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फतवों में यह दोगलापन क्यों?

Mar 16 • Samaj and the Society • 578 Views • No Comments

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जहाँ आज पूरा विश्व अपनी आधुनिक शिक्षा, स्वास्थ, मूलभूत सुविधाओं के लिए मेहनत कर रहा है वही मुस्लिम समाज आज भी इस्लाम को लेकर दुगुना आक्रमक होता दिख रहा है. हालाँकि हमेशा से इस्लाम पर बोलना लिखना एक वर्जित और संवेदनशील विषय समझा जाता रहा है. लेकिन हाल के दिनों में कई खबरें ऐसी आई जो रोचकता भले ही ना रखती हो लेकिन इस्लामी समाज को समझने के लिए काफी मायने रखती है. महज 16 साल की मासूम नाहिद आफरीन को 46 मौलवियों के फतवे का सामना करना पड़ रहा है. नाहिद का कसूर सिर्फ इतना है कि अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए उसने संगीत को चुना और इस्लामिक आतंक के खिलाफ गाना गाया. जिस पर मौलवियों ने यह कहकर फतवे जारी कर दिए कि इस्लाम में गीत, संगीत हराम है. जबकि न जाने कितने मुस्लिम गीतकार, संगीतकार, गायक और कलाकार इस भारत में जन्मे जिनके खिलाफ कभी कोई फतवा नहीं आया. आखिर फतवों में यह दोगलापन क्यों? क्यों हमेशा इन फतवों का शिकार महिला या फिर उभरती प्रतिभाएं बनती है? टेनिस में सानिया मिर्जा, दंगल फिल्म में पहलवान की किरदार अदा करने वाली जयरा वसीम और अब नाहिद आफरीन. जबकि कुछ दिन पहले कश्मीर मांगे आजादी वाले गेंग के खिलाफ इनका कोई फतवा नहीं आया.

इस मामले में उलेमा-ए-कराम का कहना है कि संस्था नाचने गाने के संबंध में काफी समय पहले फतवा जारी कर चुकी है. नाहिद हो या कोई और गाना बजाना इस्लाम मजहब में नाजायज है. पर सवाल यह है कि अजान भी तो एक किस्म का गीत या संगीत है जो दिन पांच बार इन्ही इलेक्ट्रोनिक माध्यमों से मस्जिद में गाया जाता है क्या वो भी गलत है? यदि नहीं तो फिर मजहब के नाम पर किसी महिला पर गल घोटू फतवों को जारी करने का ओचित्य क्या है?

इस्लाम के नाम पर चल रहे कट्टर धार्मिक संगठन जैसे तालिबान, आईएस और बोको हराम ने पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक, सीरिया और नाइजीरिया में महिलाओं को दूसरे नंबर का दर्जा तो दे ही दिया है. लेकिन दुखद स्थिति यह है कि भारत जैसे प्रगतिशील देश में भी आज ऐसी विचारधाराएं किसी न किसी रूप में प्रचलित हैं. जो यह प्रश्न उठती हैं कि मुस्लिम महिला को पुरुषों के समान अधिकार है या नहीं? मैं शरियत या इस्लामी मजहबी मामलों का कोई जानकार तो नहीं हूं, लेकिन मैंने इस्लामी समाज का जितना अध्ययन किया है, उसके आधार पर कह सकता हूं कि  इस्लाम में अजान भले ही एक हो लेकिन आवाज अनेक आवाज है, जुर्म के खिलाफ, महिलाओं सम्मान के लिए, सामाजिक भेदभाव के लिए या आतंक के लिए इस्लामी समाज में हर किसी के अपने तर्क और अनुभव है आयतों की अलग-अलग व्याख्या है जिनको लेकर अक्सर मुस्लिम समाज को मीडिया के एक बड़े वर्ग के सामने रुबुरु होना पड़ता है.

हाल ही में हिंदी सिनेमा की जानीमानी एक्ट्रेस शबाना आजमी ने ब्रिटिश संसद परिसर में आयोजित एक समारोह में कहा, मुझे किसी एक नजरिए से मत देखिए, अपनी इच्छा के मुताबिक मुझे सीमित करने का प्रयास मत करिए तुच्छ राजनीतिक फायदों के लिए सभी मुसलमानों को एक चश्मे से न देखे. आज पूरी दुनिया में यह प्रयास किया जा रहा है कि हमारी पहचान को सिर्फ धर्म के दायरे में रख दिया जाए. मैं भारतीय मुस्लिम हूं और मैं सउदी अरब के मुस्लिम के साथ कोई लगाव महसूस नहीं करती. हो सकता है बेशक उनका यह भाषण भावपूर्ण हो जो सभी मुस्लिमों के एक नजरिये से न देखने की वकालत करता हो लेकिन शबाना का यह कहना कि अरब से कोई लगाव नहीं, शायद सही नहीं बैठता. कारण शबाना आजमी का नाम अरबी भाषा में न कि भारतीय भाषा में दूसरा जिस दिन भारत का मुसलमान अरब के दिए नामों से मुक्त हो जायेगा तब उसे लोग जरुर इस्लाम से अलग चश्मे से देखना शुरू कर देंगे.

अभी पिछले दिनों की अरब एक घटना ने मानवीय संवेदना को खुरच दिया था लेकिन तब भारतीय इस्लाम की पैरवी करने वाले सेलेब्रेटी या इस्लाम की रक्षा के बहाने फतवे जारी करने वाले मौलाना चुप बने रहे. अहमदाबाद की एक महिला नूरजहां अकबर हसन ने अरब की पोल खोली थी कि अरब में किस तरह सेक्स दासी के रूप में उसे काम करना पड़ा. कैसे मालिक की मांग पूरी न करने पर उन्हें प्रताड़ित किया जाता था. उसने खुद बताया कि मुझे पीटा जाता था, बाल खींच-खींचकर मेरे सिर को दीवार पर मारा जाता था. मैं बचने के लिए पहली और दूसरी मंजिल से छलांग तक लगा दिया करती थीं. वहां से भारत लौटीं लड़कियां इस मामले में चुप रहना पसंद करती हैं लेकिन बीते साल अक्टूबर में भारत लौटीं नूरजहां ने इस बारे में आवाज उठाना ठीक समझा. पर कोई आवाज इसके पक्ष में सुनाई नहीं दी कारण मामला अरब से जुडा था. हालाँकि में खुद इस खबर को पढ़कर भूल चूका था पर जब शबाना ने खुद को अरब से अलग कहा तो मेरी संवेदना के सुर नूरजहाँ से जुड़ते पाए. यदि भारत में कोई ऐसी घटना घटित होती तो मेरे ख्याल से इसके तार अभी तक सरकार पर विपक्ष द्वारा जोड़ दिए जाते. और मुल्ला मौलवियों द्वारा इस्लाम पर सवाल बना दिया गया होता.

राजीव चौधरी

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