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त्रैतवाद अर्थात ईश्वर, जीव और प्रकृति में सम्बन्ध

Oct 13 • Arya Samaj, Ved Swadhyay, Vedas • 2294 Views • No Comments

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एक माली ने बहुत सुंदर बाग लगाया। एक युवक सुन्दर कपड़े पहने हुए माली से बाग देखने की इच्छा प्रकट करता हैं। माली एक शर्त पर की आप कोई भी फल-फूल नहीं तोड़ेंगे बाग में जाने कि आज्ञा दे देता हैं। वह युवक बाग में घूमते हुए फल-फूल आदि देखकर मोहित हो जाता है। उसके मन में विचार आता है कि अगर मैं कुछ फूल तोड़ कर अपनी जेब में छुपा लूँ तो किसी को पता नहीं चलेगा। उस युवक ने कुछ फल-फूल तोड़ कर अपनी जेब में छिपा लिये। जब वह बाहर निकलने लगा तो माली ने नियम अनुसार उसकी जेब तलाशी। माली ने उस युवक को अपराध में पुलिस के हवाले कर दिया। चोरी के दंड में उसे जेल भेज दिया गया।

यह जो माली है ईश्वर है जिन्होंने सृष्टि रूपी यह सुन्दर बाग लगाया है। ईश्वर ने आत्मा को मनुष्य रूप धारण कर घूमने अर्थात कर्म करने की स्वतंत्रता दी है। मनुष्य नियम का पालन करने के स्थान पर भोग रूपी कर्म करता है। इसके अपराध में ईश्वर उसे अगले जन्म रूपी बाग में कर्म करने के लिये भेज देता हैं।
यही त्रैतवाद का अटल सत्य सिद्धांत है। ईश्वर मनुष्य को मोक्ष रूपी सुख देने के लिये सृष्टि का निर्माण करता है एवं कर्म की स्वतंत्रता का अधिकार देता हैं। यजुर्वेद के 40 वें अध्याय के प्रथम मंत्र में सन्देश दिया गया हैं-
ईशावास्यमिदम् सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत। तेनत्येक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम॥
ईश्वर सदा सब को देख रहा है, यह जगत ईश्वर से व्याप्त है और ईश्वर सब स्थान पर विद्यमान है। संसार के सभी पदार्थों को त्याग की भावना से भोग कर। धर्मात्मा होकर इस लोक के सुख और परलोक के मोक्ष की अभिलाषा कर।

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