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योगेश्वर श्रीकृष्ण का सत्य स्वरूप

Aug 10 • Samaj and the Society • 108 Views • No Comments

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भारत देश की विशेषता, महत्त्व आकर्षण एवं सौभाग्य रहा कि इसे ऋषि , मुनि, ज्ञानी, तपस्वी, प्रेरक महापुरुषों की विरासत व परम्परा मिली है। दिव्यात्मा, पुण्यात्मा महापुरुषों की लम्बी परम्परा में भगवान मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम और योगिराज श्रीकृष्ण का नाम बड़ी श्रद्धा सम्मान और पूज्यभाव में लिया जाता है। अधिकांश भक्तजन इनमें दैवीय युक्त पूज्य एवं आराध्य भाव रखते हैं। उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व प्रेरक, आकर्षक, लोकोपकारक, बहुआयामी तथा चुम्बकीय था। इसी कारण लाखों हजारों वर्षों के घात-प्रतिघात वात्याचक्रों विवादों आदि के होते हुए भी वे आज भी जनमानस के हृदयों में पूजित सम्माननीय, स्मरणीय व अलौकिक महापुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हैं। श्रीकृष्ण पुण्यात्मा, धर्मात्मा, तपस्वी, त्यागी, योगी, वेदज्ञ, निरहंकारी, कूटनीतिज्ञ, लोकोपकारक, खण्ड-खण्ड भारत को अखण्ड देखने के स्वप्नद्रष्टा आदि अनेक, गुणों व विशेषणों से विभूषित थे। वे मानवता के रक्षक, पालक और उद्दारक थे। उनके जीवन का उद्देश्य था – परित्राणाय साधूनाम् सत्पुरुषों व धर्मात्माओं की रक्षा हो तथा विनाशाय दुष्कृताम पापी, अपराधी तथा दुष्ट प्रकृति के लोगों का दलन हो और धर्म संस्थापनार्थ सत्य धर्म, न्याय की सर्वत्र स्थापना होनी चाहिए। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति में उन्होंने दुःख, कष्ट, विराध एवं संघर्ष करते हुए सारा जीवन लगा दिया। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर न जाने कितना लिखा, पढ़ा सुना और बोला गया, फिर भी उनके जीवन और कार्यों की वास्तविक प्रमाणिक सत्य स्वरूप जानकारी हमारे से ओझल हो रही है। भागवत्, पुराणों, लोक साहित्य, कथाओं, रासलीलाओं, कृष्णलीलाओं, सीरियलों, पिक्चरों, नाटकों आदि में वे तमाशा बन रहे हैं। अधिकांश लोग और आज की युवापीढ़ी जो योगेश्वर श्रीकृष्ण का ऐतिहासिक जीवन स्वरूप मान रहे हैं। यह देश, धर्म मानवजाति एवं इतिहास के लिए दुर्भाग्य पूर्ण है।

संसार के इतिहास में श्रीकृष्ण जैसा निराला, विलक्षाण, अद्भुत, अद्वितीय विश्वबन्धुत्व, महापुरुष न मिलेगा। यदि किसी महापुरुष में वेद, दर्शन, योग, आध्यात्म, इतिहास साहित्य, संगीत, कला, राजनीति, कूटनीति आदि सभी एकत्र देखने, हैं तो वह अकेले देवपुरुष श्रीकृष्ण हैं सत्य ये है कि दुनिया के नादान लोगों ने उस योगीराज श्रीकृष्ण का भेद नहीं जाना। जिनका जन्म जेल में हुआ। जन्म से पहले ही मृत्यु के वारन्ट निकल गए। कैसी विचित्र बिडम्बना रही जब जन्म हुआ उस समय उनके पास कोई खुशी मनाने वाला, बधाई देने वाला और मिठाई बांटने वाला नहीं था। ऐसे ही मृत्यु के समय भी उनके पास कोई रोने वाला नहीं था। विमाता यशोदा की गोद में पले, विपरीत परिस्थिति के करण मामा को मारना पड़ा। राज्य छोड़कर द्वारिका असमय में जाना पड़ा। सत्य-न्याय, धर्म और मानवता की रक्षा के लिए नाना रूप धारण करने पड़े। कई प्रकार की भूमिकाएं निभाई। कई बार अपमान, विरोध व संघर्ष का जहर पीना पड़ा। सम्पूर्ण जीवन कष्ट, संघर्ष, विवादों मुसीबतों का अजायबघर रहा। ऐसे विरोधाभास  में रहते, जीते जीवन में कभी निराश, हताश, उदास एवं दुःखी नजर नहीं आए। यही उनके जीवन की समरसता एवं महापुरुषत्व है। उनके जीवन से ऐसी शिक्षा एवं प्रेरणाएं लेनी चाहिए।

 

महाभारत में अनेक विशेषताओं से युक्त अनेक महापुरुष हुए मगर सभी का जन्म दिन नहीं मनाया जाता है। हजारों वर्षो के बाद बिना सूचना, पत्रक, विज्ञापन आदि के श्रीकृष्ण का जन्म दिन सबको याद है। बड़ी धूमधाम के साथ सजावट-बनावट के साथ पूज्य भावना से जन्मोत्सव मनाया जाता है। जो महापुरुष संसार, मानवता, सत्य, धर्म-न्याय एवं सर्वेभवन्तुः सुखिनः के लिए जीता और मरता है उसका जन्मोत्वस सभी जन श्रद्धा भक्ति व सम्मान से मनाते हैं तभी महाभारतकार व्यास को ससम्मान कहना पड़ा ‘कृष्ण वन्दे जगत्गुरुम्’ पूरे महाभारत में सर्वाधिक, पूज्यनीय, अग्रणी, वन्दनीय हैं तो श्रीकृष्ण को माना गया है। श्रीकृष्ण का असली स्वरूप और चरित्र महाभारत मं ही मिलता है। सम्पूर्ण महाभारत में तटस्थ रहते हुए भी सत्य, न्याय-धर्म के लिए अहंभूमिका निभाते हैं। वहां वे राष्ट्रनायक के रूप में दिखाई देते हैं तभी द्रोणाचार्य को कहना पड़ा-

यतो धर्मस्ततः कृष्णः यतः कृष्णस्ततो जयः

जहां धर्म है वहां श्रीकृष्ण हैं और जहां श्रीकृष्ण हैं वहां निश्चय विजय होगी। महाभारत में श्रीकृष्ण ने अपनी भूमिका बड़ी कुशलता निपुणता, कूटनीति एवं सक्रियता से निभाई। संसार उनके कर्म कौशल के आगे नतमस्तक है।

अपने इतिहास, संस्कृति, धर्मग्रन्थों, महापुरुषों आदि को विकृत, कलंकित पतित एवं छेड़खानी करने वाली संसार में जाति है तो वह हिन्दू हैं। जिसने अपने इतिहास, पूर्वजों महापुरुषों के सत्य यथार्थ स्वरूप को समझा, जाना, माना और अपनाया नहीं है। जैसा आज योगीराज भगवान श्रीकृष्ण का अश्लील, भोगी, विलासी, लम्पट, पनघट पर गोपिकाओं को छोड़ने वाला आदि दिखाया, सुनाया पढ़ाया तथा बताया जा रहा है। वैसा सच्चे अर्थ में उनका प्रमाणिक जीवन चरित्र नहीं था। उन्हें चोरजार शिरोमणि, माखन चोर आदि कहकर/लांछन लगाये गए। मीडिया श्रीकृष्ण के नाम पर अश्लीलता, श्रृंगार, वासना, कामुकता, ग्लैमर अन्ध विश्वास, पाखण्ड आदि दिखा, सुना और फैला रहा है। आज की पीढ़ी इन्हीं बातों को सच व ऐतिहासिक मान रही है। कोई रोकने, टोकने व कहने वाला नहीं है। एक आर्य समाज है जो सत्य को सत्य और गलत को गलत कहने वाला था, वह आज स्वयं अपने में उलझा पड़ा है। उसकी आवाज में वह तीक्ष्णता और पैनापन नहीं रहा। इसीजिए तेजी से ढ़ोंग, पाखण्ड, अन्धश्र(ा, अन्धविश्वास, गुरुडम आदि फैल रहा है। महापुरुषों की परम्परा में किसी को योगीराज की उपाधि, सम्मान, पहिचान एवं पूज्यभाव मिला है तो वे श्रीकृष्ण हैं। वास्तव में श्रीकृष्ण का गुण, कर्म स्वभाव आचरण, जीवन दर्शन चरित्र ऐसा नहीं था जो आज मिलता है। असली उनका चरित्र महाभारत में है जहां वे सर्वमान्य, सर्वपूज्य, योगी, उपदेशक, मार्ग दर्शन, विश्वबन्धुत्त्व, नीतिनिपुण, सत्य न्याय, धर्म के पक्षधर के रूप में दिखाई देते हैं।

जब वर्तमान में प्रदर्शित जीवन चरित्र की तुलना महाभारत के श्रीकृष्ण से करते हैं। तो रोना आता है। गीता जैसा अमूल्य ग्रन्थ महाभारत का ही अंग है। विश्व में धर्म व आध्यात्म के क्षेत्र में ज्ञान भारत को गीता से मिला और सम्मान व पहिचान बनी। गीता में श्रीकृष्ण ने जो जीवन जगत के लिए अमर उपदेश व सन्देश दिए हैं वे युगों-युगों तक जीवित-जागृत रहेंगे। गीता भागने का नहीं जागने की दृष्टि विचार एवं चिन्तन देती है। जीवन-जगत में रहते हुए, निष्काम करते हुए जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष तक पहुंचने का गीता दिव्य सन्देश देती है। गीता में ज्ञान-विवेक वैराग्य पूर्ण श्रीकृष्ण योगी के रूप में सामने आते हैं। जैसे कोई हिमायल की चोटी पर खड़ा योगी आत्मा-परमात्मा, जीवन-मृत्यु, भोग,योग, ज्ञान, कर्म, भक्ति आदि का चिन्तन प्रेरणा व सन्देश दे रहा हो। तत्वज्ञ पाठकगण सोचें-विचारें और समझें- कहां गीता के श्रीकृष्ण और पुराणों कथाओं कल्पित कहानियों के श्रीकृष्ण हैं? हमने उन्हें क्या से क्या बना दिया है। अमृत से निकालकर उन्हें कीचड़ में डाल रहे हैं? महाभारत और गीता के श्रीकृष्ण को भूलकर, छोड़कर आज समाज पुराणों व रसीली कथाओं के श्रीकृष्ण के चरित्र को पकड़ रहे हैं।

संसार का दुर्भाग्य है कि श्रीकृष्ण के सत्यस्वरूप, जीवनादर्शन के साथ अन्याय व धोखा हो रहा है। पुराणों में श्रीकृष्ण को युवा व वृ( होने ही नहीं दिया, बाल लीलाओं में उनका सम्पूर्ण जीवन अंकित व चित्रित होकर रह गया। जिन्हांने कभी भीख नहीं मांगी थी। आज हम उनके चित्र व नाम पर धन बटोर व भीख मांग रहे हैं? किसी विदेशी चिन्तक ने श्रीकृष्ण के वर्तमान स्वरूप को देखकर टिप्पणी की थी यदि भारत में सबसे अधिक अन्याय व अत्याचार किया है तो वह अपने महापुरुषों के चरित्र के साथ किया है उनके असली स्वरूप को भुलाकर विकृत व कलंकत रूप में उन्हें दिखा रहे हैं। इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। ऋषि दयानन्द से बढ़कर सत्य वक्ता और प्रमाणिक कौन हो सकता है। उन्होंने श्रीकृष्ण के उज्जवल व प्रेरक चरित्र की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है  ‘‘देखो। श्रीकृष्ण का इतिहास महाभारत में अत्युत्तम है। उनका गुण, कर्म, स्वभाव और चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश है। श्रीकृष्ण ने जन्म से लेकर मरण पर्यन्त बुरा काम कुछी भी किया हो ऐसा कहीं भी नहीं लिखा है।’’

महाभारत में राधा का कहीं नाम नहीं आता है। किन्तु राधा के नाम बिना श्रीकृष्ण की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। राधा यशोदा के भाई रावण की पत्नी थी। पुराणों, लोक कथाओं, कहानियों साहित्य आदि में श्रीकृष्ण के चरित्र को कलंकित व विकृत बदनाम करने के लिए राधा का नाम जोड़ा गया। इतिहास में मिलावट की गई। लोगों को नैतिक, धार्मिक जीवन मूल्यों से पथभ्रष्ट करने के लिए श्रीकृष्ण और राधा के नाम पर अश्लीलता व श्रृंगारिक कूड़ा-करकट इकट्ठा कर लिया गया। जो आज फल-फूल रहा है। श्रीकृष्ण पत्नीव्रत थे उनकी धर्म पत्नी रुक्मिणी थीं। श्रीकृष्ण के जीवन वृत्त में तो रुक्मिणी का नाम आता है मगर व्यावहारिक रूप में मंदिरों, लीलाओं, कथाओं, झांकियों आदि में रुक्मिणी को श्रीकृष्ण के साथ नहीं दिखाया जाता है। यह रुक्मिणी के साथ पाप और अन्याय है। सच्चा इतिहास इसे कभी माफ नहीं करेगा। श्रीकृष्ण जैसे एक पत्नीव्रती, ज्ञानी, संयमी मर्यादापालक महापुरुष व्यभिचारी एवं परस्त्रीगामी कैसे हो सकते हैं। श्रीकृष्ण संसार के अद्वितीय महापुरुष थे।

आर्य समाज का उदय सत्य के प्रचार-प्रसार और वैदिक धर्म के पुनरुधार के लिए हुआ। महापुरुषों के उज्ज्वल, प्रेरक चारित्रिक, गरिमा की रक्षा का सदा पक्षधर रहा है। उसका नारा था जागते रहो। जागते रहो। स्वयं जागो और दूसरों को जगाओ। आज संसार जिस रूप में श्रीकृष्ण को मानता-जानता व समझता है, उस विकृत, कलंकित श्रीकृष्ण के स्वरूप को आर्य समाज नहीं मानता है। आर्य समाज उन्हें योगीराज महापुरुष के रूप में सम्मानित एवं प्रतिष्ठित करता है। वे दिव्य गुणों से युक्त महापुरुष थे उन्हें अपवादी ईश्वर नहीं मानता हूं। परमात्मा एक है अनेक नहीं, वह कण-कण में सर्वत्र विद्यमान है। वह व्यक्ति नहीं शक्ति है। वह सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान व सर्वान्तरयामी है। वह जन्म मृत्यु से परे है। गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा है-

 

ईश्वरः सर्वभूतानां हृददेशेऽर्जुन तिष्ठति

वह परमेश्वर सर्व प्राणियों के हृदय में सदा निवास करता है। यदि हम श्रीकृष्ण को महापुरुष के रूप में जाने और मानेंगे तो उनसे जीवन जगत के लिए हम बहुत कुछ सीख, प्रेरणा व शिक्षा ले सकते हैं। वे हमारे रोल मॉडल बन सकते हैं। श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण जीवन दर्शन, निराश, हताश उदास, परेशान, अशान्त किंर्त्तव्य विमूढ़,  व्यक्ति को सदा हिम्मत, सहारा, आशा और आगे बढ़ने की रोशनी देता है। अधिकांश लोगों को यह भ्रान्ति अज्ञान और भूल है कि आर्य समाज किसी देवी-देवता, महापुरुष आदि को नहीं मानता है। सच ये है कि जितनी सच्चाई ईमानदारी श्र(ाभक्ति से महापुरुषों के सत्यस्वरूप को आर्य समाज मानता जानता और बताता है उतना और कोई नहीं क्योंकि आर्य विचारधारा का आधार बु(, तर्क व प्रमाण हैं। आर्य समाज कहता है चित्र का हम सम्मान करते हैं और चरित्र का अनुकरण करते हैं।

प्रतिवर्ष श्रीकृष्ण के जन्म को जन्माष्टमी के रूप में बड़ी धूमधाम से कृष्णलीला, रासलीला, झांकियां और तरह -तरह के कार्यक्रमों के रूप में मनाया जाता है। ग्लैमरस रास-रंग, रसीले श्रृंगारिक कार्यक्रम होते हैं। करोड़ों का बजट चकाचौंध में चला जाता है। जो श्रीकृष्ण के योगदान महत्त्व, जीवनदर्शन, गीताज्ञान, शिक्षाओं उपदेशों आदि का चिन्तन-मनन होना चाहिए वह गौण होकर ओझल हो जाता है। मूल छूट जाता है। ऐसे महत्त्वपूर्ण एवं प्रेरक अवसरों पर महापुरुषों द्वारा दिए गए उपदेशों, सन्देशों, विचारों व ग्रन्थों पर चिन्तन-मनन व आचरण की शिक्षा लेनी चाहिए। जो महापुरुषों के जीवन चरित्रों के साथ काल्पनिक, चमत्कारिक और अतिशयोक्ति पूर्ण बातें जोड़ दी गई हैं जिन्हें लोग सत्य वचन महाराज और सिर नीचा करके स्वीकार कर रहे हैं उन व्यर्थ की मनगढ़न्त बातों पर परस्पर चर्चा करके भ्रांतियों और अन्जान को हटाना चाहिए तभी महापुरुषों को स्मरण करने तथा जन्मोत्सव मनाने की सार्थकता,उपयोगिता और व्यावहारिकता है। उस महामानव इतिहास पुरुष योगेश्वर श्रीकृष्णकी स्मृति को कोटि-कोटि प्रणाम।

-डॉ. महेश विद्यालंकार

 

 

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