THE-NUN

पवित्रता के नाम पर यह कैसा पाप..?

Jul 29 • Samaj and the Society • 274 Views • No Comments

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साल 2014 और महीना था फरवरी का भारत के उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक सरकार के मुख्य सचिव को निर्देश देते हुए कहा था कि प्रदेश के देवनगर जिले के एक मंदिर में महिलाओं को जबरन ‘देवदासी’ बनने से रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाये. उच्चतम न्यायालय में दायर इस याचिका में देवदासी प्रथा को राष्ट्रीय शर्म का विषय बताया था. उस समय अनेक बुद्धिजीवी लोग मैदान में आये और कागज पर कलम की खुदाली से हिन्दू धर्म में व्याप्त अनेक कुप्रथाओं को खोद-खोदकर सामने रख धर्म पर सवाल उठाये थे.

शायद उत्तर भारत में रहने वाले बहुत सारे लोग इस प्रथा से अनभिज्ञ हो तो उन्हें जानना चाहिए कि छठी सातवीं शताब्दी में दक्षिण भारतीय मंदिरों में आरम्भ हुई प्रथा में मंदिर के देवताओं से कुवारीं लड़कियों की शादी कर दी जाती थी. इसके बाद वह अपना पूरा जीवन ईश्वर को समर्पित कर देती थी. हालाँकि यह कोई सनातन धर्म का हिस्सा नहीं था, न हमारें वेदों और या उपनिषदों में इस प्रथा का जिक्र. इसलिए 19 सदीं के पुनर्जागरण काल में इस प्रथा पर आवाज़ उठने लगी थी. जिसे बाद में कानून द्वारा अपराध की श्रेणी में लाया गया था. अगर यह प्रथा आज भी कहीं किसी कोने में जारी है, तो इसकी मुख्य वजह इस कार्य में लगी महिलाओं की स्वयं सामाजिक स्वीकार्यता है.

दरअसल ये हिन्दू समाज की जागृत चेतना के असर का परिणाम था कि धर्म के नाम पर या प्राचीनता के नाम पर हम कुप्रथाओं को नहीं ढ़ों सकते. लेकिन इस प्रथा का एक दूसरा रूप ईसाई समाज में अभी तक जारी है. ईसाई समाज में स्त्रियाँ भी अपना जीवन धर्म के नाम कर देती हैं और आजीवन कुँवारी रहती हैं. इन्हें “नन” कहा जाता है. जब यह नन बनाने की शपथ लेतीं हैं तो एक औपचारिक समारोह में विवाह के वस्त्र धारण किए इनका “ईसा मसीह से विवाह” रचाया जाता है. किन्तु इस प्रथा के खिलाफ आजतक किसी सामाजिक संगठन ने याचिका दायर करने की हिम्मत नहीं जुटाई और न उच्च न्यायालय द्वारा कोई निर्देश जारी किया गया. क्योंकि मामला वेटिकन से जुड़ा है. वेटिकन के प्रतिनिधि बिशप चर्च के अधिनायकवाद के खिलाफ भला कौन बोल सकता है? जबकि अनेक नन चर्च के इस सिस्टम के अंदर दिन-रात घुट रही हैं.

इस घुटन को निकालते हुए कुछ समय पहले एक नन सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा बाजार में आई थी. आमीन एक नन की आत्मकथा यह उनके अपने जीवन के अनुभवों की कथा थी. यह एक भयावह अनुभव हैं. बल्कि इतना भयावह अनुभव कि पढ़कर चर्च और पादरियों से चिढ़ हो जाए. अपने काल्पनिक पति जीसस के प्रति पूर्णतः समर्पित, सत्रह साल की उम्र में कॉन्वेंट में दाखिल हो जाने वाली और लंबे समय तक नन बनी रहने वाली सिस्टर जेस्मी ने जब खुली आँखों से अपने धर्म की बुराइयों को देखा तब उन्होंने कॉन्वेंट की चहारदीवारी तोड़कर बाहर निकलने का दुस्साहसिक फैसला ले लिया. वह मीडिया के सामने आईं और चर्च की खामियों पर खुलकर बोलीं, धवल वस्त्रों से सुसज्जित पवित्र माने जाने वाले पादरियों के वासना के उदाहरण के पेश किये तो ननों के समलैंगिक आचरण के बारे में खुलकर लिखा. उनका यह फैसला कहीं से भी क्षणिक आवेश का नतीजा नहीं था. लंबे समय तक वह इसमें बनी रहीं और इस शोषण को झेलती रहीं.

प्रभु जीजस को पति मानकर ईसाइयत के रास्ते स्वेच्छा से जाने वाली नन जेस्मी की आत्मकथा कैथोलिक धर्मसंघो के लिए एक भूचाल बन कर आयी थी, कहा जाता है आस्था का संस्था से संघर्ष पुराना है. जेस्मी का संघर्ष भी कुछ ऐसा ही है. कभी जीजस में पूरी आस्था डूबी जेस्मी जब परिवार की अनिच्छा,रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद वह नन ही बनीं, जीजस को पति स्वीकार कर आजीवन ब्रह्मचर्य की शपथ ली किन्तु उसनें सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका शोषण होगा और एक दिन भागकर अपने इसी भगवान से तलाक लेना पड़ेगा. लम्बे समय तक समलैंगिक शोषण की शिकार रहीं. एक भ्रष्ट पादरी द्वारा उनका यौन-शोषण हुआ. जिसके बाद पवित्रता के नाम पर चर्चो के अन्दर हो रहे पाप सिस्टर जेस्मी ने उजागर किये.

ईसाई समाज की धार्मिकता और शुचिता के इस्पाती पर्दों के पीछे छिपे कड़वे सच को सामने लानी वाली जेस्मी ही नहीं बल्कि इसी दौरान केरल की एक पूर्व नन मैरी चांडी ने आत्मकथा के जरिए कैथोलिक चर्चों में पादरियों द्वारा ननों के यौन शोषण पर से पर्दा हटाकर सच को बयाँ किया था अपनी आत्मकथा ‘ननमा निरंजवले स्वस्ति’ में सिस्टर मैरी चांडी ने लिखा है कि एक पादरी द्वारा रेप की कोशिश का विरोध किए जाने के कारण ही उन्हें 12 साल पहले चर्च छोड़ना पड़ा था. चर्च और उसके एजुकेशनल सेंटरों में व्याप्त ‘अंधेरे’ को उजागर करने की कोशिश करने वाली सिस्टर मैरी ने लिखा कि चर्च के भीतर की जिंदगी आध्यात्मिकता के बजाय वासना से भरी थी. मैं 13 साल की आयु में घर से भागकर नन बनी बदले में मुझे शोषण और अकेलापन मिला. मेरी ने आगे लिखा है, ‘मुझे तो यही लगा कि पादरी और नन, दोनों ही मानवता की सेवा के अपने संकल्प से भटककर शारीरिक जरूरतों की पूर्ति में लग गए हैं. इन अनुभवों से आजिज आकर चर्च और कॉन्वेंट छोड़ दिया. मेरी के चर्च छोड़ने और इस सच्चाई को सामने रखने के बावजूद भी चर्चों में लगातार हो रहे इन घ्रणित कार्यों पर कोई लगाम न लग सकी.

एक के बाद एक नन के खुलासे के बाद भी पवित्रता के नाम पर यह कुप्रथा आज भी ढोई जा रही है. आखिर क्यों एक नन शादीशुदा नहीं हो सकती? दुनिया भर में फैली कुरूतियों पर शोर मचाने वाले ईसाई संगठन इस बात पर कब राजी होंगे कि एक महिला नन इन्सान है और उसका विवाह किसी मूर्ति के बजाय इन्सान से ही किया जाये? सब मानते है कि धर्म अपने मूल स्वरूप में कोई बुरी चीज नहीं है. विरोध वहाँ शुरू हो जाता है जहाँ धर्म की गलत व्याख्याओं के बल पर कोई किसी का शोषण करने लग जाता है और धार्मिक पाखंडों, धर्म की बुराइयों, और आडंबरों के खिलाफ लिखने वाले कलमकार आखिर ऐसे मामलों पर हमेशा मौन क्यों हो जाते है?….राजीव चौधरी

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