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मेंहदीपुर बालाजी में मंडराते हैं अज्ञानता और अशिक्षा के भूत-प्रेत

राजस्थान के दौसा और सवाई माधोपुर के बीच में है हिंदुओं का एक तीर्थ स्थल मेंहदीपुर बालाजी का मंदिर। मेंहदीपुर बालाजी मंदिर का प्रभाव राजस्थान के साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली,पंजाब और हरियाणा तक फैला है। श्रद्धालु यहां पर अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए जाते हैं। इस स्थान पर तीन देवताओं को पूजा जाता है पहले बालाजी यानि हनुमान दूसरे प्रेतराज सरकार और तीसरे कोतवाल भैरवनाथ। हाल की अपनी जयपुर यात्रा के दौरान मेरा यहां जाना हुआ।

मंदिर आने से मिलती है प्रेत बाधा से मुक्ति 

इस मंदिर के बारे में यह मान्यता प्रचलित है कि यहां आम लोगों के अलावा ज्यादातर वो लोग आते हैं जिन पर भूत प्रेत का साया, या कोई ऊपरी साया या प्रेत बाधा होती है। कहते हैं यहां आकर इन तीनों देवताओं के दर्शन से इंसान को बाहरी हवा संकट से मुक्ति मिल जाती है। खैर मैं इस मंदिर को महिमामंडित करने का कतई इरादा नहीं रखती।जाने से पहले इस मंदिर के बारे में गूगल करके गई थी सो देखना चाहती थी यहां ऐसा होता क्या है ? माफ कीजिए मेरी आंखों ने यहां जो देखा और बुद्धि ने जो समझा वो आपकी आस्था को आहत कर सकता है।

मंदिर के आस-पास गंदगी का अंबार

इस मंदिर के आसपास गंदगी का ऐसा आलम है कि कोई अच्छा भला इंसान तो यहां की गंदगी देखकर ही बीमार हो जाएं। और उसे भूत-प्रेत लग जाए। मैं अपने पति के साथ मंदिर पहुंची और श्रद्धालुओं के साथ कतार में जा लगी। संकरी सी रोड पर सैंकड़ों लोग प्रसाद और फूल लेकर लाइन में लगे थे अचानक मेरी नजर रोड के साइड में कूड़े के ढेर के पास बेहोश पड़ी एक स्त्री पर गई, उसके बाल खुले थे और जिसके आसपास सूअर भी मंडरा रहे थे। मैंने लोगों से पूछा तो उन्होंने कहा कोई प्रेत बाधा का चक्कर है। मैने कहा अरे उसकी मदद करनी चाहिए कम से कम उसे कचरे के ढेर से अलग लिटाने में मदद कीजिए। सबने मुंह फेर लिया और कुछ मुझे शिक्षा देने लगे लगे बीच में ना पड़ो भूत प्रेत लग जाएंगे। मन तो हुआ बोलूं उनसे कि कितने विरोधाभासी हैं आप लोग। आप भगवान के दर्शन करने जा रहे हैं और आप किसी की मदद नहीं कर सकते। भगवान ने क्या यही सिखाया है आपको। खैर मैने पानी खरीदकर उस महिला के चेहरे पर पानी डाला, उसे पानी पिलाया वो जागी और इतना जोर से दहाड़े मारकर चीख कर रोने लगी कि मैं समझ ही नहीं पाई। वो चिल्लाकर मुझे खुद से दूर जाने को कहने लगी। खैर हम गंदी बदबूदार, रुकी हुई नालियों वाली इस रोड पर लाइन में आगे बढ़े। आलम यह था कि लाइन में लगे लोगों के हाथ में लटकी प्रसाद की थैली भगवान तक पहुंचने से पहले सूअरों के मुंह में जा रही थी।

बेसुध, बदहवास, बिखरे बालों वाली लड़कियां

आगे बढ़ने पर एक अजीब दृश्य दिखाई दिया। वहां खुले बिखरे बाल वाली लड़कियों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी। पूछने पर पता चला सब प्रेत बाधा के निवारण के लिए आईं हैं। अंदर बालाजी के दर्शन करने के बाद हम प्रेतराज सरकार से भी मिलने गए। वहां नजारा ही अलग था मंदिर के इस हिस्से में जहां प्रेतराज सरकार हैं, जगह-जगह बेसुध और होशोहवास खोई लड़कियां अधजगी अनमनी सी लेटी हुईं थीं। यहां से निकलकर हम इस स्थान के तीसरे देवता कोतवाल भैरवनाथ की ओर गए। यह मंदिर, प्रमुख मंदिर से अलग पहाड़ी पर है। वहां देखा कि भैरवनाथ के सामने लोग बंधन कटवा रहे थे माने कि सब को धागे से बांधकर उनके सिर पर नींबू रखकर काटा जा रहा था। यहां जिस भी महिला पर भूत प्रेत का साया था उनके प्रेत भैरवनाथ के सामने नींबू और धागा कटवाने के बाद सामने आ रहे थे और खुले बाल वाली महिलाएं चीख-चीख कर रो-रोकर चिल्ला चिल्लाकर अपने अंदर के प्रेत को ललकार रहीं थीं। यहां मंदिर में एक अंडरग्राउंड स्पेस है जहां भूत-प्रेत वाली महिलाओं का इलाज चलता है उन्हें जल और विभूति दी जाती है। मैंने वहां भी झांककर देखा तो मुझे वहां भी सिर्फ बिखरे बालों वाली महिलाएं ही नजर आईं। अब मेरे जेहन में सिर्फ एक ही सवाल था कि ये सब भूत-प्रेत सिर्फ महिलाओं को ही क्यों आते हैं। एक भी मर्द पर नहीं आते प्रेत और यहां के लोगों के मन में भी यह सवाल क्यों नहीं उठता है।

महिलाओं के दमन और शोषण का प्रतिबिंब

दरअसल हमारा समाज महिलाओं के दमन और शोषण का समाज है। हमारे यहां महिलाओं को अपनी इच्छाएं मारने के लिए मजबूर किया जाता है। आप भले ये मानते हैं कि वो अपनी इच्छा से सेक्रीफाइज या कॉम्प्रोमाइज करती हैं नहीं वो ऐसा करने के लिए समाज द्वारा गढ़ी जाती हैं। हमारे यहां महिलाओं को मानसिक शारीरिक भावनात्मक सहारा नहीं मिलता है। तमाम टेबूज के बीच वो बड़ी होती हैं। यह करो यह मत करो के बंधन में जीती हैं। उसकी पूरी जिंदगी जिम्मेदारियों का एक पहाड़ होती है जिस पर उसे हर दिन चढ़ना-उतरना होता है। वो एक दबाव वाला जीवन जीती है। जबकि पुरुष ऐसा जीवन नहीं जीते हैं। यह स्त्री के भीतर एक कुंठा को जन्म देता है। और यही कुंठा मानसिक बीमारियों की वजह बनती हैं। मेंहदीपुर बालाजी को इस नजरिए से देखेंगे तो आप समझ पाएंगे कि भूत प्रेत सिर्फ महिलाओं को ही क्यों आते हैं। क्योंकि यहां आने वाली हर भूत-प्रेत वाली महिला मानसिक रोगी है। वो हिस्टीरिक हैं, उसे शिजोफ्रेनिया है या अन्य कोई पर्सनालिटी डिसऑर्डर। वो मौका मिलने पर अपना सारा दबा हुआ गुस्सा, फ्रस्ट्रेशन यहां चीख कर निकालती है और कुछ पल के लिए रिलेक्स हो जाती है। ऐसी महिलाओं को प्यार और साथ देने के साथ ही उनके समुचित इलाज की जरूरत होती है।

मनोचिकित्सक का हुआ भारी विरोध

कुछ साल पहले मानवाधिकार आयोग की पहल पर सरकार द्वारा आस्था के साथ मानसिक इलाज भी कराने की व्यवस्था की गई। एक मनोचिकित्सक भी यहां आए लेकिन यह सब यहां ज्यादा दिन चल नहीं सका। यहां तक कि स्थानीय स्त्रियों ने भी इसका विरोध किया। जाहिर सी बात है अगर मानसिक इलाज होता तो मंदिर में चल रहा प्रेत भगाने का खेल धीरे धीरे लोगों की समझ में आ जाता और मंदिर की दुकान बंद हो जाती।  मेंहदीपुर मंदिर ट्रस्ट के पास इस अंधविश्वास के नाम पर लाखों का चढ़ावा आता है वो भला इसे कैसे हाथ से जाने दे सकते हैं। यहां जब महिलाएं चिल्लाकर रुदन करती हैं उसमें मुझे एक ही आवाज सुनाई देती है कि मैं मुक्त होना चाहती हूं। मुझे मुक्त करो इन बेड़ियों से। हालांकि सच यही है कि इन्हें खुद ही काटना सीखना होगा अपनी बेड़ियां। खुद उतारने होंगे अज्ञानता और अशिक्षा के भूत।

ऋचा साकल्ले लेखिका टीवी पत्रकार हैं,

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