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क्या देश को पुरुष आयोग की जरूरत है

सुनने में ही सवाल जरा टेढ़ा सा है क्योंकि अक्सर कथित नारीवादी समूहों द्वारा हमारे समाज को पितृसत्तामक के अलावा महिलाओं पर अत्याचार करने वाला बताया जाता है। इसके अलावा महिला छेड़छाड से लेकर दहेज और घरेलू हिंसाओं में अक्सर कानून महिला का पक्ष लेता दिख जाता है। किसे याद नहीं होगा पिछले साल अक्टूबर में मी-टू अभियान की शुरुआत हुई थी जिसमें महिलाओं ने अपने कार्यस्थलों पर अपने साथ होने वाले यौन उत्पीड़न के मामलों के ख़िलाफ आवाज उठाई थी। जिसकी चपेट में देश के एक मंत्री से लेकर अनेकों बड़ी कम्पनियों के बड़े अधिकारियों से लेकर नेताओं और अभिनेताओं पर आरोप लगे थे। कुछ पर ताजा आरोप थे तो कुछ के दशकों पुराने मामले सामने निकलकर आये थे।

इन मामलों को उठाने के लिए सोशल मीडिया को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया था जहां महिलाओं ने अपने साथ यौन उत्पीड़न करने वाले व्यक्ति को टैग करते हुए अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में बताया था। इसमें उत्तराखंड प्रदेश पार्टी महामंत्री संजय कुमार, तत्कालीन सरकार में मंत्री एम जे अकबर के अलावा सिने जगत से नाना पाटेकर, विकास बहल, उत्सव चक्रवर्ती, आलोक नाथ और सुभाष घई समेत अनेकों लोगों पर आरोप लगे थे। हालाँकि इससे पहले भारत में साल 2017 में एक लॉ की छात्रा ने एक लिस्ट फेसबुक पर साझा की थी जिसमें 50 प्रोफेसरों पर उत्पीड़न का आरोप लगाया गया था। इस लिस्ट में ज्यादातर प्रोफेसरों के नाम का जिक्र किया गया था।

अब इसी तर्ज पर 18 मई को दिल्ली के इंडिया गेट पर पुरुषों अधिकारों के लिए काम करने वाले कुछ संगठनों ने एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया। इस अभियान का नाम मेन-टू रखा गया है इसमें शामिल सभी पुरुषों के हाथों में तख्तियां थी इन्होने पुरुषों के साथ होने वाले उत्पीड़न, उन पर लगने वाले झूठे आरोपों के निदान और पुरुष आयोग बनाने की मांग की हैं। ये लोग कह रहे है कि हमारी लड़ाई उन कानूनों के ख़िलाफ है, जिनमें एकतरफा सिर्फ महिलाओं की बात को महत्व दिया जाता है और महिलाएं इन क़ानूनों का दुरुपयोग कर रही हैं। जैसे छेड़छाड, रेप और दहेज जैसे क़ानूनों का अपने निजी फायदे के लिए इस्तेमाल होता है। इन मामलों में फंसने के बाद न सिर्फ समाज में पुरुष के सम्मान को चोट पहुंचती हैं बल्कि कई सालों की क़ानूनी लड़ाई में वो मानसिक पीड़ा से भी गुजरता है। अगर वो निर्दोष साबित होता है तो उसके समय, पैसे और मानहानि की भरपाई नहीं हो सकती।

अकसर देखने में भी आता है कि घरेलू झगड़ों को बढ़ाचढ़ा कर अपराध बना दिया जाता है। कई मामलों में पड़ोसी के साथ झगड़ा नाली को लेकर शुरू होता है और अंत में रेप के मुकदमे में तब्दील हो जाता है। तो कई मामलों में ऐसा भी देखा गया जब एक व्यक्ति अपनी उधारी के पैसे मांगने गया था तो उसे रेप जैसे घिनोने अपराध में फंसा दिया गया। इसके अलावा धन व जमीन जायदाद हड़पने, रंजिश निकालने व परेशान करने के लिए झूठे केस बनाए जाते हैं. कोर्ट कचहरियों में मुकदमों की भरमार है।

इस को ध्यान में रखते हुए पिछले साल 2 अक्टूबर के दिन राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर पुरुष आयोग की मांग करने की योजना और इससे पहले 23 सितंबर को कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग को लेकर पहली कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई थी। क्योंकि बहुत सी औरतें खुद मरने व झूठे केस में पति व उस के पूरे परिवार को फंसाने की धमकी देती रहती हैं. अदालतों में दहेज, मारपीट, छेड़खानी, बलात्कार व चेहरे पर तेजाब फेंकने जैसे बहुत से मामले झूठे साबित हो चुके हैं। बहुत सी औरतें अपने हक में बने कानून का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करती हैं। इसमें इन्सान का वक्त और पैसा तो बर्बाद होता ही है साथ ही मामला मीडिया में उछलने से उसके सामाजिक सम्मान में क्षति भी होती है। कई लोग तो इस ब्लैकमेलिंग से तंग आकर कर आत्महत्या तक कर लेते हैं। न जाने ऐसी कितनी खबरें अखबारों में आये दिन आती रहती है कि पत्नी से तंग आ कर युवक ने आत्महत्या की।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2013 से जुलाई 2014 के बीच अकेले दिल्ली में रेप के 2,753 मामले दर्ज हुए थे। इन में 1,464 मामले झूठे पाए गए थे। जाहिर है कि उन औरतों की कमी नहीं है जो अपने किसी भी उद्देश्य के लिए रेप का आरोप लगाने से नहीं चूकतीं। हमारा समाज यह मानने के लिए सदा तैयार रहता है कि आरोप में कुछ न कुछ सचाई होगी। पिछले कुछ दिनों पहले एक खबर ने सबको चौका दिया था कि मेरठ में एक औरत ने सरकारी अस्पताल में अपनी डाक्टरी जांच करा कर सर्टिफिकेट बनवाया व थाने जा कर शिकायत दर्ज करा दी। पुलिस ने उस के पति को उठा कर जेल में डाल दिया। बाद में जब मामला खुला तो पाया कि पत्नी के गैरमर्द से नाजायज संबंध थे। पति मना करता था। इस बात पर पत्नी ने यह ड्रामा रचा व फर्जी मैडिकल सर्टिफिकेट बनवा कर पति को अंदर करा दिया था।

इसके अलावा देखा जाये तो साल 2015 में कुल 91528 पुरुषों ने आत्महत्या की थी इनमें 24043 पुरुषों की आत्महत्या की वजह पारिवारिक मसले रहे। लेकिन इनमें 2497 पुरुषों ने शादीशुदा जीवन में या पत्नी से कलह की वजह से अपनी जान ली। अक्सर यह समझा जाता है कि पुरुष ताकतवर होते हैं। उन का शोषण नहीं हो सकता। औरत उन के साथ क्रूरता नहीं कर सकती। इस कारण उन्हें थाने या कचहरी से जल्दी कोई राहत नहीं मिलती हैं। दूसरा आजकल या प्रभावशाली अमीर लोगों पर नाबालिग लड़की से रेप का आरोप लगवा कर फंसाया जाता है। फिर उसे पोक्सो में फंसवाने की धमकी दी जाती है। बाद में समझौते के नाम पर मोटी रकम ऐंठी जाती है। हालांकि झूठे आरोप लगाना कानूनन जुर्म है लेकिन इस से कोई नहीं डरता। दरअसल, न कहीं लिखा है, न कोई बताता है कि झूठा केस करने पर कड़ी सजा मिलेगी। इन कमजोरियों का फायदा उठाने के लिए झूठी शिकायतें व मुकदमेबाजी पर जब तक कोई लगाम नहीं लगती, तब तक बेगुनाहों की जिंदगी तबाह होती रहेगी। इस कारण समाज के लोगों को सच के साथ खड़ा होना चाहिए तथा मीडिया और कानून को भी जाँच के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए पीड़ित स्त्री हो या पुरुष बराबर न्याय मिलना चाहिए।

Rajeev choudhary 

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