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कैसे क्रांति की मशाल बन गये सरदार भगत सिंह

Mar 23 • Arya Samaj • 509 Views • No Comments

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जलियांवाला बाग में किशोरावस्था की दहलीज पर दस्तक दे रहा वह (12 वर्षीय) सिख लड़का उस मैदान पर ठिठक कर खड़ा हो गया, जहां खून से लथपथ धरती की गंध एक ही दिन पहले हुए बर्बर हत्याकांड की गवाही दे रही थी. अपनी जेब से उसने एक शीशी निकाली जो वह लहू-सनी मिटटी डाल कर अपने साथ ले जाने के लिए लाया था. लड़का शाम को देर से घर पहुंचा. किशोर भगत सिंह की उस दिन जैसे जिंदगी की दिशा ही बदल गई. उसी दिन से उसके खून में इंकलाब हिलोरें मारने लगा. उसी दिन से वह अपने प्यारे देश के लिए जान न्यौछावर करने के लिए वचनबद्ध सिपाही बन गया और अंत में उसने अपना वचन निभा दिया. कितने कम शब्दों में वयोवृद्ध लेखक प्रो. मलविंदर सिंह वढ़ैच ने सरदार भगत सिंह के जीवन का उत्कृष्ट वर्णन कर डाला.

शहीद-ए-आजम भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर, 1907 को पंजाब के लायलपुर जिला (फैसलाबाद, पाक) के बंगा गांव में हुआ था. भगत सिंह के दादा सरदार अर्जुन सिंह पहले सिख थे जो आर्य समाजी बने. इनके तीनों सुपुत्र-किशन सिंह, अजीत सिंह व स्वर्ण सिंह प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे. परिवार पर आर्य समाज के प्रभाव बारे भगत सिंह के छोटे भाई स्व. रणबीर सिंह ने एक बार कहा था कि आर्य समाज में मेरे दादा स्व. अर्जुन सिंह शामिल थे. फिर मेरे पिता स्व. किशन सिंह, चाचा स्व. अजीत सिंह को महात्मा हंसराज जी व लाला लाजपत राय के साथ आर्य समाज का कार्य करने का अवसर प्राप्त रहा है. हमारे विचार और मानसिक उन्नति भी बड़ी हद तक आर्य समाज की देन है. अन्य बहुत से उपकारों के लिए भी हम आर्य समाज के ऋणी हैं.

भगत सिंह के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आने का एक बहुत बड़ा कारण था उनका लाहौर स्थित नैशनल कालेज में सन् 1921 में प्रवेश. 1923 में नैशनल कालेज में उनके छात्र काल की एक घटना बताते हुए उनके गुरु जयचंद्र विद्यालंकार ने लिखा था कि भगत सिंह की शादी उसके पिता स्व. किशन सिंह करना चाहते थे. लड़की शायद महाराजा रणजीत सिंह के खानदान में किसी धनी खानदान की थी. वह बहुत सुंदर थी और बहुत-सा दहेज भी मिलने वाला था. भगत सिंह मेरे पास आया और बोला, ‘मुझे कहीं भेज दीजिए.’ मैंने कानपुर में विद्यार्थी जी के पास उसे भेजा. भगत सिंह की शादी तो हुई पर कैसे हुई इसका वर्णन करते हुए भगत सिंह की शहादत के बाद उनके घनिष्ठ मित्र भगवती चरण वोहरा की धर्मपत्नी दुर्गा भाभी ने, जो स्वयं एक क्रांतिकारी वीरांगना थीं, कहा था, ‘‘फांसी का तख्ता उसका मंडप बना, फांसी का फंदा उसकी वरमाला और मौत उसकी दुल्हन. भगत सिंह ने मन ही मन स्वयं को राष्ट्र पर कुर्बान करने की प्रतिज्ञा कर ली थी, पर उनके परिजन उनकी शादी करना चाहते थे. भगत सिंह के मित्र विजय कुमार सिन्हा ने एक बार उससे पूछा था कि,‘‘तुम शादी क्यों नहीं करना चाहते?’’ तो उन्होंने दो टूक कहा, ‘‘मैं विधवाओं की संख्या नहीं बढ़ाना चाहता.

भगत सिंह मात्र साढ़े 23 वर्ष की अल्पायु में ‘शोषण एवं साम्राज्यवाद’ के खिलाफ एक वीर योद्धा व महान विचारक के रूप में लड़ते हुए लोकप्रियता की चरम सीमा पर पहुंचे. वह अपने अमूल्य जीवन को दांव पर लगाकर, अपने प्रिय देश के दुश्मन को ‘बेहाल’ और पीड़ित जनता को निहाल करने का भरसक प्रयास करता है. इतना सब कुछ करने के बावजूद एवं भरी जवानी में देश पर न्यौछावर होने वाला यह मतवाला देशभक्त, अपने देशवासियों से अलविदा होते हुए देखिए क्या कहता है, ‘मैं देश की जितनी सेवा करना चाहता था उसका हजारवां हिस्सा भी नहीं कर सका

असैंबली बम कांड के उपरांत आत्मसमर्पण कर, भगत सिंह ने बी.के. दत्त के साथ 8 अप्रैल, 1929 को गिरफ्तारी दे दी. भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद उन पर दिल्ली व लाहौर की अदालतों में मुकद्दमा चलाया गया. फलत: 12 जून, 1929 को उन्हें काले पानी का आजीवन कारावास व 7 अक्तूबर, 1930 को मृत्यु दंड की सजा सुनाई गई. अंतत: 23 मार्च, 1931 को जब उनकी उम्र मात्र 23 साल, 5 मास व 25 दिन थी उन्हें लाहौर सैंट्रल जेल में राजगुरु व सुखदेव के साथ सायं 7.33 पर शहीद कर दिया गया.

एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भगत सिंह का योगदान भी अपने आप में अद्भुत है. उदाहरणार्थ 8 अप्रैल, 1929 को गिरफ्तार होने से पूर्व उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की लगभग प्रत्येक गतिविधि में बढ़-चढ़ कर भाग लिया. सन् 1920 में जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया उस समय भगत सिंह मात्र 13 वर्ष के थे और 1929 में जब गिरफ्तार हुए तो 22 वर्ष के युवा. इन 9 वर्षों में भगत सिंह की एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में हमेशा देशवासियों के सीने में अमर रहेगें. भारत माता की मुक्ति के लिए अपने प्राणों अमर बलिदान करने वाले भारत माता के सपूतों को आर्य समाज का शत-शत नमन देश आपका बलिदान कभी नही भूला सकता..विनय आर्य

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