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वेटिकन के सफेद कपड़ों का सच

Jul 7 • Samaj and the Society, Uncategorized • 702 Views • No Comments

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वो दिन शुकवार था यानि गुड फ्राइडे 6 मार्च और साल 2010 सुबह.सुबह पुरे जर्मनी के गिरजाघरों में चर्च पदाधिकारियों के हाथों यौन शोषण का शिकार बने लोगों के लिए विशेष प्रार्थना सभाएँ आयोजित की गई थीं. उसी दिन रोम के अख़बारों में ये ख़बर पहले पन्ने की सुर्ख़ियों में छपी थी कुछ अख़बारों ने इसे वैटिकन सामूहिक नरसंहार का नाम दिया है. क्योंकि इससे चार दिन पहले ही फ्राइडे के अवसर पर अपने संदेश में आर्चबिशप रॉबर्ट सोलिच ने कहा था कि चर्च ने संभवतरू अपना नाम ख़राब होने के डर से पादरियों द्वारा मासूम यौन उत्पीडितों की मदद नहीं की. हम कि बीते काल की गलतियों के लिए कैथोलिक चर्च हमेशा शर्मसार रहेंगे.

आर्चबिशप के इस बयान के बाद समूचे यूरोप में पादरियों के विरुद्ध लोगों का कुछ गुस्सा तो कम हुआ पर चर्चों के प्रति लोगों की आस्था में भारी गिरावट हो गयी थी. ऐसा नहीं है कि इसके बाद पादरियों के कारनामे रुके हो! लेकिन एक आयोग का गठन जरुर किया था जो पादरियों के व्यवहार उनके चरित्र पर नजर बनाये रखेगा. उसी दौरान  कार्डिनल पेल जो आस्ट्रेलिया के सबसे वरिष्ठ पादरी समेत कैथोलिक चर्च की दुनिया में भी सबसे बड़े अधिकारियों में से कए थे उन्हें यौन शोषण के मामलों में चर्च की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया देने की जिम्मेदारी दी गयी थी. जो अब खुद अपने ऊपर लगे आरोपों पर ही घिर गये है.

वेटिकन सिटी में कुछ समय पहले ईसाईयों के सर्वोच्च धर्मगुरु पॉप जान पॉल के “लव लेटर्स” भी सामने आये थे जिन्होंने एक शादीशुदा अमेरिकी विचारक महिला अन्ना.टेरेसा ताइमेनिका से रिश्ता रखा हुआ था. अब तीसरे नंबर के अधिकारी कार्डिनल जॉर्ज पेल अपने ऊपर लगे यौन शोषण के आरोपों में घिरते दिखाई दे रहे है 76 वर्षीय कार्डिनल पेल फिलहाल वेटिकन सिटी में रहते हैं और उन पर यौन शोषण के आरोप उनके ही देश आस्ट्रेलिया में लगाए गए हैं.  पेल ने कहा है कि पोप ने उन्हें इन आरोपों का सामना करने के लिए छुट्टी दी है. आस्ट्रेलिया में विक्टोरिया स्टेट पुलिस ने कहा है कि वकीलों से सलाह.मशविरे के बाद कार्डिनल पर आरोप लगाए गए हैं. कार्डिनल पेल को आने वाली 18 जुलाई को मेलबर्न की अदालत में पहुंचना है. इस मामले में अब तक आरोपों से जुड़ी जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया गया है. लेकिन अगले हफ्ते एक जज कार्डिनल की पेशी से पहले जानकारी को सार्वजनिक किए जाने पर फैसला हो सकता है. उसी दिन एक बार फिर वेटिकन की पादरियों की सेना के द्वारा पहने जाने वाले सफेद कपड़ों का काला सच सामने आ जायेगा.

अधिकांश ऐसा माना जाता रहा है कि जब मनुष्य का मन भोग.विलास से भर उठता है तो वह अध्यात्म की और रुख करता है. उससे जुड़ता है. उसमे राग द्वेष मोह भोग आदि चीजों का त्यागकर एक सरल जीवन जीता है जिसके भारत देश में बहुत सारे उदहारण सुनने देखने को मिलते है. लेकिन यदि ईसाइयत के अन्दर चर्चों के पादरियों को झांककर देखे तो लगता है जैसे इनके जीवन का उद्देश्य पूजा. उपासना और आम जन को सही राह दिखाने के बजाय सिर्फ यौन शोषण ही मुख्य उद्देश्य रह गया हो.

दरअसल रोमन केथोलिक चर्च का एक छोटा राज्य है जिसे वेटिकन सिटी बोलते हैं. जिसे ईसाइयों का मक्का भी कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. अपने धर्म (ईसाई) के प्रचार के लिए वे हर साल गरीब देशों में शिक्षा, स्वास्थ आदि का बहाना ले करीब 17 हजार करोड़ डॉलर खर्च करते हैं. वेटिकन के किसी भी व्यक्ति को पता नहीं है कि उनके कितने व्यापार चलते हैं. बताया जाता है कि रोम शहर में 33 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक, प्लास्टिक, एयर लाइन, केमिकल और इंजीनियरिंग बिजनेस वेटिकन के हाथ में हैं. इटालियन बैंकिंग में उनकी बड़ी संपत्ति है और अमेरिका एवं स्विस बैंकों में उनकी बड़ी भारी राशि जमा होने के साथ विश्व भर की मीडिया में वेटिकन का सीधा हस्तक्षेप बताया जाता रहा है. इसी कारण पादरियों पर लगने वाले आरोपों उनके दुष्ट कारनामों पर अक्सर मीडिया में खामोशी छाई रहती है.

कहीं मिशनरियों के जरिये बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन को लेकर तो कहीं बच्चों का यौन शोषण को लेकर कैथोलिक चर्च अक्सर आलोचना का केंद्र रहा है. लोगों के मुताबिक इसके लिए इनके चरित्र का दोहरापन जिम्मेदार है. इसी कारण यूरोप के लोग धीरे.धीरे चर्च से निकल रहे है पर दुरूखद बात यह कि जब यूरोप के लोग चर्च छोड़कर बाहर निकल रहे उसी समय भारत जैसे देश में बड़ी संख्या में लोग चर्च में घुस रहे है और खुद को राम कृष्ण की संतान की बजाय जीसस का पुत्र समझ रहे है. सुदर्शन न्यूज चैनल के मालिक श्री सुरेश चव्हाणके की बात यहाँ सही निकलती है कि भारत की मीडिया को अधिकतर फंडिग वेटिकन सिटी जो ईसाई धर्म का बड़ा स्थान है वहाँ से आती  है इसलिए मीडिया केवल हिन्दू धर्म के साधु.संतों को बदनाम करती है और ईसाई पादरियों के दुष्कर्म को छुपाती है. बहुत पहले चीनी विचारक नित्शे ने कहा था कि मैं ईसाई धर्म को एक अभिशाप मानता हूँ, उसमें आंतरिक विकृति की पराकाष्ठा है. वह द्वेषभाव से भरपूर वृत्ति है. एक ऐसा जहर विष जिसका का कोई इलाज नहीं हैं.

राजीव चौधरी

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