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क्या चीन में बदल दिया जाएगा इस्लाम?

Jan 29 • Samaj and the Society • 161 Views • No Comments

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हाल में विश्व भर के अखबारों की यह सुर्खिया हर किसी को सोचने पर मजबूर कर रही कि क्या वास्तव में चीन इस्लाम को बदलने जा रहा है! सूचनाओं के माध्यम से खबर है कि चीन अपने यहाँ मुसलमानों पर नियंत्रण करने के लिए एक राजनीतिक अभियान की शुरुआत करने वाला है। इसके लिए एक पंचवर्षीय योजना बनाई जा रही है जिसके तहत इस्लाम का चीनीकरण किया जाएगा ताकि इस्लाम को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के विचारों के अनुरूप ढाला जा सके। अगर ऐसा हुआ तो यह अपने आप में एक बड़ा क्रांतिकारी कदम होगा जिसकी मांग भी पिछले काफी समय से बार-बार की जा रही है।

इस बात से सारी दुनिया परिचित है कि इस्लाम अपने आप में एक साम्राज्यवादी विचारधारा है और जिसका लक्ष्य अधिक से अधिक भूभाग पर अधिकार और सातवीं सदी में बनाएं गये कानून से लोगों को हांकना है। कई इस्लामविद इसके लिए हर एक वो रास्ता भी अपनाने से नहीं चुकते जिसे आधुनिक संविधान कई मायनो में अपराध की संज्ञा भी प्रदान करता है। यानि जो भी टकराव है वह सिर्फ आधुनिक संविधान और शरियत कानून के मध्य रहा है। अब हो सकता है चीन इस टकराव को समाप्त करने लिए इस्लाम की अवधारणाओं को अपने कम्युनिस्ट कानून के अनुरूप ढालना चाहता हो।

बताया जा रहा है कि शुरुआत में मुसलमानों को मूल सामाजिक मूल्यों, कानून और पारंपरिक संस्कृति पर भाषण और प्रशिक्षण दिया जाएगा। मदरसों में नई किताबें रखी जाएंगी ताकि लोग इस्लाम के चीनीकरण को और बेहतर ढंग से समझ सकें। सकारात्मक भाव के साथ विभिन्न कहानियों के माध्यम से मुसलमानों का मार्गदर्शन किया जाएगा। हालांकि, इस योजना के बारे में और ज्यादा जानकारी नहीं दी गई है। अभी इसे गुप्त रखा जा रहा है।

यह बात तो मान्य है कि वतर्मान परिस्थितियों में इस्लाम अपने आप में एक बड़े बदलाव की बाट जोह रहा है। पिछले दिनों सऊदी अरब में महिलाओं के लिए बने कई कठोर कानूनों में बदलाव किया गया हैं। वर्ष 2005 में इस्लामिक लेखक सलमान रुश्दी ने ब्रिटेन से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र द टाइम्स में अपने एक लेख में कहा था कि अब इस्लामवादियों को इस बात की जरूरत है कि परंपरा से अलग हटकर बढ़ा जाए। इसके लिए एक सुधार आंदोलन चलाना होगा जिससे इस्लाम की मूल भावनाओं को आधुनिक दौर में लाया जा सके। रुश्दी ने ये भी तर्क दिया है कि पवित्र ग्रंथ कुरान को एक ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह पढ़ाया जाना चाहिए ना कि किसी ऐसी पुस्तक के तौर पर जिसपर कोई सवाल ना उठाया जा सके। अगर सुधार हुए तो तभी सातवीं शताब्दी में बनाए गए कानून 21वीं सदी की जरूरतों को अपना मार्ग बनाने दे पाएँगे।

अब सवाल यही उठता है इस्लाम के अन्दर यह बदलाव कैसे हो सकता है? चीन के संदर्भ में जो अनुमान लगाये जा रहे है वह इस प्रकार कि इस्लामिक पहनावे में बदलाव किया जायेगा।  रोजाना के धार्मिक प्रयोग जैसे नमाज पढ़ना, रोजा रखना जैसी पारम्परिक बाध्यता को खत्म किया जायेगा, साथ ही दाढ़ी बढ़ाने भी पांबदी की तैयारी है। कट्टर इस्लामिक नाम रखने पर पाबंदी होगी और इस्लाम से पहले चाइना की संस्कृति को महत्व देना होगा। हालाँकि इस पहल की शुरूआती तौर पर चीन की मस्जिदों से इस्लामिक ध्वज उतारकर उनकी जगह चीनी ध्वज भी लगाये जा रहे है।

अब यदि इस प्रश्न को चाइना की सीमा पार कर भारत के संदर्भ में रखा जाये मुझे नहीं पता कितना उपयुक्त होगा। किन्तु इतना तय की इस बदलाव से काफी धार्मिक संघर्षो एवं राष्ट्रीय मुद्दों को कफन जरुर पहनाया जा सकता है। किन्तु धर्मनिरपेक्षता के ढोंग की राजनीति के रहते यहाँ ऐसा संभव होता दिखाई नहीं देता, क्योंकि जब-जब हमारे पास बदलाव के ऐसे अवसर आये तब-तब हमने बदलाव को अस्वीकार कर वोट बेंक को तरजीह ज्यादा दी।

कौन भूल सकता है 1978 का पांच बच्चों की मां 62 वर्षीय शाहबानो का मामला जिसने तलाक के बाद गुजारा भत्ता पाने के लिए कानून की शरण ली थी। कोर्ट ने सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाते हुए शाहबानो के हक में फैसला देते हुए उसके पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश भी दिया था। परन्तु शाहबानो के कानूनी तलाक भत्ते पर देशभर में राजनीतिक बवाल मच गया और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को मिलने वाले मुआवजे को निरस्त करते हुए एक साल के भीतर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। अगर यह फैसला ना पलटा गया होता तो जरुर मुस्लिम महिलाओं को सातवीं सदी के एक कानून से तो छुटकारा मिल गया होता किन्तु मुल्ला मौलवियों के दबाव में यह बड़ा बदलाव नहीं सका।

असल में आज मुस्लिमों को भी एक बात स्वीकार करनी होगी कि पूरी दुनिया में जो प्रगति और परिवर्तन हो रहे हैं मुस्लिम उससे कटे हुए नहीं बल्कि ज्यादातर उस परिवर्तन का लाभ उठाने वालों में शामिल हैं, परिवर्तन लाने वालों में नहीं। आधुनिक शिक्षा के विकास के साथ यह स्थिति बदल रही है। मगर मुल्ला मौलवियों का एक बड़ा वर्ग अब भी पुरानी लीक पर जमा हुआ है। इससे इस तर्क को बल मिल जाता है कि पूरा मुस्लिम समाज कट्टरपंथी है शायद यही इस्लाम अस्थिरता का कारण भी है। कहा जाता है कि एक बार मौलाना आजाद ने अपने एक इंटरव्यू में इन्हीं मौलवियों के लिए कहा है,  इस्लाम की पूरी तारीख उन मौलवियों से भरी पड़ी है जिनके कारण इस्लाम हर दौर में सिसकियां लेता रहा है।

अब चीन से सबक लेकर सभी उदारवादी मुस्लिमों को समझ जाना चाहिए कि मध्यकालीन पुस्तकों और कानूनों से भले ही उन्होंने अनेक शताब्दियों तक काम चलाया हो परंतु अब परिस्थियाँ बदल रही और इस कारण स्वयं ही आगे बढ़कर सामाजिक बदलाव और आधुनिक संविधान को स्वीकार कर लेना चाहिए इससे ही अनेकों स्थानों से सामाजिक और धार्मिक संघर्षों को मुक्ति मिल सकती है।

लेख- राजीव चौधरी

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