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सनातन मंचो से भटके कथावाचक

भारत में आजकल भागवत कथा के नाम पर एक दूसरी ही कथा चल रही है। इस कथा में योगेश्वर श्रीकृष्ण जी महाराज की जीवनलीला के बीच में अल्लाह मोला जीसस और नबी आ गये है। भारत के कुछ बड़े प्रसिद्ध कथावाचक है, जिनका काम सामान्य जनों तक धर्म का ज्ञान और महापुरुषों का चरित्र पहुंचाने का है। वह आजकल इस्लाम का प्रचार कर रहे है। सोशल मीडिया पर अनेकों ऐसी विडियो घूम रही है जिनमें कथित कथावाचक सनातन मंचो का प्रयोग अपने किसी निजहित के लिए करते दिख रहे है। निजहित इसलिए कहा क्योंकि जब ये लोग मुफ्त में भागवत कथा नहीं करते तो मुफ्त में नमाज अजान का प्रचार क्यों रहे है?

आखिर भागवत कथा करते करते ये लोग अचानक कुरान कथा क्यों करने लगे? कहीं ऐसा तो कि धार्मिक ट्रस्टो को मजहब विशेष द्वारा कुछ फंड दिया जा रहा हो। या फिर यह लोग इतने धर्मनिरपेक्षता में इतने अंधे हो गये कि अपना धर्म दिखाई नहीं देता और 1400 साल पहले एक व्यक्ति द्वारा खड़ा किया संगठन इन्हें धर्म दिखाई देने लगा? अगर ऐसा है तो जब किसी धर्म के ध्वजवाहक ही पथ पथभ्रष्ट हो जाये तो उस धर्म का क्या होगा यह हम सबको सोचना होगा!

आखिर क्यों किसी को जीसस और मोहमम्द की करुणा दिखाई दे रही है, आखिर योगिराज श्रीकृष्ण जी महाराज के जीवन चरित्र के बीच में अल्लाह मोला जीसस मोहम्मद कहाँ से आ गये? व्यासपीठ पर बैठकर एक कथावाचक देवी चित्रलेखा जी अब कह रही है कि क्या फर्क पड़ता है मैं तो सभी धर्मो में विश्वास करती हूँ।

शायद इन देवी जी को इतिहास का ज्ञान नहीं है कि कभी ईरान के पारसी भी सोचते थे कि क्या फर्क पड़ता है, नतीजा आज इरान में पारसी नहीं है। कभी अफगानिस्तान के हिन्दू और बौद्ध सोचते थे क्या फर्क पड़ता है परिणाम आज वहां न बौद्ध है न हिन्दू। कभी बलूचिस्तान के हिन्दू भी सोचते थे कि क्या फर्क पड़ता है आज बलूचिस्तान में हिन्दू नहीं है, कभी लाहौर और पेशावर के सिख भाई भी सोचते थे कि क्या फर्क पड़ता है आज लाहौर में सिख नहीं है। कभी कश्मीर के हिन्दू सोचते होंगे क्या फर्क पड़ता है आज घाटी के हिन्दू जिन्हें पंडित कहा जाता है उनसे जाकर पूछिए पता चल जायेगा क्या फर्क पड़ता है।

असल में आज कल जिस तरह कोई भी उठकर कथा करने लगा हैं, उससे यह एक पूरा बिजनेस बन गया? कथावाचकों की बढ़ती लोकप्रियता मजेदार कथावाचक पैदा कर रही है। ये ऐसे कथावाचक हैं जो सत्संग के गुर इंस्टिट्यूट में सीख कर आ रहे हैं और वह भी गुरुदक्षिणा नहीं बल्कि फीस देकर। कभी आप वृंदावन जाएं तो वहां की दीवारों पर गौर करें। कैसे वहां की दीवारें फटाफट कथावाचक बना देने वाले दावों से वे अंटी पड़ी हैं। वृंदावन में कथावाचक पैदा करने एक-दो नहीं बल्कि 100 के करीब सेंटर खुल गए हैं। इनमें से कुछ ऐसे संस्थान हैं जो 3 से 6 महीने में ही एक्सपर्ट कथावाचक बनाने का दावा करते हैं। और तीन महीने में सीख कर आये कथा वाचक आजकल गोपियों के किस्से सुना रहे है।

हालाँकि पुराणों के साथ इसका आरम्भ मुग़लकाल से शुरू हो गया था जब मुगलों ने देखा था कि योगेश्वर श्रीकृष्ण जी का चरित्र इतना ऊँचा और महान है कि उनका नबी श्रीकृष्ण जी का मुकाबला नहीं कर सकता तब रहीम और रसखान द्वारा कृष्ण के चरित्र को बदनाम करने का काम शुरू हुआ। रहीम ने अपने दोहों में कृष्ण से गोपियों के कपडे चोरी करने की कथा जोड़ दी और रसखान ने सुजान रसखान और प्रेमवाटिका में उनकी 16 हजार पत्नियाँ जोड़ दी तथा श्रीकृष्ण जी को रसिक रासलीला वाला करने वाला बना दिया। माखन चोर से लेकर उन्हें छिपकर कपडे चुराने वाला बना दिया। गीत बना कि मनिहार का वेश बनाया श्याम चूड़ी बेचने आया, अश्लील कथा जोड़ दी कि उनके आगे पीछे करोड़ो स्त्रियाँ नाचती थी वो रासलीला रचाते थे।   

जबकि श्रीकृष्ण की बांसुरी में सिवाय ध्यान और आनंद और साधना के और कुछ भी नहीं था पर मीरा के भजन में दुख खड़े हो गये, पीड़ा खड़ी हो गयी। सूरदास के कृष्ण कभी बड़े नही होते उन्होंने अपनी सारी कल्पना कृष्ण के बचपन पर ही थोफ डाली। पता नही बड़े कृष्ण से सूरदास जी को क्या खतरा था। हजारों सालों तक कृष्ण के जीवन को हर किसी ने अपने तरीके से रखा भागवत कथा सुनाने लगे। कृष्ण का असली चरित्र जो वीरता का चरित्र था जो साहस का था, जो ज्ञान का था जो नीति का था, जिसमें युद्ध की कला थी वो सब हटा दिया नकली खड़ा कर दिया जिसका नतीजा आने वाली नस्लें नपुंसक होती गयी। रासलीला की बात के पीछे हमारी कायरता छुप कर बैठ गई है।

जिस तरह आज ये व्यासपीठ पर बैठे कथाकार श्रीकृष्ण जी को रसिक बोलते है क्या ये जानते कि स्त्री जाति के सम्मान की बात अगर आये तो कृष्ण जैसा कोई उदहारण इस संसार नहीं मिलेगा। मोहमद ने स्त्री को पुरुष की खेती कहा, तो जीसस ने तो उनके बीच प्रवचन करने से मना कर दिया। बुद्ध ने स्त्री से को दीक्षित करने से मना किया। महावीर ने तो स्त्री को मोक्ष के लायक ही नहीं समझा। 24 तीर्थकरों में एक तीर्थकर थी मल्लिबाई उसका नाम भी बदलकर मल्लीनाथ कर दिया। परन्तु कृष्ण ने भूलकर भी जरा-सा भी अपमान किसी स्त्री का नहीं किया। ये जरुर हो सकता है कि स्त्री जाति कृष्ण का सम्मान करती रही होगी लेकिन इन झूठ के ठेकेदारों ने खुद महिलाओं का शोषण करने के लिए श्रीकृष्ण के महान चरित्र को रासलीला से जोड़ दिया। सोचिये जो श्रीकृष्ण भरी सभा में द्रोपदी को नग्न करने पर जाकर कपडे से ढक देते है, वो भला किसी को नंगा देखने के लिए कपडें चुरायेंगे?

लेकिन निति, ज्ञान, ध्यान, तप और साधना के सिरमौर योगेश्वर श्रीकृष्ण जी के चरित्र को वह लोग कलंकित कर रहे है। जो अपने करोड़ो अरबो के ट्रस्ट बनाकर महलों में सुख भोग रहे और भगवान श्रीकृष्ण जी की कथा में अल्लाह मोला कर रहे है। और बेशर्मी के साथ कह रहे है कि क्या फर्क पड़ता है। ये आज के जयचंद है जो थोड़ी सी प्रसिद्धि के लिए पैसा कमाने के लिए आज भगवान कृष्ण को आरोपित कर रहे है। हालाँकि धर्म की बुनियादों में योगेश्वर श्रीकृष्ण हमेशा से जीवित है और रहेंगे, उन्हें कोई मिटा नहीं सकता। लेकिन जरुरत है इन फर्जी कथावाचकों से बचने की जो भगवान श्रीकृष्ण जी के चरित्र को कलंकित कर रहे है और जीसस और मोहम्मद को महान बता रहे है। जो ध्यान साधना छोड़कर नमाज अजान का प्रचार कर रहे है और फिर कह रहे है क्या फर्क पड़ता है।

लेख- राजीव चौधरी

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