की आज़ादी के लिये, हर तरह से आहूत होना”।

इसी के साथ गदर पत्रिका का प्रकाशन भी शुरू हो गया। इसके संपादन की जिम्मेदारी करतार सिंह साराभा को सौंपी गयी। साराभा ने संपादन के साथ हाथ से छपने वाली मशीन चलने का काम भी किया। इसकी शुरुआत पंजाबी में हुई मगर बाद में ये पत्रिका कई भाषाओँ में छपने लगी। गदर पार्टी इतनी बड़ी बन गई थी कि इसकी खबर इंग्लिश के अखबारों में छपनी शुरू हो गई। कुछ सरकारी जासूस भी इस पार्टी में शामिल हो रहे थे।

1914, में प्रथम विश्वयुद्ध में, इंग्लैंड भी शामिल हो गया था जिसके चलते ब्रिटिश सेना और सरकारी सिस्टम खुद को इस युद्ध में बचाने में लगा हुआ था। इसी मौके का फायदा उठाकर, गदर पार्टी ने अपने पत्र में अंग्रेज के खिलाफ लड़ाई का आह्वान कर दिया। 5 अगस्त 1914 को एक पत्र में इसकी जानकारी पार्टी के हर सदस्य को दी गई। 15 सितंबर 1914 को, करतार सिंह अपने साथी सत्येन सेन और विष्णु गणेश पिंगले के साथ अमेरिका छोड़कर भारत रवाना हुए।

करतार कोलंबो के रास्ते कलकत्ता पहुंचे। एक अनुमान के मुताबिक कुछ 20000 भारतीय, विदेशों से इस लड़ाई में हिस्सा लेने के लिये भारत आए थे। करतार सिंह ने पंजाब के अंदर इस विद्रोह की कमान संभाली। इन्होंने विष्णु गणेश पिंगले के साथ भारत के अनेक शहरों में जाकर गदरी पार्टी का प्रचार किया और एक ज़मीन को तैयार किया ताकि ब्रिटिश सेना में भारतीय मूल के सैनिक इनके साथ जुड़ सकें। इसी बीच इन्होंने अपने लुधियाना ज़िले में एक छोटी सी फैक्टरी लगाई जहां छोटे हथियार बनाए जाते थे।

एक मीटिंग में ये तय हुआ कि 21 फरवरी 1915 को मियान मीर और फिरोज़पुर की सैनिक छावनी पर हमला बोला जाएगा। यहां इसकी पूरी तैयारी चल रही थी लेकिन एक सरकारी मुखबिर ने जिसका नाम किरपाल सिंह बताया जाता है, इस बात की जानकारी सरकार को दे दी। जिसके बाद  19 फरवरी 1915 को क्रांतिकारी गिरफ्तार किये गये। यहां करतार सिंह सराभा बचने में कामयाब रहें।

हालात को देखकर कुछ दिनों के लिए देश छोड़ने का प्लान बनाया गया। सरदार करतार सिंह सराभा को काबुल में मिलने के लिए कहा गया। लेकिन, काबुल जाने की बजाय करतार सिंह अपने साथियों को छुड़वाने की फिराक में थे। इसी क्रम में करतार गिरफ्तार हो गए। इन्हें बाकी आंदोलनकारियों के साथ लाहौर जेल भेज दिया गया।

यहां, साराभा पर देशद्रोह और कत्ल का मुकदमा चला, और इन आरोपों के तहत उन्हें सज़ा-ए-मौत सुना दी गयी। मौत से भला कौन नहीं डरता, एक मौत ही तो ऐसा रहस्य है जिसका राज खुलने से इंसान हमेशा डरता रहा है। लेकिन साराभा तो दीवाने थे, उन पर भारत माँ के स्नेह का खुमार चढ़ा हुआ था। वो तो खुश थे। सजा-ए-मौत मिलने के बाद एक रोज उनके दादा उनसे जेल में मिलने आये और उनसे कहा कि “तू ने ये क्या किया, सब रिश्तेदार तेरे इस कदम को बेवकूफी भरा बता रहे हैं।” इसके जवाब में करतार सिंह साराभा ने मुस्कुराते हुए कहा ‘जो ऐसा कहते हैं उनमे से कुछ लोग हैजे से मर जाएंगा, कोई मलेरिया से कोई प्लेग से। लेकिन मुझे ये मौत देश की खातिर मिलेगी। सबकी ऐसी किस्मत कहां होती है।” इसके आगे उनके दादा के पास कुछ कहने को बचा ही नहीं।

16 नवंबर 1915 को लाहौर की जेल में सरदार करतार सिंह साराभा 19 वर्ष की छोटी सी आयु में शहादत पा गए। सरदार करतार सिंह सराभा 19 साल की उम्र में फांसी पर झूम  गये थे। गदरी पार्टी या आंदोलन कामयाब तो ना हो सका, लेकिन किसे पता था कि सरदार करतार सिंह सराभा, भगत सिंह के प्रेरणा स्रोत बनकर इसी लाहौर की जेल में 23 मार्च 1931 को दुबारा क्रांति की लहर पैदा कर जाएंगे।

कुछ खास नहीं था उनमें जो देश के लिए, आने वाली पीढ़ियों के लिए हँसते हुए सूली पर चढ़ गए। वो भी हमारी तरह ही थे आम से इंसान। बस फर्क इतना सा था कि उन्होंने देश को सबसे पहले रखा। उन्होंने अपने खून में कलम डुबो कर इंकलाब लिखने की हिम्मत की। सरदार करतार सिंह साराभा और उन जैसे सभी शहीदों को उनकी बहादुरी और जज्बे के लिए दिल से प्रणाम……

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