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वेदों की ओर लौटो

Aug 30 • Arya Samaj • 708 Views • No Comments

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शिक्षित माता मही समान उदार वेद में माता को निर्माता कहा गया है. इसका भाव यह है कि जो संतानों के निर्माण का कार्य करे, उसे माता कहते हैं. इस से यह तथ्य सामने आता है कि जो निर्माण के कार्यों के सम्बन्ध में जानती हो, जो जानती हो कि किस विधि के प्रयोग से मानव का उत्तम निर्माण किया जा समकता है, क्या ढंग अपनाया जा सके कि मानव में उत्तम गुणों का आघान हो, वह कौन से ढंग से बालकों को शिक्षित करे कि बालक में अच्छे गुणों का विकास हो? एक अध्यापक जो बालकों को शिक्षित करता है, वह इससे १४ वेद में आदर्श स्त्री शिक्षा पूर्व वर्षों के तप से स्वयं को तैयार करता है, स्वयं में वह सब गुण पैदा करता है, जिन गुणों का आघान उसने अपने शिष्यों में करना होता है. जब एक अध्यापक को बालकों को शिक्षा देने के लिए स्वयं को शिक्षित करना होता है तो माता के लिए अपने में यह सब गुण पैदा करना भी आवश्यक होता है. इसलिए वेद ने स्त्री – शिक्षा पर अत्यधिक बल दिया है.

इस सम्बन्ध में वेद उपदेश कर रहा है कि – सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वतीमध्वरे तायमाने| सरस्वतीं सुकृतो अह्वयंत सरस्वती दाशुषे वार्यं दात् ||ऋग्वेद १०.१७.७|| इस मन्त्र के माध्यम से स्त्री के लिए चार उपदेश दिए गए हैं. मन्त्र उपदेश करते हुए कह रहा है कि – १ कर्तव्यार्थ प्रोत्साहन जीवन में अनेक अवसर इस प्रकार के आते हैं कि पुरुष में हीनता की भावना का उदय होता है, जिस से वह स्वयं को दुर्बल अनुभव करने लगता है. उसके मन की यह दुर्बलता उसे आगे बढ़ने से रोक देती है. उस मानव के हृदयों से हीनता के भावों का नाश करने को नारी आगे आवे. अदिति का रूप इस समय यह सुशिक्षित देवी, यह सुशिक्षित नारी अदिति का रूप धारण कर लेती है. अदिति का कार्य ही दुर्बलताओं को दूर करना है. यह देवी सब प्रकार की दुर्बलताओं युक्त भावनाओं को दूर कर शक्ति देने वाली होती है. इसलिए अदिति देवी के रूप में यह स्त्री न केवल अपने ही पति की दुर्बलताओं को दूर कर उसमें एक विशेष प्रकार का साहस पैदा कर उसमें अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए प्रोत्साहित करती है अपितु अपने अन्य सम्बन्धियों अर्थात् समाज के विभिन्न प्राणियों में भी साहस का आघान कर उन्हें अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिए भी प्रोत्साहित करती है.

२ मही समान उदार मानव के अन्दर के संकुचित विचार, उसकी विचारधारा को भी संकुचित बना देते है. इन संकुचित विचारों से ही उसमें स्वार्थ का उदय होता है. अब वह जो भी सोचता है १५ वेद में आदर्श स्त्री शिक्षा से, जो भी विचारता है, वह सब स्वार्थ से लबालब भरा होता है. जब उस की स्त्री, उसकी माता, उसकी बहिन को, उसकी इस अवस्था का ज्ञान हो जाता है तो वह मही का रूप धारण कर लेती है. मही का अभिप्राय: पृथ्वी से होता है अर्थात् अब उसे समझाया जाता है कि उसे भी पृथ्वी के से गुण अपने आप में धारण करने चाहियें.

पृथ्वी जिस प्रकार अपने अन्दर से अनेक प्रकार के अनाज , फल -फूल व ओषध आदि दे कर मानव मात्र ही नहीं अपितु प्रत्येक प्राणी के जीवन इस प्रकार यह सुशिक्षित देवी भी महि बनकर उस में उदार भावों का प्रवेश करने का कार्य करती है. ३ बहुश्रुता सुशिक्षित स्त्री सदा ही सब पर अत्यधिक उपकार करने वाली होती है. जब उस का पति उत्साह रहित हो जाता है, तो उसे ऊपर उठाने के लिए, उसमें नवचेतना, नया उत्साह पैदा करने के लिए, वह उसे वेदादि सत्य शास्त्रों की गाथाएं सुना कर, इस प्रकार के ही अन्य ग्रंथों की उपयोगी चर्चाओं को सुना कर उसे बहुश्रुता बना कर, इस प्रकार की उसकी प्रसिद्धि करने का कार्य करती है, जिस से संसार में उसका यशस्वी नाम सर्वत्र चर्चा में आने लगता है तथा उसमें नए उत्साह का प्रवाह होता है. ४ पुण्य व धर्मोपदेशक सुशिक्षित स्त्री अपने पति, संतान व समाज को सुपथ पर लाने के लिए अनेक कार्य करती है. वह सदा यह ही चाहती है कि उसके परिजन सदा पुण्य – पथ के ही पथिक हों. वह सदा इन सब को पुण्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने के साथ ही साथ समग्र समाज को भी धर्म का मार्ग अपनाने का आह्वान करती है.

डॉ अशोक आर्य

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