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कुरान और हदीस में तो किसी प्रकार का बदलाव मुमकिन नहीं, लेकिन मुसलमानों की सामूहिक सोच में तब्दीली जरूर मुमकिन है।

Aug 9 • Uncategorized • 638 Views • No Comments

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तुफैल अहमद

मेरा मानना है कि कुरान और हदीस में तो किसी प्रकार का बदलाव मुमकिन नहीं, लेकिन मुसलमानों की सामूहिक सोच में तब्दीली जरूर मुमकिन है। देश के बंटवारे के बाद मुसलमानों का राजनीतिक नेतृत्व पाकिस्तान चला गया और इसका नतीजा यह हुआ कि मुसलमानों का बौद्धिक नेतृत्व मौलवियों के हाथों में आ गया। उन्होंने अपनी सीमित धार्मिक समझबूझ के मुताबिक आम मुसलमानों की सोच-समझ को आकार देना शुरू कर दिया। बेहतर हो कि मुसलमानों में समाज सुधार का काम भी मौलवी लोग ही आगे बढ़कर करें। पिछले कुछ वर्षों से यह बात देखने में आ रही है कि कई शहरों में मुसलमान जुमे और ईद की नमाज मस्जिद और ईदगाह से लगी सार्वजनिक जगह पर पढ़ने लगते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि मस्जिद के अंदर नमाज पढ़ने की जगह नहीं होती। जुमे और ईद की नमाज सामूहिक रूप से पढ़ी जाती है। इसकी वजह से नमाज पढ़ने के लिए ज्यादा से ज्यादा मुसलमान पहुंचते हैं। नमाज पढ़ाने वाले इमाम और मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि सार्वजनिक जगह, जैसे सड़क और बाजार में नमाज पढ़ने से दूसरे समुदाय के लोगों को परेशानी होती है। वे यह भी देखने से इन्कार करते हैं कि यह परेशानी मुसलमानों के खिलाफ तरह-तरह की भावनाओं को जन्म देती है। इस समस्या का एक आसान हल यह है कि मुसलमान जुमे और ईद की नमाज कई किस्तों में पढ़ें। इससे समाज में मुस्लिम-हिंदू सौहार्द बना रहेगा। यह कहना गलत नहीं होगा कि मुसलमान कई बार ऐसा करते भी हैं। उदाहरण के लिए बारिश के मौसम में कई मस्जिदों में मुसलमान जुमे और ईद की नमाज किस्तों में पढ़ते हैं। यहां यह बताना जरूरी है कि सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो चल रहे हैं जिनमें यह देखा जा सकता है कि मुसलमान ट्रेन रोककर ईद की नमाज पढ़ रहे हैं। ऐसा काम करने वाले मुसलमान अपने खिलाफ नफरत का ही बीज बो रहे हैं।
एक और समस्या है जो आजकल सुर्खियों में छाई है और वह है लाउडस्पीकर से अजान। आम तौर पर कोई हिंदू या ईसाई अजान पर सवाल नहीं उठाता। दोपहर, शाम और रात की अजान पर किसी को कोई आपत्ति नहीं, लेकिन जब लाउडस्पीकर से अजान पर सवाल उठाया जाता है तो आमतौर पर सिर्फ सुबह की अजान को लेकर उठाया जाता है। ऐसा इसलिए है कि उस वक्त तमाम लोग सोये रहते हैं। आजकल शहरों में लोग देर रात तक काम करते हैं और रात में भी एक बजे और उसके बाद ही सोते हैं, लिहाजा सुबह की लाउडस्पीकर की अजान से उनकी नींद टूटती है। ऐसे लोगों में मुसलमानों के खिलाफ विरोधी भावनाएं उबाल लेने लगती हैं। इन हालात में यह जरूरी है कि मस्जिदों के इमाम समस्या को समग्र्र रूप से समझें। इस्लाम में यह कहीं नहीं कहा गया है कि लाउडस्पीकर से अजान देने के बाद ही नमाज, नमाज मानी जाएगी। क्या यह बेहतर नहीं होगा कि सुबह की अजान लाउडस्पीकर से दी ही न जाए? आजकल हर नमाजी के पास मोबाइल फोन होता है जिसमें अलार्म की सुविधा होती है। इसकी मदद से वे सुबह की नमाज के वक्त आराम से उठ सकते हैं। वैसे भी देश के तमाम राज्यों में बाकायदा ऐसे कानून लागू हैं कि रात के दस बजे से सुबह छह बजे तक लाउडस्पीकर का इस्तेमाल वर्जित है। ऐसे में नमाजी जैसे सुबह तड़के की ट्रेन पकड़ने के लिए पूरी एहतियात के साथ उठ जाते हैं उसी तरह सुबह की नमाज के मामले में भी उन्हें यही करना चाहिए।
मुसलमान यह समझें कि अगर हिंदू सवाल नहीं उठा रहे हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि नमाजियों के साथ-साथ उन्हें भी सुबह-सुबह जगा दिया जाए। लाउडस्पीकर से दी जाने वाली अजान एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया है जो मजहबी फर्ज यानी नमाज के लिए जरूरी नहीं है। पाकिस्तान के कुछ शहरों में देखा गया है कि नमाज के समय एक इलाके में ही दर्जनों मस्जिदों से एक साथ लाउडस्पीकर बजने शुरू हो जाते हैं। ईरान में मस्जिदों के लाउडस्पीकरों की ध्वनि को रात के समय कम रखने के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। अगर इस मामले में खुद मस्जिदों के इमाम ही आगे बढ़कर पहल नहीं करेंगे तो फिर मुसलमानों के खिलाफ बढ़ती हुई दुर्भावना के लिए वे खुद ही जिम्मेदार होंगे।
एक और समस्या मदरसों की है। उत्तर प्रदेश और बिहार के कई मदरसों में खुलेआम तरह-तरह की हेराफेरी होती है। मुमकिन है कि ऐसा अन्य राज्यों के मदरसों में भी होता हो। हैरानी की बात है कि हेराफेरी कराने वाले हिंदू या किसी और धर्म के लोग नहीं होते, बल्कि इसमें भी संदेह की सुईं मौलवियों की ओर ही मुड़ती है। मौलवियों को इस्लाम का रक्षक माना जाता है, लेकिन मदरसों में ऐसे लड़के-लड़कियों का दाखिला करा दिया जाता है जो कभी पढ़ने ही नहीं आते। उन्हें सिर्फ परीक्षा का फार्म भरकर नकल कराके पास कराना कई लोगों का पेशा बन गया है। कदाचार-भ्रष्टाचार के इस खेल में मौलवी ही सबसे आगे हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि मदरसों का काम अब शिक्षा देना नहीं रह गया है। अफसोस की बात है कि मौलवी लोगों ने मदरसों में शिक्षा का काम कम और सर्टिफिकेट बांटने का काम तब से ज्यादा करना शुरू कर दिया है जब से राज्य सरकारों ने मदरसों को वित्तीय सहायता देनी शुरू की है। यह जरूरी है कि राज्य सरकारें इस बात पर ध्यान दें कि मदरसे और मौलवी मुसलमानों की तरक्की में रोड़ा न बनने पाएं। राज्य सरकारों से यह भी गुजारिश है कि वे मदरसा बोर्ड खत्म कर दें, क्योंकि वहां अब तरह-तरह की हेराफेरी ज्यादा होती है। मदरसों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं से कहा जाए कि वे स्कूल बोर्ड का इम्तिहान पास करें। जब मुसलमान और हिंदू एक ही बोर्ड से परीक्षा पास करेंगे तो दोनों समुदायों के बीच सद्भावना बढ़ेगी।
जिन मदरसों को सरकार से वित्तीय सहायता नहीं मिलती है वे जो चाहे पढ़ाएं, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन जो मदरसे सरकारी सहायता से चलते हैं उनके लिए प्रावधान बदलने का सरकारों को पूरा अधिकार है। सरकारें सहायता इसलिए करती हैं ताकि वहां पढ़ने वाले लड़के-लड़कियां देश की प्रगति में योगदान कर सकें। मदरसों में विज्ञान, गणित, भूगोल और सामाजिक विज्ञान के जो अध्यापक नियुक्त होते हैं उनका मुसलमान होना जरूरी नहीं होना चाहिए। ये विषय हिंदू या किसी और धर्म के अध्यापक भी पढ़ा सकते हैं और कहीं बेहतर पढ़ा सकते हैं। आज यह भी जरूरी हो गया है कि मदरसे संचालित करने वाली स्थानीय संस्थाओं में भी हिंदू, ईसाई और दूसरे समुदायों के बुद्धिजीवी लोगों को भी शामिल किया जाए। अगर
भारतीय राज्य किसी संस्था की वित्तीय सहायता करता है तो धर्म के नाम पर भेदभाव नहीं होने देना चाहिए। यह तभी मुमकिन है जब खुद मौलवी आगे आएं और मुसलमानों के खिलाफ मुसलमानों द्वारा ही फैलाई जाने वाली भावना को रोकने की कोशिश करें और दूसरे समुदायों से अलग रहने की प्रवृत्ति को छोड़ें।
[ लेखक नई दिल्ली स्थित ओपन सोर्स इंस्टीट्यूट में कार्यकारी निदेशक हैं ]

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