मानवाधिकार आयोग के दो चेहरे

Aug 23 • Uncategorized • 1011 Views • No Comments

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आज पूरे विश्व में ताकत और पैसे के बल पर होने वाली हिंसा इस बात का प्रत्यक्ष सबूत है कि मानवता खतरे में है। हाँ मानवता बच सकती है उसे सहेजा और सुरक्षित रखा जा सकता है यदि उसके रखवाले पूर्ण जिम्मेदारी से अपनी भूमिका का निर्वाहन करें| आज एमनेस्टी इंटरनेशनल की भूमिका में हर जगह दोहरा मापदंड दिखाई दे रहा है| आतंकी याकूब मेमन की फांसी के मामले में मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल का चेहरा सबके सामने आ ही गया था लेकिन अभी हाल ही में बेंगलूरू पुलिस ने एमनेस्टी इंटरनेशनल और उसके सेमिनार में कथित तौर पर भारत विरोधी नारे लगाने वालों के ख़िलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया है| कश्मीर में आतंकी मरे तो मानवाधिकार आयोग आँखों में आंसू लेकर जनाजे में शामिल हो जाता है किन्तु जब देश की रक्षा करते हमारे जवान सरहद पर या आतंकी हमलों में शहीद होते है तो ये देश विरोधी संस्था गायब हो जाती है| देश विरोधी इस लिए क्योकि इस संस्था के कार्यकर्ताओं पर भारत विरोधी नारे लगाने पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया है| सर्वविदित है कि दादरी में अखलाक की मौत पर मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने विश्वभर में देश में असहिष्णुता के बढ़ावे को लेकर जो भ्रामक प्रचार किया वो किसी से छिपा नहीं है| वैश्विक मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल जो खुद को मानवता का रक्षक बताता है ने जम्मू एवं कश्मीर सरकार में पैलेट गन का इस्तेमाल बंद करने की मांग की| किन्तु सेना के जवानों पर ग्रनेड व् पत्थरों से हो रहे हमले को कभी भी स्वाभाविक रूप से गलत और विवेकहीन नहीं बताया|
बुरहान वानी, अफजल गुरु, याकूब मेनन अजमल कसाब आदि की मौत पर रोना वाला कन्हिया कुमार व उमर खालिद के देश विरोधी नारों को अभिवयक्ति की आजादी बताने वाला मानवधिकार आयोग और फिलिस्तीन पर इजराइल हमले पर रोने वाला मानवधिकार आयोग कहीं आतंक को अंदरूनी बढ़ावा तो नहीं दे रहा है? क्योंकि जब 14 अप्रैल 2014 को चिबोक के गवर्नमेंट गर्ल्स सेकेंडरी स्कूल की 276 लड़कियों को बोको हरम के आतंकियों द्वारा अगवा कर लिया जाता तब मानवधिकार आयोग शांत पाया जाता है परन्तु जब रूस द्वारा खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट पर हमला करते समय सीरिया के अलेप्पो प्रांत में एक स्कूल में 12 स्कूली बच्चों की मौत हो जाती है तो मानवधिकार आयोग रोता दिखाई देता है| मतलब आतंक कुछ करता है तो खामोश पर यदि आतंकियों या उसके समर्थको पर कुछ होता है तो मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल सिसकता दिखाई देता है| जब सीरिया में समुंद्र के किनारे एक कुर्दी शरणार्थी एक बच्चे एलन कुर्दी की लाश पाई जाती है तो समूचे विश्व की मीडिया और मानवाधिकार आयोग बिलखता दिखाई देता पर जब बलूचिस्तान में सड़कों के किनारे पाकिस्तानी सेना द्वारा बलूची बच्चों की लाश हत्या कर फेंक दी जाती है उन्हें जलाकर मारा जाता है तो मानवाधिकार आयोग मौन पाया जाता है| क्या बलूच लोग मानव नही है? क्या गुलाम कश्मीर में इन्सान नहीं रहते या वहां पाक सेना का अत्याचार एमनेस्टी को नहीं दिखता? हम मानवता के पक्षधर है ना ही हम एलन कुर्दी की मौत को सही बताते ना सीरिया में 12 बच्चों की| दोनों ही घटनाएँ निंदा का विषय थी| मनुष्य होने के नाते दुःख होता है| किन्तु हमे तब भी इतना ही दुःख होता है जब यजीदी बच्चियों को इस्लामिक स्टेट के लड़ाके यौनदासी बनाते है, उन्हें सिगरेट के पैकिटो के बदले बेचते है और चिबोक से सैंकड़ो बच्चियां अपहरण कर ली जाती है| परन्तु तब हमारी आँखे मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल को भी खोज रही होती है कि उनकी आँखों में भी इस घटना पर कुछ नमी दिख जाये| आखिर तब क्यों इन तथाकथित मानवतावादी ठेकेदारों का एक स्वर कहीं सुनाई नहीं देता? अब यह प्रश्न जरुर प्रासंगिक होता है कि आखिर इनकी इस दोहरी मानसिकता को भोजन-पानी कहां से मिलता है। आतंक पर दुनिया को फटकारने वाला स्वम्भू दरोगा अमेरिका भी यहाँ गोरे काले आतंक के भेद में उलझा है| कोई भी सामाजिक चिंतनशील प्राणी, कोई भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने वाला व्यक्ति कभी भी सभ्यताओं के संघर्ष को सही नहीं बताएगा| आज वो मुस्लिम भी दिखाई नहीं दे रहे है जो मोहम्मद साहब के चित्र पर लाखो की संख्या में सड़कों पर उतर जाते है| गाजा पर हमलें को इजरायल के खिलाफ सड़कों उतारने में देर नहीं लगाते| ना आज वो मौलवी दिखाई दे रहे है जिनका वंदेमातरम् कहने पर धर्म खतरे में आ जाता है किन्तु सेकड़ों बच्चियों के यौनाचार पर नहीं क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि मुसलमानों को इस्लाम के अलावा किसी चीज से मतलब नहीं और इस्लामिक कट्टरपंथ को इस्लाम के निजाम की आड़ में इन हरकतों से शर्मिंदगी नहीं? यदि ऐसा है तो यह बात बिलकुल सत्य के पास है कि जब तक यह दोहरा जब चरित्र लेकर मानवधिकार आयोग इस आतंकी मानसिकता को पुष्ट करता रहेगा तब तक दुनिया में शांति की उम्मीद ही नहीं हो सकती है।

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