Swami Dayanand Saraswati

सत्य, न्याय एवं वेद के आग्रही महर्षि दयानन्द सरस्वती

Dec 23 • Pillars of Arya Samaj • 2062 Views • No Comments

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महर्षि दयानंद का जन्म फाल्गुनी कृष्ण दशमी सं १८८१ विक्रमी सन  १८२७ ई ण् को सौराष्ट ;गुजरात द्ध टंकारा ए मौरवी में हुआ था ण् इनके पिताजी कृष्णजी तिवारी औदिचय कुल के सामवेदी ब्राह्मण थे। वे निष्टावान शिव भगवान के भक्त थे। उन्होनें अपने पुत्र का नाम मूलशंकर रखा था। इसलिए महर्षि दयानंद का जन्म से नाम मूलशंकर था। सामवेदी ब्राह्मण होने पर भी पिताजी ने मूलशंकर को यजुर्वेद की रुद्राद्यायी कंठस्थ करा दी थी। कर्षण जी अपने पुत्र मूलशंकर को भगवान शिव जी की कहानियां बड़ी निष्टा से सुनाया करते थे। पिताजी के आग्रह पर मूलशंकर ने १४ वर्ष की आयु में पूर्ण श्रद्धा भक्ति के  साथ शिवरात्रि का व्रत कियाए दिनभर भगवान शिव की कथा वार्ता होती रही और मूलशंकर ने दृणता से उपवास किया था। सायंकाल पिताजी मूलशंकर को साथ ले, शिव के पूजन की सामाग्री लेकर गॉव  के बाहर मन्दिर में शिवरात्रि का पूजन करने के लिए गये, मूलशंकर के पिताजी बड़े धनाढ़य  सम्पन्न ब्राह्मण  थे। शिवरात्रि में शिव की  पिंडी का पूजन चारों पहर में चार बार होता है, रात्रि जागरण का विशेष फलदायक महत्व  है, प्रथम प्रहर का पूजन बडे ठाट-बाट घटाटोप से हुआ, दूसरे प्रहर का पूजन भी हो गया, तीसरे प्रहर में निद्रा देवी ने सबको दबा लिया, मूलशंकर के पिताजी और मन्दिर के पुजारी जी, सभी निद्रा के वश में हो गए, सिर्फ मूलशंकर पूरी श्रद्धा  भक्ति से जागते रहे, मन्दिर मे पूर्ण नीरवरता, शान्ति छाई हुई थी। इतने में मन्दिर के इधर – उधर  से दो-चार चूहे पिंडी पर अर्पित सामग्री को खाने के लिए शिव की पिण्डी पर उछल-कूद करने लगे, मूलशंकर के ह्रदय  में प्रभु-कृपा से सत्य का प्रकाश हुआ, उन्हें दृढ़ विश्वास हो गया कि यह पिण्डी कल्याणकारी भगवान् शिव कैलाशवासी तांडवकारी भगवान् शंकर नहीं हो सकती, यह सत्य के प्रति प्रथम आग्रह था।  उन्होंने पिताजी को जगाया किन्तु पिताजी और पुजारी मूलशंकर को सन्तुष्ट नहीं कर सके और सत्य के प्रति आग्रही मूलशंकर घर आ गये, सत्य के प्रति यह परम दुर्दान्त आग्रह महर्षि दयानन्द से सम्पूर्ण जीवन में बड़ी दृढ़ता से बना रहा और महर्षि दयानन्द ने यावत् जीवन सत्य का प्रचार किया और किन्हीं भी परिस्थितियों में सत्य के साथ समझौता नहीं किया। महर्षि दयानन्द ने अपने युगान्तरकारी कालजयी ग्रन्थ ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ की भूमिका में लिखा है  ‘‘मनुष्य का आत्मा सत्यासत्य का जाननेहारा है, तथापि अपने प्रयोजन की सिद्धि , दुराग्रह और अविद्यादि दोषों से सत्य को छोड़ असत्य पर झुका जाता है।’’ महर्षि ने वहीं भूमिका में पुनः लिखा है- ‘‘विद्वान् आप्तों का यही मुख्य काम है कि उपदेश वा लेख द्वारा सब मनुष्यों के सामने सत्यासत्य का स्वरुप समर्पित कर देना, पश्चात् मनुष्य लोग स्वयं अपना हिताहित समझकर सत्यार्थ का ग्रहण और मिथ्यार्थ का परित्याग करके सदा आनन्द में रहें, ‘‘वहीं पुनः लिखते है- यद्यपि आजकल बहुत से विद्वान् प्रत्येक मतों में हैं, वे पक्षपात छोड़कर सर्वतंत्र सिद्धांत अर्थात् जो-जो बातें सबके अनुकूल सब में सत्य हैं, उनका ग्रहण और जो एक-दूसरे के विरुह् बातें हैं, उनका त्यागकर परस्पर प्रीति से वर्ते-वर्तावें तो जगत् का पूर्ण हित होवे, क्योंकि विद्वानों के विरोध् से अविद्वानों में विरोध् बढ़कर अनेकविधि दुःख की वृद्धि और सुख की हानि होती है। यह उद्धरण किसी समीक्षा या व्याख्या की आकांक्षा नहीं करते। महर्षि दयानन्द सत्य के प्रति इतने आग्रहवान थे कि उन्होंने आर्य समाज का चैथा नियम यह बनाया कि ‘‘सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए। महर्षिजी ने पुनः पांचवे नियम में यह व्यवस्था दी है कि ‘‘सब काम धर्मानुसार  अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए।’’ सत्य और न्याय एक-दूसरे के साथी हैं। जहा सत्य का पालन होगा वहां न्याय स्वतः होता रहेगा। जिस युग में महर्षिजी ने अपना प्रचार कार्य आरम्भ किया उस समय कई प्रकार के अन्याय समाज में परिवारों में प्रचलित हो गए थे। सामाजिक रुप में छुआ-छूत भयानक रुप से चल रहा था। अछूतों को बड़ी घृणा की दृष्टि से देखा जाता था। परिवारों में स्त्रियों की  स्थिति बहुत दयनीय हो गयी थी। उनके साथ प्रायः दासियों जैसा व्यवहार होता था। स्त्रियाँ सब प्रकार से तिरस्कृत और पैर की जूतियाँ  समझीं जातीं थी। स्त्री और शूद्रों को पढ़ने का अधिकार  नहीं था। महर्षि दयानन्द ने बड़े क्षोभ और उग्रता से इस अन्याय का विरोध् किया। लड़कियों के लिए पाठशाला की व्यवस्था की और अछूतों के लिये छुआ-छूत के भेद भाव दूर कर दिए और उनके लिए भी पढ़ने की व्यवस्था की। उस युग में बाल-विवाह बहुत प्रचलित था। आठ-दस वर्ष की लड़कियां भी बूढों और अधेड़ों  को ब्याह दी जातीं थीं। विधवाओं  की संख्या बहुत अधिक  थी और विधवा -विवाह धर्म  विरुद्ध  माना जाता था। ये बाल- विधवाएं या तो वेश्या बन जाती थीं या देवदासियां बन जाती थीं। महर्षि दयानन्द ने इन सभी अन्यायों का डटकर विरोध् किया। आर्यसमाज ने अपने मन्दिरों से छुआ-छूत को हटाया और बाल-विवाह के विरुद्ध सामाजिक आन्दोलन किया। हिन्दू समाज में विधवा विवाह आरम्भ हो गया, प्रत्येक आर्यसमाज मन्दिर में कन्याओं को पढ़ाने के लिए पाठशालाएं खुल गयीं।अछूतों को आर्यसमाज के विद्यालयों और छात्रावासों में बिना किसी रोक-टोक के प्रवेश मिलने लगा। आर्यसमाज के कार्यकर्ताओं  को सामाजिक बहिष्कार का दण्ड भी भोगना पड़ा किन्तु महर्षि दयानन्द की शिक्षाओं के फलस्वरुप ये सामाजिक आन्दोलन बढ़ता ही गया और छुआछूत मिटने लगा तथा स्त्रियों को भी पुरुषों की तरह सामाजिक अधिकार मिलने लगे, उन्हें सब प्रकार से उन्नति का अवसर सुलभ हो गया। संस्कृत और हिन्दी की शिक्षा की बड़ी उपेक्षा हो रही थी। सम्पन्न लोग उर्दू और फारसी पढ़ रहे थे। महर्षि दयानन्द ने अपने संगठन में सारे कामों को हिन्दी में करने का अनिवार्य नियम बना दिया। महर्षि दयानन्द के इस प्रचार का परिणाम यह हुआ कि अछूत कुलों के विद्यार्थी भी बड़े-बड़े विद्वान, आचार्य, वेदपाठी, अध्यापक बनाने लगे और बिना किसी भेद-भाव के पण्डितों की मण्डली में प्रतिष्ठित होने लगे। स्त्रियाँ भी संस्कृत और वेद की उच्चकोटि की विदुषी बनने लगीं और पुरुषों के समान ही वेदों की पण्डिता भी होने लगीं। इधर  छुआछूत को दूर करने का प्रयास महात्मा गाँधी  ने भी किया और राष्ट्र की आत्मघाती छुआछूत की प्रथा समाप्त होने लगी। छूत-अछूत, सवर्ण-असवर्ण, सब बिना किसी भेदभाव के चाय, नमकीन, समोसे, मिठाई आदि खाने पीने लगे। इसी बीच मण्डल, कमण्डल सच्चर आदि कमीशनों, कमेटियों की रिपोर्टों ने जातिगत भावना को भड़का दिया। राष्ट्र की एकता की इस आत्मघाती नीति को राजनीतिक दलों ने भी अपने निहित राजनीतिक स्वार्थों के कारण खूब बढ़ावा दिया। अब तो ऐसा लगने लगा है कि अछूत जनजाति, अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग, सभी को राष्ट्र की एकता के विभाजन का राष्ट्रघाती  पुरस्कार मिलने लगा है और स्वार्थी  राजनीति इन्हें चिरस्थायी करने पर तुली हुई है, महर्षि दयानन्द और महात्मा गाँधी की राष्ट्र-हितैषी छुआ-छूत को दूर करने की नीति को ही राजनीति ने निर्ममता से समाप्त कर दिया है।  वेदों को अपनाने का सिद्धांत महर्षि दयानन्द का सुविचारित निश्चय था कि जब तक भारतवर्ष ने वेदों की शिक्षा को अपने राष्ट्रीय जीवन में अपना रखा था, तब तक देश की सर्वांगीण उन्नति हुई और देश संसार के सभी देशों का शिरोमणि बना, महर्षि जी ने आर्य समाज का तीसरा नियम ही बना दिया -flवेदों का पढ़ना- पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म  है। वेदों को अपनाने के अनेकों कारण थे। वेद पुरुषार्थ और कर्मण्यता  का उपदेश देते हैं, भाग्य, नियति का विरोध करते हैं-कुरुवन्नेवेह कर्माणि जिजिविषेत्  यावत जीवन कर्म करते हुये जीने की इच्छा करो, परमेश्वर ने मानवयोनि को उन्नति करने तथा दक्षता प्राप्त करने के लिए बनाया है- उद्यानम् ते नावयानं, जीवातुं ते दक्षतातुं  कृणोमि – वेद कर्म न करने वालों को, कामचोर, दस्यु कहता है, ऐसे परजीवियों, पैरासाइटों को दण्ड देने का आदेश देता है। अकर्मा दस्युः बधिः  दस्युं। परमेश्वर ने मनुष्य को उचित, अनुचित परखने की शक्ति दी है वेद कहते है- अश्रधं अनृते दधात्, श्राद्धं सत्ये प्रजापतिः। वेदों में पाप क्षमा का सिद्धांत नहीं है। पाप या पुण्य सबका फल मनुष्य को भोगना पड़ता है- अवश्यमेव भोक्तव्यम् कृतं कर्म शुभाशुभं। वेदों में सांसारिक और पारमार्थिक उन्नति का परिपूर्ण उपदेश हुआ है। वेद में कृषि, वाणिज्य, उद्योग, सबकी शिक्षा है। वेद में सब विद्याओं का मूल पाया जाता है। वेदों में पृथ्वी से लेकर अन्तरिक्ष और द्यौलोक पर्यन्त सब ज्ञान का परिपूर्ण वर्णन है। वेद में स्वराज्य की बड़ी महिमा है। अनेक मन्त्रों में अर्चनननु स्वराज्यम का सम्पुट हुआ है। वेद में प्रखर राष्ट्रवाद  की महिमा का वर्णन है, प्रार्थना है कि हमारे राष्ट्र में सब प्रकार के विद्वान्,  योद्धा , विदुषी स्त्रियाँ और बलवान गाय, घोड़े, पशु आदि हों । वेद में मातृभूमि की बड़ी उत्कृष्ट भावना विद्यमान है। अथर्ववेद में भूमिसूक्त में कहा गया है- ‘‘माता भूमिः, पुत्रोहम् पृथिव्याः’’ मातृभूमि की यह प्राचीनतम प्रतिष्ठा है. वेद में विश्व सरकार और विश्व नागरिक का भी वर्णन है। वेद में विश्वनागरिक को ‘‘विश्वमानुष’’ कहा गया है। यह संयुक्त राष्ट्रसंघ  से भी अधिक उत्कृष्ट व्यवस्था वेदों में पायी जाती है। महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन की परवाह न करते हुए भी सत्य, न्याय और वेद का प्रचार किया। मानव जाति के कल्याण में ही उन्होंने अपना जीवन समाप्त कर दिया। सत्य की रक्षा के लिए ही उन्हें धोखे  से विषपान कराया गया और 1883 ईभ में दिवाली की संध्या को उनका देहांत हो गया। ऐसे महात्मा का पुण्य स्मरण भी सौभाग्य है।

- प्रो० उमाकान्त उपाध्याय

पी-30, कालिन्दी हाउसिंग स्कीम, कोलकाता-700089

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