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कहां गया पाकिस्तान से अल्पसंख्यक समुदाय?

कहा जाता है कि जिन्ना के एक अगस्त के उस भाषण (“आप स्वतंत्र हैं अपने मंदिरों में जाने के लिए, आप स्वतंत्र हैं अपनी मस्जिदों में जाने के लिए और अपनी किसी भी इबादतगाह में जाने के लिए, आपके संबंध किसी भी धर्म, जाति या नस्ल से हों, राज्य को इससे कोई लेना देना नहीं”)पर विश्वास कर पाकिस्तान को अपना मुल्क स्वीकार करने वाले अल्पसंख्यक समुदाय ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिन्ना के अनुयायी आने वाले वक्त में उनके साथ यह हालात पैदा कर देंगे कि उनके नाम और धार्मिक पहचान के साथ उनके धार्मिक स्थल और उनका जीवन भी उनसे छीन लेंगे।

चरणजीत सिंह चरणजीत सिंह

कई रोज पहले पाकिस्तान के पेशावर शहर में जिस शख्स को गोली मारी गई, उनका नाम चरणजीत सिंह था। अल्पसंख्यकों के लिए कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और सिख नेता चरणजीत सिंह की हत्या से एक बार फिर साफ हो गया कि पाकिस्तान में हिंदू, सिख, और अहमदिया जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ धर्म के आधार पर हमले लगातार जारी हैं। इस हत्या से एक बार फिर उस कहावत को बल मिला कि पाकिस्तान में एक पाकिस्तानी होने के लिए मुसलमान होना जरूरी समझा जाता है। पिछले वर्ष मानवाधिकार आयोग ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट को जारी करने के मौके पर कहा था कि पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यक पर जुल्म बढ़ा है और लोगों का गायब होना जारी है।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट दिवंगत कार्यकर्ता असमा जहांगीर को समर्पित करते हुए कहा था कि आतंकवाद से संबंधित मौतें भले ही कम हुई हों लेकिन धार्मिक अल्पसंख्यक हिंसा का दंश झेल रहे हैं। उनका अपहरण हो रहा है, लेकिन ईश-निंदा कानून ने लोगों को चुप रहने पर मजबूर कर दिया है। अल्पसंख्यक समुदाय की सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधियों को असहिष्णुता और चरमपंथ ने सीमित कर दिया है। वहां की सरकार अल्पसंख्यकों पर जुल्म के मुद्दे से निपटने में अप्रभावी रही और अपने कर्तव्यों को पूरा करने में नाकाम रही।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में बसने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों में सबसे अधिक संख्या हिन्दुओं की है। ईसाई आबादी के लिहाज से दूसरे बड़े अल्पसंख्यक हैं जबकि उनके अलावा सिख, पारसी, बौद्ध प्रमुख हैं। पाकिस्तान के चुनाव आयोग के दस्तावेज के मुताबिक पाकिस्तान में कुल हिंदू मतदाताओं की संख्या 14.9 लाख है, 13.2 लाख ईसाई मतदाता हैं जिनमें 10 लाख पंजाब प्रांत में रहते हैं। इसके बाद सिंध में दो लाख नौ हजार 83 ईसाई मतदाता हैं। कुल एक लाख 19 हजार 749 अहमदी मतदाता हैं जबकि सिख मतदाता 6193 हैं जिनमें केपी में 2597, सिंध में 1477, पंजाब में 1157, फाटा में 730, बलूचिस्तान में 225 और इस्लामाबाद में 7 रहते हैं। इसके अलावा पाकिस्तान में 1643 बौद्ध मतदाता भी हैं।

दरअसल, आज पाकिस्तान में हिन्दुओं की आबादी करीब 70 लाख है और यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है। इस समुदाय की सबसे बड़ी चिंता जबरन धर्मांतरण है, अधिकतर युवतियों का जबरन धर्मांतरण होता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकतर नाबालिग लड़कियों को अगवा कर लिया जाता उनको जबरन इस्लाम में धर्मांरित किया जाता है और फिर मुस्लिम व्यक्ति से शादी कर दी जाती है।

इसी तरह कभी पाकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान तक में बौद्ध धर्म का प्राचीन इतिहास था। पंजाब में तक्षशिला और खैबर पख्तूनख्वा में तख्त बाई के क्षेत्र में मौजूद स्तूप और स्वात घाटी में जन्म लेने वाली गंधारा संस्कृति जिसे बौद्ध धर्म का पालना माना जाता है, लेकिन अब स्थिति यह है कि पाकिस्तान में बौद्धों का कोई नियमित मंदिर मौजूद नहीं। बौद्धों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो शून्य है ही साथ में वह पाकिस्तानी होने के बावजूद पहचान से वंचित हैं, जैसे कोई भूली-बिसरी कौम हो। धीरे-धीरे हो सकता है कि एक दो पीढ़ी बाद उनका वजूद जड़ से ही खत्म हो जाए। पाकिस्तानी पंजाब में सिखों के कई पवित्र स्थान रहे हैं, लेकिन आज वे भी अपना वजूद बचाने के लिए संघर्षरत हैं।

यही नहीं पाकिस्तान में ईसाई लोगों को भी खतरा बराबर बना रहता है। ईश निंदा कानून का डर तलवार की तरह हर समय उनके समुदाय के सिर पर लटकता रहता है। अखलाक और पहलू खान की हत्या पर भारत को कोसने वाली पाकिस्तानी मीडिया में जहां ये सवाल उठाए जाने थे, वहां मीडिया पाकिस्तान के हिंसक चेहरे को उदारवाद के रंग से लीप-पोतकर यह खबर चला रही है कि पेशावर की रहने वालीं 24 साल की मनमीत कौर पाकिस्तान की पहली सिख महिला पत्रकार बनी। शायद 70 वर्ष के पाकिस्तान की जेब में अल्पसंख्यक समुदाय को खुश करने के लिहाज से सिर्फ एक यही पहली उपलब्धि है जिसे बार-बार टीवी पर चलाकर चलाकर पाकिस्तान के चेहरे पर लगे चरणजीत सिंह की हत्या के दाग को धोने की कोशिश की जा रही है।

जबकि सच्चाई यह है कि पाकिस्तान में मजहब के नाम पर पंथ आधारित हिंसा जारी है और सरकार हमलों और भेदभावों से अल्पसंख्यकों की हिफाजत करने में विफल है। चरमपंथी पाकिस्तान के लिए विशिष्ट इस्लामिक पहचान बनाने पर अमादा हैं और ऐसा लगता है कि उन्हें पूरी छूट दी गई है। आजादी के समय पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी 20 फीसदी से ज्यादा थी। 1998 की जनगणना के मुताबिक यह संख्या घटकर अब 3 फीसदी के करीब है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर 17 फीसदी अल्पसंख्यक समुदाय कहाँ गया?…..लेख-राजीव चौधरी

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