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पंडित नेहरू और आर्यसमाज

Sep 27 • Samaj and the Society • 694 Views • No Comments

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पंडित नेहरू अपनी अंग्रेजों जैसी परवरिश और पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव के चलते भारतीय संस्कृति और अध्यात्म से जीवन में कभी प्रभावित नहीं रहे। यही कारण था कि वह आर्यसमाज जैसे राष्ट्रवादी आंदोलन से कभी नहीं जुड़े। एक इतिहासकार होने के बाद भी विदेशी लेखकों की मान्यताओं का नेहरू जी अंधानुसरण करते रहे। आर्यों का विदेशी होना, वेदों का गडरियों का गीत होना, वेदों में पशुबलि आदि मान्यताओं को समर्थन नेहरू जी के ऊपर पश्चिमी लेखकों के प्रभाव को प्रदर्शित करता है। आर्यसमाज के विषय में भी उनकी मान्यता पश्चिमी ईसाई लेखकों से मेल खाती है। अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया (भारत एक खोज) में आर्यसमाज के विषय में लिखा-

The Aryasamaj was a Reaction to the Influence of Islam and Christianity, more especially the former. It was a crusading and reforming movement from within, as well as a defensive organisation for protection against external attacks.It introduced proselytization into Hinduism and thus tended to come into conflict with other proselytizing religions. The Aryasamaj which has been a close approach to Islam, tended to become a defender of everything Hindu, against what it considered as the encroachments of other faith.

Ref Page No. 335-336 Discovery of India by Jawahar Lal Nehru

नेहरू जी आर्यसमाज को इस्लाम और ईसाइयत के विरुद्ध प्रतिक्रिया मात्रा मानते थे। नेहरू जी आर्यसमाज को एक इस्लाम और ईसाइयत के समान सांप्रदायिक संगठन मानते थे। नेहरू जी की यही मान्यता गलत थी कि आर्यसमाज एक सांप्रदायिक संगठन है जो इस्लाम और ईसाइयत के विरुद्ध खड़ा हुआ है। नेहरू जी कि आर्यसमाज के विषय में यह मान्यता विदेशी ईसाई लेखकों की सोच पर आधारित थी। क्योंकि आर्यसमाज ने उनके भारत को ईसाई बनाने के स्वप्न को धूमिल कर दिया था। नेहरू जी ने स्वामी दयानंद द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश में दी गई भूमिका को भी ध्यान से पढ़ा और समझा होता तो उनकी आर्यसमाज के विषय में गलत धारणा कभी न बनती।

स्वामी दयानंद जी महाराज सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका में स्वयं लिखते हैं की

“यद्यपि आजकल बहुत से विद्वान प्रत्येक मतों में हैं, वे पक्षपात छोड़ सर्व तंत्र सिद्धांत अर्थात जो जो बातें सब के अनुकूल सब में सत्य हैं, उनका ग्रहण और जो एक दूसरे से विरुद्ध बातें हैं, उनका त्याग कर परस्पर प्रीति से वर्ते वर्तावें तो जगत का पूर्ण हित होवे। क्यूंकि विद्वानों के विरोध से अविद्वानों में विरोध बढ़ कर अनेक विध दुःख की वृद्धि और सुख की हानि होती हैं। इस हानि ने, जो की स्वार्थी मनुष्यों को प्रिय हैं, सब मनुष्यों को दुःख सागर में डुबा दिया हैं।”

खेद है कि नेहरू जी की आर्यसमाज के विषय में नकारात्मक छवि जीवन पर्यन्त बनी रही। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य के 24 अगस्त ,1959 के अंक का एक पुराना संस्मरण ‘इतिहास के पन्नों से’ शीर्षक के नाम से 25 सितम्बर, 2016 को प्रकाशित हुआ है। इस अंक में एक पुराना संस्मरण इस प्रकार से दिया गया है-

“आर्यसमाज को सांप्रदायिक कह देने पर उन्हें (नेहरू जी) पंजाब के एम.एल. सी श्री वीरेंदर ने चुनौती दी और पंडित जी को लिखित रूप में स्पष्टीकरण देना पड़ा। ”

यह घटना से निष्कर्ष निकलता है कि श्री वीरेंदर जी प्रसिद्द आर्यसमाजी नेता ने 1959 में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू से आर्यसमाज को सांप्रदायिक कहने पर लिखित रूप से माफीनामा लिखवाया था।

इससे यही सिद्ध होता है कि आर्यसमाजी नेता सिद्धांत के लिए कितने पक्के थे और नेहरू जैसों से माफीनामा लिखवाना उनके व्यक्तित्व और प्रभाव को प्रदर्शित करता है।

डॉ विवेक आर्य

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