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जीवन निर्माण के सोपान

जीवन  निर्माण पर सोचने से पूर्व यह आवश्यक है कि हम यह भी समझते कि जीवन क्या है। ‘जीव प्राणधारणे  धातु  के अनुसार प्राण धारण  करने के लिए मनुष्य-पशु आदि के शरीर को जीवित समझा जाता है। प्राण निकलते ही यह शरीर मृत हो जाता है। तो क्या शरीर में प्राण चलते रहने का नाम जीवन हैं। समझा तो ऐसा ही जाता है। किन्तु ऐसा तो पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि सभी कोई कर रहे हैं। फिर मनुष्य तथा अन्य जीवों में क्या विशेषता है। हाँ वे सभी जीव हैं क्योंकि वे प्राणधारण कर रहे हैं किन्तु मनुष्य तो जीव के साथ-साथ मनुष्य भी है। मनुष्य, क्या मतलब? मतलब यह कि अन्य प्राणी केवल जीवन धारणकर रहे हैं। श्वास ले रहे हैं, खा-पी रहे हैं, सन्तान का निर्माण कर रहे है तथा अन्त में मर रहे हैं। तो क्या इसी पूरी प्रक्रिया का नाम जीवन है। नहीं, मनुष्य से भिन्न अन्य प्राणियों को तो यह भी नहीं पता कि वास्तविकता क्या है। आत्मा तो क्या उन्हें तो शरीर का भी ज्ञान नहीं। जबकि मनुष्य को पता है कि जीव केवल शरीर तक ही सीमित नहीं है। शरीर के भीतर कोई एक तत्व आत्मा बैठा हुआ है जो इस शरीर को चला रहा है। उसके रहने पर ही शरीर को जीवित कहा जाता है तथा उसके निकल जाने पर उसी प्रिय, सुन्दर, बलिष्ठ शरीर को अग्नि में जला दिया जाता हैं या भूमि में दफना दिया जाता है। इस प्रकार शरीर में आत्मा के रहने पर ही जीवन है, उसके बिना नहीं। जीवन निर्माण- प्रश्न है जीवन निर्माण का। निर्माण किसका! शरीर का या आत्मा का। शरीर का निर्माण तो हो चुका। माता-पिता ने हमें जन्म दे दिया। आत्मा का निर्माण किया ही नहीं जा सकता क्योंकि वह तो निराकार, निरवयव हैं। तो जीवन निर्माण कैसे हो? जीवन निर्माण का अर्थ है- शरीर तथा आत्मा दोनों में उत्कृष्ट गुणों का आधान  करना तथा यह कार्य जन्म के पहले से ही प्रारम्भ हो जाता है। संसार में हम उत्कृष्ट जीवन तथा निकृष्ट जीवन के रूप में प्राणियों के दो भेद देखते ही हैं। इस उत्कृष्टता की उत्पत्ति को ही जीवन निर्माण कहा जाता है। यदि यह भेद न हो तो मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सभी प्राणी एक जैसे ही हो जाएं। किन्तु ऐसा है नहीं। पशु-पक्षियों की बात छोड़े, उन सबका जीवन लगभग एक जैसा ही होता है क्योंकि  उसका निर्माण नहीं किया गया है जबकि मनुष्यों का जीवन उत्कृष्ट तथा निकृष्ट होता है। यह सब निर्माण का ही भेद है। जीवन निर्माण के सोपान- जीवन निर्माण जन्म के बाद ही शुरु नहीं होता, अपितु उसका प्रारम्भ तो जन्म के बहुत समय पहले ही प्रारम्भ हो जाता है। मनुष्य का निर्माण किन तत्वों  के आधार  पर होता है, इसे दर्शाने वाली एक उक्ति है- तुखम्, तासीर, सोहबत का असर। तुखम् अर्थ है बीज, तासीर का अर्थ हैं -अपनी प्रकृति या संस्कार। सोहबत संगति को कहते हैं । यहां जीवन निर्माण के तीन स्तर गिनाए हैं। मनुष्य ही नहीं, अपितु वृक्ष आदि की उत्पत्ति में भी ये तीन ही कारण प्रमुख हैं। हम रोज देखते हैं कि भूमि में जैसा बीज बोते हैं, वैसा ही पौधा उगता है। उत्तम बीज डालने पर पैदावार अच्छी होती है। घटिया, गन्दा बीज डालने में या तो पौधा उगता ही नहीं, यदि उगता भी है तो शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। उत्तम बीज के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि जहां यह बोया गया है, वह भूमि भी उत्तम तथा घास, कंकड़-पत्थर आदि से रहित हो। यह प्रथम चरण है। द्वितीय चरण यह है कि बीज बोने के पश्चात् जब तक वह अंकुरित होकर भूमि से बाहर नहीं आ जाता तब तक भी उसकी पर्याप्त देखभाल करनी पड़ती है। खाद-पानी की आवश्यकता होती है तो वह भी उसे दिया जाता है। इसके बाद तृतीय अवस्था है कि उगने के बाद भी पौधे की रक्षा अतियत्नपूर्वक करनी पड़ती है। यह दो रूपों में होती है- तेज़  धूप , वर्षा, सर्दी, तथा रोगों आदि से नन्हें पौधों को बचाना तथा उचित मात्रा में खाद-पानी देकर उसकी वृद्धि करना। संसार भर में यही प्रक्रिया है इसमें किसी देश, धर्म  तथा जाति का भेद नहीं है। मानव उत्पत्ति की प्रक्रिया – मानव निर्माण की भी यही प्रक्रिया है। हम में भी देश-जाति तथा धर्म अथवा मजहब आदि का भेद नहीं है। सभी मनुष्यों की उत्पत्ति की प्रक्रिया एक जैसी ही है चाहे कोई किसी भी देश तथा धर्म से सम्बन्धित है। इसमें अब तक न तो कोई परिवर्तन कर सका है न आगे होने की आशा है। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, धनी , निर्धन , राजा, रंक, भारतीय, विदेशी आदि सभी की उत्पत्ति माता-पिता के संयोग से एक ही प्रकार से होती है। नवजात बच्चे सब एक जैसे ही होते हैं। उनमें इस प्रकार का भेद होता भी नहीं है। यह भेद तो उनके माता-पिता, धर्म -मजहब तथा देश-नाते उनको प्रदान करते हैं। मानव निर्माण की प्रक्रिया- जब सबकी उत्पत्ति की प्रक्रिया समान है तो उसके निर्माण की प्रक्रिया भी समान ही होनी चाहिए। बच्चा अबोध  रूप में जन्म लेता है। उस पर हम जैसे भी संस्कार डाल देंगे, वह वैसा ही बन जायेगा। उसका निर्माण हमारे अधीन  है। इस कार्य में बच्चे के माता-पिता, शिक्षक, समाज आदि सभी का सहयोग रहता है। इन सभी का यत्न होता है कि बच्चा बड़ा होकर सभ्य एवं सुसंस्कृत बने जिससे कि समाज एवं देश के लिए उपयोगी हो सके। वेद में इसी लिए कहा गया है-जनम् दैव्यं जनम्। अर्थात् दिव्य गुणों से युक्त सन्तान को जन्म दो। जीवन निर्माण के सोपान प्रथम सोपान- पौधों के भांति ही बच्चे का निर्माण भी उसके जन्म से बहुत पहले से ही प्रारम्भ हो जाता है। प्रथम सोपान के रूप में हैं उसके माता-पिता। माता-पिता का जैसा स्वभाव, स्वास्थ्य आदि होता है बच्चे पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। स्वस्थ माता-पिता की सन्तान स्वस्थ होती है इसके विपरीत माता-पिता के अनेक शारीरिक रोग जन्म से बच्चे को प्राप्त हो जाते हैं। उत्तम सन्तान प्राप्त करने के लिए अनेक माता-पिता कठिन तपस्या भी करते हैं। यथा भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी रूक्मिणी के साथ विवाह के बाद भी 12 वर्ष तक ब्र२चर्य व्रत का पालन किया था तभी तो उन्होंने  प्रद्युम्न पराकर्मी  पुत्र को प्राप्त किया जो शौर्य आदि की दृष्टि से बिल्कुल श्रीकृष्ण के समान ही था। द्वितीय सोपान- जीवन निर्माण का द्वितीय सोपान गर्भावस्था से लेकर बच्चे के जन्म तक है। इस अवधि में भी उसके शरीर तथा आत्मा को इच्छानुसार ढाला जा सकता है। यह ऐसे ही नहीं हो जाता,  अपितु इसके लिए प्रयत्न करना पड़ता है। यह प्रयत्न दो रूपों में होता है- माता के आहार के रूप में तथा शुभ प्रक्रियाओं के द्वारा गर्भस्थ शिशु पर डाले गये उत्तम संस्कारों के रूप में। माता का जैसा भी आहार होगा, बच्चे का स्वास्थ्य वैसा ही बनेगा। तथा जैसा उसका विचार-व्यवहार होगा, बच्चे पर भी उसका प्रभाव अवश्य पड़ेगा। महाभारत काल की घटना प्रसिद्ध  ही है कि अभिमन्यु ने गर्भ में ही चक्रव्यूह  भेदन की कला सीख ली थी। अभिमन्यु के पिता अर्जुन अपनी पत्नी सुभद्रा को यह विद्या समझा रहे थे। गर्भस्थ अभिमन्यु ने उसे ज्यों का त्यों समझ लिया। पुंसवन तथा सीमन्तोनयन संस्कार इसी उद्देश्य से बच्चे के जन्म से पूर्व ही कर दिये जाते हैं। तृतीय सोपान- जीवन निर्माण का तृतीय सोपान बच्चे के जन्म से लेकर 8-10 वर्ष तक है। इस अवधि में भी उसे अभीष्ट दिशा में चलाया जा सकता है। इस समय बहुत सावधानी  की जरूरत पड़ती है। बच्चे के शरीर, मन, मस्तिष्क सभी अत्यन्त कोमल हैं । उनको यत्नपूर्वक हम इच्छित दिशा में चला सकते हैं । इस अवस्था में बच्चे के माता-पिता ही उसके गुरु तथा जीवन निर्माता हैं। वे बच्चे की इच्छानुसार किसी भी दिशा में ढाल सकते हैं। ‘मातृमान् पितृमान् पुरुषः’ इसीलिए कहा गया है। आज कल इस ओर ध्यान नहीं दिया जाता। बड़ा होने पर उसे बदलना कठिन है। चतुर्थ सोपान- किशोरावस्था से लेकर युवावस्था की समाप्ति तक जीवन निर्माण का चतुर्थ सोपान है। इस अवधि में बच्चा जो भी शिक्षा प्राप्त करता है, जैसे वातावरण में रहता है जैसा भोजन आदि करता है, उसी के अनुसार उसका जीवन बन जाता है। शेष जीवन वह इसी आधार पर व्यतीत करता हैं। बच्चे का

यह निर्माण गुरुकुल में आचार्य के संरक्षण में होता था। वह उसे माता के समान ही अपने संरक्षण रूपी गर्भ में रखता था। आजकल यह प्रक्रिया भी समाप्त हो गयी। गुरु-शिष्य का सम्बंध भी समाप्त हो गया है। पंचम सोपान- पंचम सोपान 25 से लेकर 50 वर्ष तक है जबकि वह शिक्षा को प्राप्त करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। इस आश्रम में उसे अनेक सामाजिक एवं राष्ट्रीय उत्तरदायित्त्वों का निर्वाह करना पड़ता है। इस लम्बी अवधि में वह मार्ग भ्रष्ट न हो जाये। उसका जीवन शुद्ध – पवित्र रहे, यह अति आवश्यक है। इसके लिए गृहस्थ के लिए पंच महायज्ञों का विधान  आवश्यक कर दिया गया है। इनमें भी आजकल शैथिल्य देखा जा रहा है। यही कारण है कि हमारा जीवन पारस्परिक ईष्र्या, द्वेष, घृणा, स्वार्थ, लाभ, मोह आदि दोषों से संयुक्त रहता है। यह नारकीय जीवन है। षष्ठ सोपान- इसके बाद वह सांसारिक कार्यों से मुक्त होकर अपनी आत्मोन्नति के लिए यत्न करता है। गृहस्थ आश्रम में जो कमजोरियां उसके शरीर तथा मन में आ गयी थीं उनको दूर करने का यत्न करता है। प्राचीन परम्परा में इसके लिए ही वानप्रस्थ तथा संन्यास का विधान किया गया है। इस समय मनुष्य का जीवन सामाजिक एवं राष्ट्रीय बन जाता है। यह संस्कारित एवं पूर्ण जीवन की पराकाष्ठा है। जीवन निर्माण के साधन संस्कार- जीवन को उन्नति की ओर चलाने के लिए ही भारतीय मनीषियों ने संस्कारों का आविष्कार किया। ये संस्कार संख्या की दृष्टि से सोलह हैं। इनमें मनुष्य जन्म से मृत्यु तक का जीवन बंधा है। यदि ध्यान से देखें तो जन्म से पूर्ववर्ती समय तथा मृत्यु से परवर्तित  अगले जन्म को भी इन संस्कारों के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि शरीर तथा आत्मा दोनों की संयुक्त अवस्था का नाम ही जीवन है। इन सोलह संस्कारों के द्वारा शरीर तथा आत्मा दोनों को ही उन्नत बनाने का यत्न किया जाता है। इन संस्कारों का प्रयोग बच्चे के जन्म से पूर्व माता की गर्भावस्था से ही प्रारम्भ हो जाता है जो कि मृत्यु तक चलता रहता है। इन संस्कारों में एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया निहित है जिसे अपनाकर व्यक्ति के शरीर एवं आत्मा पूर्णतः समुन्नत हो जाते हैं। संस्कार एवं संस्कृति- आत्मा एवं  शरीर को समुन्नत बनाने की जो प्रक्रिया मनीषियों ने अपनायी, उसी का नाम संस्कार है। संस्कृयतेनेन इति संस्कारः अर्थात् जिसके द्वारा आत्मा तथा शरीर का निर्माण अच्छी प्रकार किया जाए, उनको समुन्नत बनाया जाए, उसे ही संस्कार कहते है। यह प्रक्रिया मानवमात्र के लिए एक जैसी ही है तथा समान रूप में लाभप्रद है। किसी भी जाति, धर्म, देश का व्यक्ति इसे अपनाएगा तो निश्चित ही उसकी शारीरिक एवं आत्मिक उन्नति होगी। संस्कार के बिना मनुष्य पशु तुल्य ही रहता है। संस्कारों के द्वारा ही उसके जीवन में गुणाधान किया जाता है जिससे उसका जीवन परिवर्तन हो जाता है। जो इस प्रकार समझा जा सकता है कि दाल-सब्जी बना लेने पर उसमें जीरे आदि का छोंक (बघार) लगाया जाता है जिससे वह स्वादिष्ट तो बनती ही है, उसके गुणों में भी परिवर्तन हो जाता है। दूसरा उदाहरण-एक भद्दी सी लकड़ी को छील-छील कर बढ़ई उसमे सुन्दर मेज-कुर्सी आदि बना देता है। यही उस लकड़ी का संस्कार है। जो लकड़ी अब तक किसी काम की न थी अब कुर्सी-मेज के रूप में प्रिय एवं उपयोगी बन जाती है। यही दशा मनुष्य की है। उसके शरीर तथा मन में अनेक दोष भरे रहते हैं। संस्कारों के द्वारा उन दोषों को दूर करके मनुष्य को निर्दोष बनाकर समाजोपयोगी बनाने का यत्न किया जाता है। संस्कारों के सम्बन्ध में मनु जी कहते है- गार्भौर्हेमैजतिकर्मचैवमौञजी निबंधनैः। वैजिकं गार्भिकं चैनो द्विजानारुपम्ज्यते।। अर्थात् विविध संस्कारों के द्वारा द्विजों के माता-पिता सम्बंधी तथा अन्य दोषों का शमन किया जाता है। संस्कारों आदि के द्वारा मनुष्य को सभी दृष्टियों से समुन्नत बनाने की जो परम्परा अविच्छिन रूप से चलती है उसे ही संस्कृति कहते है। मानव मात्र के लिए एक ही संस्कृति है जबकि सभ्यता प्रत्येक देश, जाति या समुदाय की अपनी पृथक्-पृथक हैं।

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