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ये आयुर्वेद को तबाह करने की साजिश है

Jul 18 • Arya Samaj • 144 Views • No Comments

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आपने भारतीय संस्कृति से लेकर हिंदी भाषा की दुर्गति देख ली होगी विश्वास कीजिए अब आयुर्वेद के दुर्दिन आरम्भ हो गये है. क्योंकि हाल ही में संसद के मानसून के दौरान राज्यसभा में जिस तरह आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा को लेकर आयुष मंत्रालय के कामकाज के दौरान शिवसेना के सांसद संजय राऊत ने आयुर्वेदिक मुर्गी और आयुर्वेदिक अंडे का जो जिक्र छेड़ा है. उससे लगता है कि आने वाले दिनों में अंडे और मांसाहार को भी भारत की प्राचीन परंपरा आयुर्वेद का हिस्सा बना दिया जायेगा. जिस तरह आत्ममुग्ध होकर संजय राउत ने किस्सा सुनाया कि वह एक बार महाराष्ट्र के नंदूरबार नाम के आदिवासी इलाके में गए तो उन्हें खाना परोसा गया. उन्होंने पूछा कि यह क्या है? जिसके जवाब में राउत को बताया गया कि यह मुर्गी है. तो उन्होंने कहा कि मैं नहीं खाउंगा. इसके बाद लोगों ने बताया कि यह आयुर्वेदिक मुर्गी है. जिस पोल्ट्री में मुर्गियों को रखा जाता है उन्हें सिर्फ हर्बल खिलाते हैं. जैसे लौंग, तिल. उससे जो अंडा पैदा होता है वह पूरी तरह से आयुर्वेदिक है.

क्या आपने देखा या सुना है कि आयुर्वेदिक पुस्तकों में अंडे का उल्लेख हो? लेकिन इसके बावजूद भी आयुर्वेदिक अण्डों की बिक्री देश में शुरू हो चुकी है. सौभाग्य पोल्ट्री  द्वारा इसे आर्युवेदिक बताकर दक्षिण भारत में बेचा  जा रहा है. बात सिर्फ अंडे तक सीमित नहीं हैं अंडे ही नहीं बल्कि आयुर्वेदिक मुर्गियों का मीट भी देश के कई शहरों में उपलब्ध है. इनका दावा है कि मुर्गियों को मुनक्खा, किशमिश बादाम और छुआरे आदि परोसे जा रहे तो उनसें पैदा होने वाले अंडे आयुर्वेदिक और खाने वाली मुर्गी आयुर्वेदिक है.

शायद आने वाले दिनों में गाय, भेंस बकरी आदि का मांस भी आयुर्वेदिक बताकर देश में बेचा जाये तो कोई अचरज नहीं होना चाहिए क्योंकि इसमें यही तर्क परोसा जायेगा कि बकरी भेंस भी घास-पात या खेतों में खड़ी जड़ी बूटियां खाती है तो उनका मांस भी आयुर्वेदिक है? यदि आज आयुर्वेदिक अंडे और मुर्गी का विरोध नहीं हुआ तो कल उनके आयुर्वेदिक मांस के दावे को स्वीकार करना पड़ेगा. क्योंकि जब बाजार पर पूंजीवाद हावी हो जाएँ तो आगे ऐसी खबरें लोगों के लिए सुनना और पढना कोई नई बात नहीं रह जाएगी.

हमने पिछले वर्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुक्कुट अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र के आयुर्वेदिक अंडे पर विरोध जताया था तब भी यही सवाल सरकार और संस्थान से पूछे थे कि है क्या काजू, मखाने, पिस्ता खाने वाली और शरबत पीने वाले किसी भी पशु का मीट भी आयुर्वेदिक हो सकता है?

देखा जाये तो किसी भी राष्ट्र की सरकार का पहला कर्तव्य होता है उस देश की संस्कृति की रक्षा क्योंकि राष्ट्रों का वजूद उनकी संस्कृति और सभ्यताओं पर टिका होता है. यदि वहां की संस्कृति ही लुप्त हो जाये तो राष्ट्रों के लुप्त होने में समय नहीं लगता. इसलिए आज हमारे देश की सरकारों को भी सोचना होगा कि आयुर्वेद के संदर्भ में बात जब होती है तो मन में अपने आप उसकी महानता का आध्यात्मिक और धार्मिक भाव पैदा हो जाता है. विश्व की सभी संस्कृतियों में, अपने देश की संस्कृति न सिर्फ प्राचीन ही है बल्कि सर्वश्रेष्ठ और बेजोड़ भी है. हमारी संस्कृति और सभ्यता के मूल स्रोत और आधार वेद हैं जो कि मानव जाति के पुस्तकालय में सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं और इन्हीं की एक शाखा को आयुर्वेद  भी कहा जाता है. आयुर्वेद के जनक के तौर पर जिन तीन आचार्यो की गणना मुख्यरूप से होती है उनमें महर्षि चरक, सुश्रुत के बाद महर्षि वाग्भट का नाम आता है. इस ग्रन्थ का निर्माण वेदों और ऋषियों के अभिमतों तथा अनुभव के आधार पर किया गया है.

आयुर्वेद का ज्ञान बहुत ही विशाल है. इसमें ही ऐसी प्रणाली का ज्ञान है, जो मानव को निरोगी रहते हुए स्वस्थ लम्बी आयु तक जीवित रहने की लिये मार्ग प्रशस्त कराता है, जबकि मांसाहारी भोजन में तमतत्त्व की अधिकता होने के कारण मानव मन में अनेक अभिलाषाऐं एवं अन्य तामसिक विचार जैसे लैंगिक विचार, लोभ, क्रोध आदि उत्पन्न होते हैं. शाकाहारी भोजन में सत्त्व तत्त्व अधिक मात्रा में होने के कारण वह आध्यात्मिक साधना के लिए पोषक होता है.

आर्युवेद के आध्यात्मिक संदर्भ में यदि गहराई से झांके तो अंडे एवं मांस खाने से मन पूरी तरह से आध्यात्मिकता प्राप्त करने का विरोध करता है. क्योंकि आध्यात्मिकता के द्रष्टिकोण से आयुर्वेद  की अपने आप में एक पवित्रता है! आयुर्वेद  के अनुसार अंडे प्राकृतिक है खाद्य पदार्थ नहीं हैं. अंडे मुर्गियों के बच्चों की तरह हैं,  क्या किसी का बच्चा खाना आध्यात्म की द्रष्टि से पवित्र हो सकता है? आयुर्वेद में अपवित्र खाद्य पदार्थों की अनुमति नहीं है! यदि आप अंडा खाते हैं, तो आप मुर्गी को पैदा होने से पहले ही मार देते हैं. आज आयुर्वेद के नाम पर बेचें जाने वाले अंडे और मांस शरीर को विकसित करने के बजाय हमारी वैदिक संस्कृति को तबाह करने की साजिश है. यदि इसे स्वीकार कर लिया तो कल आपको ये लोग यह भी स्वीकार करा देंगे कि वेदों में मांसाहार है. जब आयुर्वेद में कहीं भी मांस को भोजन या दवा की श्रेणी में नहीं रखा है तो आयुर्वेद में अंडे कहाँ से आ गये यह बात सरकार और हम सभी को सोचनी होगी!!

विनय आर्य

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