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समलैंगिकता और ईश्वरीय आदेश

Sep 12 • Arya Samaj • 363 Views • No Comments

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वेद में बताया गया है कि “द्यौरहं पृथिवी त्वं तावेव विवहावहै सह रेतो दधावहै प्रजां प्रजनयावहै पुत्रान् विन्दावहे बहून्।” अर्थात् हे वधू ! मैं द्युलोक के समान वर्षा आदि का कारण हूँ और तुम पृथिवी के समान गृहाश्रम में गर्भधारण आदि व्यवहारों को सिद्ध करनेवाली हो । हम दोनों परस्पर प्रसन्नतापूर्वक विवाह करें । साथ मिलकर उत्तम प्रजा को उत्पन्न करें और बहुत पुत्रों को प्राप्त होवें ।

इससे ज्ञात होता है कि विवाहपूर्वक गृहाश्रम में प्रवेश करने का एक मुख्य प्रयोजन होता है धर्म पूर्वक उत्तम सन्तान की उत्पत्ति करना न कि अधर्मपूर्वक केवल इन्द्रियों का दास होकर, ईश्वर प्रदत्त इन शरीर, इन्द्रिय आदि साधनों का दुरुपयोग करके भोग-विलास में डूबे रहना ।
इस प्रकार वेदों में न जाने कितने ही सारे निर्देश हैं कि केवल सुसन्तान की प्राप्ति के लिए ही विवाह आदि प् प्रावधान है । जैसे कि – “गृभ्णामि ते सौभागत्वाय हस्तं मया पत्या ” अर्थात् हे वरानने ! मैं ऐश्वर्य और सुसन्तान आदि सौभाग्य की वृद्धि के लिए तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ । मुझ पति के साथ वृद्धावस्था पर्यन्त सुख पूर्वक सम्पूर्ण जीवन को व्यतीत करो ।

इससे भी पता चलता है कि हमारे वेद तथा वैदिक संस्कृति में यह एक आदर्श परम्परा रही है कि विवाह केवल सन्तान प्राप्ति के लिए ही किया जाता था । यदि हम वर्त्तमान के सुप्रीमकोर्ट के निर्णय को ध्यान में रखते हुए विचार करें तो यह समलैंगिक विवाह को स्वीकृति मिलना एक अत्यन्त ही घृणित, पाप-जनक, अप्राकृतिक, और एक अवैदिक कृत्य है, जो कि कभी भी धर्मयुक्त या उन्नतिकारक नहीं हो सकता बल्कि समाज के लिए यह एक निन्दनीय, अपमान जनक और महाविनाश और सामाजिक पतन का कारण है । इस प्रकार की घटना न किसी धर्म शास्त्र में समाज शास्त्र में उल्लिखित है और न ही हमारे किसी इतिहास में ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई है । यह तो आजकल के लोगों की मूर्खता की पराकाष्ठा ही है ।

शास्त्रों में कहा गया है “यथा राजा तथा प्रजा” । जब राजा ही मुर्ख हो, जब देश के न्यायाधीश ही मूर्खता का परिचय दे रहे हैं तो सामान्य जनता भला क्या कर सकती है । प्रजा तो अज्ञानता में घूम ही रही है, ये जनता तो इतनी भोली-भाली है कि इनको तो कोई भी बहका दे कोई भी गलत रास्ता दिखा दे उसी पर चल पड़ते हैं । अब वैसे भी समाज में बहुत कुछ अनैतिक, असामाजिक, अवैदिक, कार्य होते रहते हैं, यह भी उस सामाजिक दुरावस्था और पतन के कारणों में और एक कड़ी बनकर सामने उपस्थित हो गया है । यह हम सबके लिए एक दुखद विषय है ।

आजकल जो न्यायाधीश के कुर्सी पर बैठे हैं, वे सोच रहे होंगे कि हम कुछ भी निर्णय सुना सकते हैं और कोई बोलनेवाला नहीं है । परन्तु उनको यह अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि आप सबके ऊपर भी सबसे बड़ा एक न्यायाधीश ईश्वर बैठा हुआ है जो कि इन मनुष्य न्यायाधीशों को भी इन लोगों की मूर्खता पर यथोचित दण्ड देने में सामर्थ्य रखता है । इस निर्णय से आगे जाकर समाज का जो भी दुरावस्था होगी, जितना भी पतन होगा, जितना भी पाप और अराजकता बढ़ेगी उन सबका कारण यही न्यायाधीश ही होंगे और यही इन सब परिणामों का उत्तरदायी होंगे । सावधान हो जाओ मनुष्यो ! जितना जितना वेद के विरुद्ध ईश्वर आज्ञा के विरुद्ध आचरण करते जाओगे उतना ही दुष्परिणाम भोगतना पड़ेगा । ईश्वरीय दण्ड व्यवस्था से कोई न आजतक बचा है और न ही कोई बाख पायेगा । ईश्वर हम सबका कल्याण करे ।

लेख – आचार्य नवीन केवली

 

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