WhatsApp Image 2019-11-06 at 14.30.57

यज्ञ से मैं ओजस्वी बन बुढ़ापे तक युवा रहूँ

Nov 7 • Arya Samaj • 37 Views • No Comments

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...

मानव की कामना होती है कि वह सदा युवा रहे | जीवन के अन्तिम क्षण तक वह युवाओं के समान ही सब प्रकार की शक्तियो का स्वामी बना रहे | यह इच्छा यज्य से ही पूर्ण हो सकती है | इस लिए मानव जीवन प्रयन्त यज्य करता रहे | इस का उपदेश यजुर्वेद के अष्टम अध्याय का तृतीय मंत्र इस प्रकार कर रहा है :-
ओजश्च च मे सहश्च म&आत्मा सी मे
तनुश्च मे शर्म च मे वर्म च मे &ग्नि च
मे&स्थीनी च मे पारू &षि च ए शरीराणि
च म&आयुश्च मे जरा च मे याज्येन कल्पांताम || यजुर्वेद 8.3 ||
इस मंत्र में छ:विषयों पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि :-
1.
यजुर्वेद के आठवें अद्याय का द्वितीय मंत्र “बल” पर समाप्त हुआ था | इस मंत्र में इस शब्द का ही विस्तार किया गया है | इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा गया है कि यागय हमारे बुद्धि की कारणभूत जो भी शक्तिया हैं ,वह सब यागय से ही संपन्न हों | यागय मे ही वह शक्ति है , जिस से यह सब कार्य , यह सब शक्तियाँ संपन्न होती हैं | अत: मेरा ओज , मेरा तेज अथवा मेरा बल आदि यह सब शक्तियां यागय के द्वारा ही संपन्न हों | इस प्रकार मेरे अंदर भरपूर ओज आवे तथा मैं ओजस्वी बनूँ | मेरे अंदर खूब सहन शक्ति आ जावे | इस प्रकार मैं प्रकृति का ठीक से प्रयोग करते हुए ओज से भर कर ओजस्वी बन जाऊ | इस प्रकार ओजस्वी बन कर मैं सब प्रकार के सकटो , रोगों,व्याधियो आदि से विजयी हो कर अपार सहनशक्ति का स्वामी बन अन्य सब जीवोँ के साथ जब भी किसी प्रकार का वर्ताव करू , व्यवहार करूँ , तो मेरे इस व्यवहार में अत्यधिक सहन शक्ति स्पष्ट दिखाई दे |
2.
मैं निरंतर आत्मा की शक्ति को बढ़ाता रहु | आत्मा की शक्ति को बढ़ाने के साथ ही साथ शरीर की शक्ति को भी निरंतर बढ़ाता रहु | इसका विकास करूँ | एहिक व अमानुषिकदो प्रकार के जो सुख होते हैं , इन दोनों प्रकार के सुखों को पाने के लिए दोनो क़ा
2
समन्वय होना आवश्यक होता है |
3.
यह सुख हम जानते हैं कि दो प्रकार से मिलते हैं | एक ग्यान से तथा दूसरे वासनाओं के नाश से | मंत्र उपदेश करता है कि मैं ग्यान से तो सुखो को प्राप्त करू ही, इस के साथ ही साथ अपनी वासनाओ का नाशकर भी, इन्हें क्षीण करके भी सुखो को प्राप्त करूँ | इस प्रकार मैं सब प्रकार के रोगों से मुक्त रहूँ | रोग रूपी शत्रुओ के आक्रमण से बचा रहूं | मैं शर्मा , वर्मा बनूँ अर्थात मैं अपने अंदर ग्यान का विकास करते हुए ब्रह्मशक्ति का स्वामी बनूँ, उच्च शिक्षित बनूँ | न केवल उच्च शिक्षित ही बनूँ बल्कि क्षात्र शक्ति अर्थात वीरता को भी अपने अंदर बढ़ाने वाला बनूँ | इन सब शक्तियो को बढ़ाने के कारण मेरे हाथ आदि मेरे शरीर के सब भाग ,मेरे शरीर की सब अस्थिया , मेरे शरीर के सब अवयव यागय ही के द्वारा शक्ति से संपन्न हों , शक्तिशाली हों | इतना हीं नहीं मेरे शरीर के सब स्थूल भाग , सब सुक्षम भाग तथा सब कारण भाग अर्थात पूरे का पूरा शरीर स्वस्थ , उतम वा ठीक रहे |
4-5
मेरी अंगुलियाँ आदि शरीर के सब भाग , सब खंड अथवा सब पर्व यागय के कारण ही अथवा यागय के द्वारा ही शक्ति से युक्त हों तथा व्रद्धावस्ता में भी यागय के ही द्वारा शक्ति को बनाए रखें | भाव यह है कि बुढ़ापे की आयु मे भी मैं युवकों के ही समान शक्ति का स्वामी बनू किन्तु यह तब ही संभव होगा जब मैं नियमित यागय करूंगा, यागय को अपनाए हुए रहूँगा क्योकि सब शक्तियों का आधार तो यागय ही है | इसलिए मैं आजीवन यागय करते हुए इस यागय के द्वारा शारीरिक, आत्मिक व बौद्धिक शक्ति का स्वामी बना रहूं |
6.
हम जानते हैं कि मानव अपने जीवन को सदा सुखी देखना चाहता है | मानव जीवन मे बुढ़ापा उसके जीवन का अन्तिम पड़ाव होता है | इस समय उसके सब अंग ढीले हो जाते है किन्तु वह इस अवस्था में भी जवानो की सी शक्ति से संपन्न होने की कामना रखता है | इस शक्ति को बनाए रखने के लिए यज्य ही एक मात्र एसा उपाय है | जो व्यक्ति यज्यशील होता है , सदा यजय करता है, वह अपने जीवन के इस पड़ाव भी निरंतर यज्य करने के कारण यज्यमेय जीवन होने के कारण वह इस आयु में भी युवाओं के समान ही शक्ति संपन्न बना रहता है |

डा. अशोक आर्य

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>

Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)

« »

Wordpress themes