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नांगेली, इतिहास के पन्नों में छिपी एक कहानी

Dec 27 • Samaj and the Society • 2735 Views • No Comments

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केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने 19वीं सदी में दक्षिण भारत में अपने स्तनों को ढकने के हक के लिए लड़ाई लड़ने वाली नांगेली नाम की महिला की कहानी को पाठ्यक्रम से हटाने का फैसला किया है. 2006-2007 में “जाति व्यवस्था और वस्त्र परिवर्तन” नाम से इस सेक्शन में इस आंदोलन में जोड़ा गया था. उस आंदोलन के बारे में किताबों में बताए जाने पर कई संगठनों ने आपत्ति की थी. कई संगठनों का इस बारे में कहना था कि एक औरत का ब्रेस्ट को ढकने के लिए आंदोलन और उसके ब्रेस्ट को काट लिए जाने की कहानी शर्मनाक है और बच्चों को नहीं पढ़ाई जानी चाहिए. पर प्रश्न यह है कि आखिर क्यों न पढाई जाये जातीय व्यवस्था का यह कुरूप चेहरा? बल्कि इस कहानी के साथ बच्चों को वीर सावरकर की मोपला भी पढाई जानी चाहिए

आखिर क्या नांगेली और उसके आन्दोलन की कहानी जिसे पढ़कर समाज और सरकार आज शर्मसार हो रही है. पर प्रश्न यह है कि यदि यह शर्म 19 वीं सदी के धर्म के ठेकेदारों और शासकों को होती तो क्या हम धार्मिक रूप से इतने बड़े बदलाव केरल के अन्दर होते? नंगेली का नाम केरल के बाहर शायद किसी ने न सुना हो. किसी स्कूल के इतिहास की किताब में उनका जिक्र या कोई तस्वीर भी नहीं मिलेगी. लेकिन उनके साहस की मिसाल ऐसी है कि एक बार जानने पर कभी नहीं भूलेंगे, क्योंकि नंगेली ने स्तन ढकने के अधिकार के लिए अपने ही स्तन काट दिए थे. केरल के इतिहास के पन्नों में छिपी ये लगभग सौ से डेढ़ सौ साल पुरानी कहानी उस समय की है जब केरल के बड़े भाग में त्रावणकोर के राजा का शासन था.

उस समय जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी थीं और निचली जातियों की महिलाओं को उनके स्तन न ढकने का आदेश था. उल्लंघन करने पर उन्हें “ब्रेस्ट टैक्स” यानी “स्तन कर” देना पड़ता था. नांगेली भी कथित निचली जाति में आने वाली महिला थीं. उन्होनें राजा के इस अमानवीय टैक्स का विरोध किया. नांगेली ने अपने स्तन ढकने के लिए टैक्स नहीं दिया मामला राजा तक पहुंचा तो सजा के तौर पर इस जुर्म के लिए वहां के राजा ने नांगेली के स्तन कटवा दिए. जिससे उसकी मौत हो गई. नांगेली का मौत ने दक्षिण भारत में एक सामाजिक आंदोलन की चिंगारी भड़का दी.

इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया. नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं. उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे. नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था. वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं. लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था. नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी. पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी.

इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं. 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए. बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने और यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं. धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया. इस समुदाय को जातीय व्यवस्था के कारण सम्मान तो दूर कपडे भी नहीं मिल रहे थे उस समय इस्लाम ने इन्हें बुर्का दिया ईसाइयत ने सम्मान जिस कारण केरल में बड़ा धार्मिक समीकरण उलट पुलट हुआ!

ब्रेस्ट टैक्स का मकसद जातिवाद के ढांचे को बनाए रखना था.ये एक तरह से एक औरत के निचली जाति से होने की कीमत थी. इस कर को बार-बार अदा कर पाना इन गरीब समुदायों के लिए मुमकिन नहीं था. केरल के हिंदुओं में जाति के ढांचे में नायर जाति को शूद्र माना जाता था जिनसे निचले स्तर पर एड़वा और फिर दलित समुदायों को रखा जाता था. उस दौर में दलित समुदाय के लोग ज्यादातर खेतिहर मजदूर थे और ये कर देना उनके बस के बाहर था. ऐसे में एड़वा और नायर समुदाय की औरतें ही इस कर को देने की थोड़ी क्षमता रखती थीं. जो भी इस नियम की अहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता. अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते. सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था. क्यों न होता! आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें.

नांगेली का मौत के बाद सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई. सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं. इसी वर्ष मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है. अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं. 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया. कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक छीन कर लिया.

अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा हो तो सोचो इस जाति पर कितने अत्याचार हुए होंगे हिन्दुओं को एक बार जरुर सोचना चाहिए कि आखिर गलती किसकी थी? उम्मीद करते है इस लेख को पढ़कर आप लोग वीर सावरकर की पुस्तक मोपला जरुर पढेंगे ताकि भारत की धार्मिक त्रासदी का सच्चा इतिहास जाना जा सके. आखिर क्या कारण रहे की कभी दुनिया में हमारा वैदिक परचम लहराता था जो आज सिर्फ भारतीय भू-भाग तक सिमट कर रह गया. गलती हमारी थी तो स्वीकारोक्ति भी हमारी होनी चाहिए या फिर सोचना चाहिए क्या हम फिर यही गलती अभी भी तो नहीं दोहरा रहे है?...राजीव चौधरी

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