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क्या आप जानते है कबीर साहिब ने गोरक्षा के लिए अपना विवाह करने से इंकार कर दिया था?

हमारे देश के इतिहास में अनेक महापुरुष हुए है जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों होते हुए भी गौ रक्षा के लिए तन-मन एवं धन से सहयोग किया। गुजरात के ऊना में हुई घटना को सामाजिक रूप से हल निकालने के स्थान पर उसका राजनीतिकरण कर दिया गया। हिन्दू समाज जो पहले ही छुआछूत के चलते दीमक लगे पेड़ के समान खोखला हो चूका है। हिन्दू समाज के अभिन्न अंग दलित समाज में कुछ तथाकथित नेता अपने वोट बैंक बनाने के पीछे दलित-मुस्लिम गठजोड़ तक बनाने से पीछे नहीं हट रहे। जबकि देश का इतिहास उठा कर देखिये। मुस्लिम आक्रांताओं ने हिन्दू ब्राह्मण हो या दलित सभी पर अवर्णनीय अत्याचार किये है। दलित समाज सुधारकों में रविदास, कबीर, बिरसा मुंडा से लेकर डॉ अम्बेडकर अनेक प्रसिद्द नाम है।

दलित संतों एवं समाज सुधारकों ने गोरक्षा के लिए सामाजिक सन्देश दिया। आज इसके विपरीत ऊना की घटना को लेकर अपने आपको दलित विचारक कहने वाले लोग गौ के सम्बन्ध में उलटे सीधे कुतर्क दे रहे है। सत्य यह है कि दलितों के नाम पर राजनीती करने वाले लोग असल विदेशी चंदे पर पलने वाली जमात है। ये लोग ईसाईयों और मुसलमानों के हाथों की कठपुतली मात्र है। इनका काम केवल दलितों को आक्रोशित कर उन्हें हिन्दू समाज से अलग करना है। एकता में शक्ति है। हिन्दू समाज को अपनी शक्ति को बचाना है तो जातिवाद का नाश करना होगा।

इस लेख में हम सिद्ध करेंगे कि कबीर साहिब ने गोरक्षा करने के लिए अपना विवाह तक करने से इंकार कर दिया था।
एक दिन गोसाईं कबीर पूरब की धरती नगर बनारस में रहते थे। जब कबीर अठारह बरस के भए तो उनके माता-पिता ने विचारा कि इसका ब्याह कर दिया जाए। कबीर बहुत उदासीन हो रहा है, क्या पता ब्याहे का मन टिक जाए, कबीर को ब्याह ही दें।
जहां पर कबीर को बुलवाया गया था, वहां पर कबीर का होने वाला ससुर पूछने लगा : अरे भाई समधियो ! इसे हमारे यहां ब्याह दो। तब कबीर के मां-बाप ने कहा कि भला होए जी ! चलिए ब्राह्मण से जा कर पूछते हैं, जो साहा जुड़े वह साहा मान लेते हैं।
तब कबीर का पिता और ससुर उठ खड़े हुए और मिल कर ब्राह्मण के पास गए। पत्री कढाई, साहा निर्मल निकला, ब्राह्मण से साहा जुड़ाया, साहा जोड़- बांध कर दोनों के हाथ में थमा दिया गया। उसे लेकर कबीर का पिता और भावी ससुर अपने-अपने घर चले आए।

अनाज की सामग्री एकत्र की जाने लगी। घी-शक्कर लिया, चावल-दही लिया। और कबीर का जो काका था, कबीर के बाप का छोटा भाई, तिसको काका कहते हैं। वह कबीर जी का काका जाकर एक गाय मोल ले आया वध करने के निमित्त। तब परिवार के लोग कह उठे कि कबीर का काका एक गाय वध करने को ले लाया है।
जब गोसाईं कबीर ने सुना कि काका जी गाय वध करने को ले आया है, तब कबीर बाहर आए। जब देखा कि काका जी गाय ले आया है, तब कबीर जी ने पूछा : ऐ काका जी ! यह गऊ तुम काहे को लाए हो। तब कबीर के काका ने कहा : कबीर ! यह गऊ वध करने को लायी गई है।

तब कबीर ने यह बानी बोली राग गुजरी में :
काका ऐसा काम न कीजै
इह गऊ ब्रहमन कउ दीजै।। रहाउ ।।
तिसका परमार्थ : तब गोसाईं कबीर ने कहा : काका जी ! यह गऊ वध नहीं करनी है, यह गऊ ब्राह्मण को दे दीजिए। यह गऊ वध करने योग्य नहीं, ब्राह्मण को देने योग्य है। तब गोसाईं कबीर के काका ने कहा : गाय वध किए बिना हमारा कारज नहीं संवरता। यहां बहुत लोग जुड़ेंगे। जब गोवध करेंगे तब ही किसी
महमान आए का आदर होगा। तुम यह गोवध मना मत करो।
तब गोसाईं कबीर ने यह बानी बोली :
रोमि रोमि उआ के देवता बसत है।। ब्रहम बसै रग माही।
बैतरनी मिरतक मुकति करत है। सा तुम छेदहु नाही।।

तिसका परमार्थ : तब गोसाईं कबीर ने कहा : काका जी ! तुम इस गऊ के गुण
सुन लो। इस गऊ के जितने रोम हैं, इसके रोम-रोम में देवता बसते हैं। और इसकी रगों में स्वयं ब्रह्म ही बसता है। और जी ! इसका एक यह बड़ा गुण है कि वैतरणी मृतक चलते-चलते ब्राह्मण को मिलती है। तब उस मृतक को वह गऊ भव जल तार देती है। ऐसी यह गऊ है जी। इस गऊ का नाम भवजल-तारिणी है जी। इस गऊ का वध करना ठीक नहीं। यह गऊ तुम ब्राह्मण के प्रति धर्मार्थ दे दो जी।
काका कहने लगा : तू यह कहता है कि यह गऊ ब्राह्मण को दे दो और हमारे बड़े बुज़ुर्ग इसे कोह=मार कर लोगों को खिलाते थे। हमें भी उसी राह चलना चाहिए। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो लोग कहेंगे कि ये गुमराह हो गए हैं, इनसे यह चीज़ होने को न आई। कबीर जी ! गऊ वध करनी ही भली है। इसे, छोड़ देना हमें समझ नहीं आता। बलिहारी जाऊं कबीर जी ! यह गुनाह हमें बख़्शो जी।
तब गोसाईं कबीर ने यह बानी बोली :
दूधु दही घृत अंब्रित देती। निरमल जा की काइआ।

गोबरि जा के धरती सूची। सा तै आणी गाइआ।।

तिसका परमार्थ : तब गोसाईं कबीर ने कहा : सुनिए काका जी ! यह गाय जो है सो कैसी है, पहले इसका गुण सुन लें कि यह गाय कैसी है। यह गाय ऐसी है जी : यह दूध देती है, तिसका दही होता है जी। दूध से खीर होती है। दही से अमृत वस्तु घृत निकलता है जी। उस से सब भोजन पवित्र होते हैं जी। देवताओं-सुरों नरों को भोग चढ़ता है। इस घृत का धूप वैकुण्ठ लोक जाता है। ठाकुर जी को दूध-दही-घृत भोग चढ़ता है जी और इस गऊ की काया जो है सो निर्मल है। जी ऐसी निर्मला यह गऊ है जिसके गोबर से धरती पवित्र होती है, उसका तुम बुरा चाहते हो ! सो इस बात में तुम्हारा भला नहीं। बलिहार जाऊं काका जी ! यह गऊ तुम ब्राह्मण को दे दो जी, वध करने में भला नहीं।

तब फिर उन कबीर के बाबा=पिता और चाचा ने कहा : जिन शरीकों=रिश्तेदारों भाइयों के यहां हमने यह वस्तु खायी थी वह तो उनको भी खिलानी चाहिए। यदि हम उन्हें यह खिलाएंगे नहीं तो वे उठ जाएंगे। अतः पुत्र जी ! गऊ अवश्य वध करनी चाहिए। ऐसे हमारी इज़्ज़त नहीं रहती।

तब गोसाईं कबीर ने यह बानी बोली :
काहे कउ तुमि बीआहु करतु हउ । कहत कबीर बीचारी।
जिसु कारणि तुमि गऊ बिणासहु। सा हमि छोडी नारी।।

तिसका परमार्थ : तब गोसाईं कबीर ने कहा : सुनिए बाबा-काका जी ! तुम जो हमारा ब्याह करते हो सो किस कारण करते हो जी। जिस कारण तुम गऊ विनाशते हो जी कि हमारा कारज संवरे, वह तुम अपना कारज रख छोड़ो। हमने वह स्त्री ही छोड़ी तो तुम किसका ब्याह करते हो। हमने वह नारी ही छोड़ दी।

अजी ! तुम जानो और तुम्हारा ब्याह। हमने तो वह नारी ही छोड़ दी जी।
इस प्रकार जब गोसाईं कबीर कुपित हो उठे, तब उन सभी का अभिमान छिटक गया। उन्होंने आपस में मसलत करी कि जिस कबीर ने यह बात कही है वह ब्याह न करेगा। आओ अब यह गऊ ब्राह्मण को दे दें और हम सीधा अनाज करें जैसा कबीर कहता है।

तब कबीर गोसाईं के पास परिवार के सब लोग मिल कर आए और बोले : भला हो कबीर जी ! जैसा तेरा जी है वैसा ही करेंगे। यह गऊ ब्राह्मण को दीजिए जी। और जो प्रसाद=भोजन तुम कहते हो हम वही प्रसाद सेवन करेंगे जी। बस ! तुम अब स्त्री न छोड़ो जी, अब तुम स्त्री ब्याह लो।

तब गोसाईं कबीर ने कहा : न बाबा जी ! हमारे मुख से निकल चुका है, सो अब मैं स्त्री नहीं ब्याहता। तब जितना परिवार था सब कबीर जी को निवेदन करने लगे कि ना जी ! अब हमने गऊ छोड़ दी तो तुम स्त्री न छोड़ो जी।

तब गोसाईं कबीर ने कहा : मैं स्त्री तभी न छोड़ूंगा जी जब तुम स्त्री के मां-बाप को भी जाकर कहो कि गोवध नहीं करना। यदि तुम्हारे कहने लगकर वे गोवध नहीं करेंगे तो मैं उस स्त्री से ब्याह कर लूंगा। यदि वे गोवध करेंगे तो मैं वहां न जाऊंगा, न ही मैं वह स्त्री ब्याह कर लाऊंगा।

तब उन्होंने कहा : भला हो जी ! वे लोग चलते-चलते उनके पास पहुंचे और बोले : भाई रे ! हमने जो गऊ वध के लिए लायी थी वह कबीर ने ब्राह्मण को दिलवा दी। उन्होंने सारी बात कह सुनाई कि यह बात ऐसे-ऐसे घटी है। अब कबीर कहता है कि हमारे सास-ससुर को कहो कि हम तब ही तुम्हारे घर आवेंगे जब तुम गोवध न करोगे।

तब उन लोगों ने कहा : भाड़ में जाए वह बात जो कबीर जी को न भावे। हम तो तुम्हारे लिए ही गोवध करने वाले थे। क्यों जी ! जब तुम्हीं ख़ुश हो तो हम गोवध नहीं करेंगे।

तब कबीर के परिवारी लोग बोले : हमें इस बात में खरी ख़ुशी होगी, यदि तुम लोग गोवध न करो।

तब सब मिल कर कबीर जी के पास लौट आए। माता-पिता और सास-ससुर सबने आकर नमस्कार किया और कहा : कबीर जी ! जो तुमने कहा वह हम सबने मान लिया। हमने गाय छोड़ दी जी। पर अब तुम जो आज्ञा करोगे हम वैसा ही प्रसाद बनाएंगे बारात के आवभगत के लिए।

तब गोसाईं कबीर ने कहा : अब तुम यही प्रसाद करो : यही शक्कर-भात-घी-दही मिश्रित प्रसाद करो। तुम्हारा भला होगा।
तब उन लोगों ने गोसाईं कबीर से कहा : भला जी ! हम यही प्रसाद बनाएंगे जी। पर जी ! अब
तुम्हें ख़ुशी है न हमारे ऊपर।

तब गोसाईं कबीर ने कहा : तुम्हारे ऊपर ठाकुर जी की ख़ुशी है, तुम्हारा भला होगा।

तब वे सास-ससुर अपने घर चले गए। इधर बाबा-काका-परिवार के सब लोग ख़ुश हुए।
इस प्रकार गोसाईं कबीर ब्याहे गए और राम-नाम स्मरण करने लगे।
जनमसाखी भगत कबीर जी की

मूल पंजाबी रचयिता : सोढी मनोहरदास मेहरबान
रचनाकाल : १६६७ विक्रमी, साखी नं• ४ का अनुवाद
हिन्दी अनुवादक : राजेन्द्र सिंह
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