होली का पर्व और वैदिक धर्म’

May 28 • Vedic Views • 454 Views • No Comments

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फाल्गुन मास की पूर्णिमा को  मनाये  जाने  वाले  पर्व होली का प्राचीन नाम ‘‘वासन्ती नवसस्येष्टि’’ है। यह उत्सव-पर्व वसन्त ऋतु के आगमन पर मनाया जाता है। चैत्र कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को एक दूसरे केचेहरेपर रंग लगाकर  या जल में  घुले  हुए रंग को एक दूसरे पर डाल कर तथा परस्पर मिष्ठान्न का आदान-प्रदान कर इस पर्व को मनाने की परम्परा चली आ रही है। यह भी कहा जाता है कि इस पर्व के दिन पुराने मतभे दो , वैमनस्य व शत्रुता आदि को भुला कर नये  मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का आरम्भ किया जाता है। कुछ-कुछ कहीं आशानुरूप हो ता भी है परन्तु इसका पूर्णतः सफल हो ना संदिग्ध है। सर्वत्र रंग-बिरंगे फूलों के खिले होने से वातारण भी रंग-तरंग-मय या रंगीन सा होता है।इस कारण वासन्ती नवसस्येष्टि, अपर नाम होली, को  रंगो  के  पर्व की उपमा दी जा सकती है। वसन्त ऋतु भारत में  हो ने वाली 6 ऋतुओं  का राजा है । वसन्त ऋतु में शीत ऋतु का अवसान हो  जाता है और वायुमण्डल शीतोषण जलवायु वाला हो ता है। वृक्षों मे  हरियाली सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है और नाना प्रकार के फूल व हरी पत्तियां सारी पृथिवी पर सर्वत्र दिखाई  देतीं है । ऐ सा प्रतीत होता है कि प्रकृति ने किसी विशेष अवसर पर किसी महनीय उद्देष्य से  अपना श्रृंगार किया है। यह श्रृंगार वसन्त  ऋतु  व चैत्र के  महीने  से आरम्भ हो ने वाले नवसंवत्सर का स्वागत करने के लिए ही किया जा रहा प्रतीत होता है। टेसू  के वृक्षों पर फूलो से लदी हुई डालियां शोभायमान हो कर कहती है कि तुम भी हमारा अनुसरण कर अपने जीवन को विभिन्न सात्विक रंगो से  रंग कर नवीन आभा से  शोभायमान होे । इस वातावरण में  मन उमंगों  से भरा होता है। प्रकृति के इस स्वरूप को देखकर सात्विक मन वाला व्यक्ति कह उठता है कि हे ईश्वर तुम महान हो। नाना प्रकार के फलों , पत्तियों  व वनस्पतियों से अलंकृत सारी सृष्टि को देखकर भी यदि मनुष्य इन सबके रचनाकार को अनुभव वा प्रत्यक्ष नहीं करता तो एक प्रकार से उसका ऐसा होना जड़-बुद्धि होने का प्रमाण है।  भिन्न-भिन्न रंगों  के पुष्पो की छटा व सुगन्धि वातावरण मे फैल कर सन्देश दे रही है कि तुम भी भिन्न-भिन्न रंगो  व सुगन्धि अर्थात् विविध गुणों  को जीवन मे धारण करो, जो कि आकर्षक हो तथा जिससे  जीवन पुष्पो की भांति प्रसन्न, खिला-खिला तथा दूसरों को भी आकर्षित व प्रेरणा देने वाला हो। यह प्रकृति के विभिन्न रंग ईश्वर में  से  ही तो प्रस्फुटित हो  रहे हैं जिससे  अनुमान हो ता है कि सात्विक व्यक्ति को भी निरा एकान्त से वन वाला न हो कर समाज के साथ मिल कर अपनी प्रसन्नता को सात्विक रंगो के  द्वारा अभिव्यक्त करना चाहिये । ऐसे  ही कुछ मनोभावो को होली के फाग वाले दिन लोग क्रियान्वित करते  हुए दिखते हैं। होता यह है कि त्यौहार के दिन जिस व्यक्ति को जो व्यस्न हो ता है, वह उसका से वन कर स्वयं को प्रसन्न करता है। आजकल होली के अवसर पर मदिरापान का कृत्य कुछ इसी प्रकार का लगता है। मदिरापान जीवन को विवेकहीन बना कर पतन की ओर ले जाने  वाला पेय है। इस प्रकार से हो ली मनाने  का वैदिक संस्कृति से  अनभिज्ञ लोगों  का यह अप्रशस्त  तरीका है।

हम देखते हैं  कि होली पर पूर्णिमा वाले  दिन देर रात्रि को होली का दहन करते हैं। बहुत सारी लकडि़यों  को एकस्थान पर एकत्रित कर अवैदिक विधि से पूजा-अर्चना कर उसमें अग्नि प्रज्जवलित कर दी जाती है। कुछ समय तक वहलकडि़या जलने के  बाद बुझ जाती है। लोग यह समझते हैं कि उन्होंने कोई बहुत बड़ा धार्मिक कृत्य कर लिया है जबकि ऐसा नहीं  है। होली को इस रूप में जलाना किसी प्राचीन लुप्त प्रथा की ओर संकेत करता है। सृष्टि के आरम्भ से  ही वेदा की प्रेरणा के अनुसार अग्निहोत्र-यज्ञ करने की प्रथा हमारे  देश में  रही है। आज भी यह यज्ञ आर्य  समाज मन्दिरों व आर्यो के घरों में नियमित रूप से किये जाते हैं। पूर्णिमा व अमावस्या के दिन पक्षेेष्टि यज्ञ करने का प्राचीन शास्त्रों मे विधान है जिन्हें दर्ष  व पौर्णमास नामों से  जाना जाता है। जो कार्य परिवार की इकाई  के रूप में  किया जाता है वह स्वाभाविक रूप सछोटा होता है तथा जो सामूहिक स्तर पर किया जायेगा वह वृहतस्वरूप वाला होगा जिससे  उसका प्रभाव परिमाण के अनुरूप होगा। होली का दिन पूर्णिमा का दिन होता है। फाल्गुन के महीने मे इस दिन किसानो के  खेतों मे गेहूं  की फसल लहलहारही होती है। गेहूं की बालियों में गेहूं के दाने पूरी तरह बन चुके हैं, अब उनको सूर्य  की धूप चाहिये  जिससे  वह पक सकें। इन गेहूं की बालियों वा इनके भुने हुए दानों  को होला कहते  हैं। कुछ दिनों बाद ही वह फसल पक कर तैयार हो जायेगी और उसे काटकर किसान अपने घर के खलिहानों में  संभालेगे । इस सं ग्रहित अन्न से पूरे वर्ष भर तक उनका परिवार व देशवासी उपभोग करेगें  जिससे  सबको बल, शक्ति , ऊर्जा, आयु , सुख, प्रसन्नता व आनन्द आदि की उपलब्धि होगी। गेहूं की बालियों अथवा होला को पूर्णिमा के यज्ञ में डालने से वह अग्नि देवता द्वारा संसार के समस्त प्राणियों व देवताओं को पहुँच जाती हैं और देवताओं का भाग उन्हें देने के बाद कृषक व अन्य लोग उसका उपयोग व उपभोग करने के लिए पात्र बन जाते  हैं। होली का पौराणिक विधान उसी नव-अन्न-इष्टि यज्ञ की स्मृति को ताजा करता है। इसी कारण प्राचीन काल मे इस पर्व को नवसस्येष्टि कहा जाता था। आज के दिन होना तो यह चाहिये  कि होली का स्वरूप सुधारा जाये । होली रात्रि मे न जलाकर दिन में  10-11 बजे  के बीच गांव-मुहल्ला के  सभी लोगों की उपस्थिति मे एक स्थान पर वृहत्त यज्ञ के अनुष्ठान के रूप में  आयोजित की जाये । कोई  वैदिक विद्वान जो यज्ञ के विशेषज्ञ हो, उस यज्ञ को कराये । उसका महत्व उपस्थित जनता को विदित कराये और यज्ञ के अनन्तर सभी स्त्री-पुरूष मिलकर एक दूसरे को शुभकामनायें  दें  और अपनी ओर से  मिष्ठान्न वितरित करे । वहां एक बड़ी दावत या लंगर भी होली या नवसस्येष्टि पर्व के उपलक्ष्य में किया जा सकता है।  लोकाचार व प्रचलित व्यवस्था के अनुसार यदि चाहे  तो प्राकृतिक रं ग का तिलक-टीका चेहरे पर लगाकर शुभकामनाओ का परस्पर आदान-प्रदान भी किया जा सकता है ।  प्राचीन वर्ण व्यवस्था के अनुसार चार वर्णो ब्राह्मण , क्षत्रिय, वैष्य व शुद्र  का एक-एक पर्व  है जिनके नाम क्र मषः श्रावणी या रक्षा-बन्धन, दशहरा या विजयादशमी, दीपावली या शारदीय नवसस्येष्टि एवं  होली या वासन्ती नवसस्येष्टि हैं ।  हमारे  यहां  प्राचीन काल से ही यज्ञो की परम्परा रही है। प्रत्येक पूर्णिमा व अमावस्या को पक्षेष्टि यज्ञ किये जाते थे तथा आर्य समाज की स्थापना से यह पुनः प्रचलित हो गये हैं। गेहूं  नयी फसल के दानो से  पूर्णिमा के वृहत्त यज्ञो मे आहुतियां देने  से हो ली नाम सार्थक होता है। ऐसा ही प्राचीन काल में  होता रहा था जिसका बिगड़ा हुआ रूप वर्त मान का हो ली का पर्व  है।  यद्यपि यह पर्व कृषको  , श्रमिकों  व वैष्य वर्ण का है तथापि इसको सभी वर्णों  व समुदायों के द्वारा मिलकर मनाये जाने से  समाज में  एक अच्छी भावना का उदय हो ता है। समय के साथ-साथ कुछ लोगों  के साधन बहुत बढ़ गये  हैं । अधिक प्रजाजन मध्यम श्रे णी व साधनहीन है । धनी हर कार्य  में , दिखावें  की अपनी कृत्रिम मानसिक प्रकृति व रूतबे  के लिए, प्रभूत धन व्यय करते  हैं। अन्य मध्यम व निम्न वर्ग वाले इनका अन्धानु करण करते  हैं। इस सबने व मध्यकालीन अज्ञान व अन्धकार ने पर्वो  की मूल भावना को विस्मृत करा दिया है। गेहूं के दानों से यु क्त बालियां समस्त मनुष्य समाज के लिए आवश्यक , अपरिहार्य  व महवपूर्ण  हैं। हमारा देह व शरीर अन्नमय है। अन्य सभी प्राणियों के शरीर भी अन्नमय हैं। इनका प्रतीक यदि सभी अन्नों  मे मुख्य गेहूं वा होला को मान ले तो कृषक व ई ष्वर द्वारा उसका निर्माण व उत्पादन होने में  त था खेतों मे  फसल को  लहलहाते  देख कृषकों -श्रमिक-वैश्य बन्धुओं व प्रकारान्तर से  सभी प्रजा-जनों  को जो  प्रसन्नता हो ती है उसको अभिव्यक्त करने के लिए वृहत्त यज्ञ रचाने व सबके द्वारा उसे  मिलकर करने, उसमें  नवान्न गेहू  के दानों होलको की यज्ञ-द्र व्य के रूप में  आहुतियां देने  जिससे  ईश्वर की कृपा से  वह अन्न सभी देशवासियों की सु ख-समृद्धि का आधार बने, यह भावना निहित दिखाई  देती है । एक बार रंगों के बारे में  पुनः विचार कर इसमें  निहित सन्देश को जानने  का प्रयास करते  हैं। सभी रंग ईश्वर के बनाये  हुए हैं । इसकी भी जीवन में कुछ उपयोगिता अवश्य होगी अन्यथा ईश्वर  इन्हें बनाता ही क्यों? यदि विचार करे तो जीवन में शैशव काल के  बाद बाल्यावस्था आती है जब माता-पिता बालक-बालिका को गुरूकुल भेजकर उसे  शिक्षा व संस्कार देने  का प्रयास करते  हैं। बाल्यावस्था के बाद युवावस्था आरम्भ होती है, यह भी जीवन का एक भाग या रंग है जब मनुष्य में  शक्ति व उत्साह हिलोरें लेता है। जीवन की इस अवस्था में  मनुष्य उपलब्धियां  प्राप्त करता है। महर्षि दयानन्द भी 18 वर्ष  की आयु  में  अपना घर, परिवार, गली-मोहल्ला, माता-पिता, भाई -बन्धु व मित्र-सखाओं  को छोड़ कर संसार की सच्चाई  व रहस्य को जानने  के  लिए तथा सृष्टिकर्ता को जानकर उसे  प्राप्त करने, जिसे हम सच्चे शिव की खोज कहते  हैं, निकले  थे । इसके अतिरिक्त उनके मन में  मृत्यु  का डर भी भरा हुआ था जिससे  वह बचना चाहते  थे। इस डर पर विजय पाने के उपाय ढूंढ़ना भी उनका उद्देश्य था जिसमें वह सफल हुए। मृत्यु  पर विजय पाने का प्रमाण उनकी स्वयं की मृत्यु  का दृष्य है। हम देखते  हैं कि विपरीत परिस्थितियों में  हुई उनकी मृत्यु  व उससे  पूर्व  के शारीरिक कष्ट उन्हें किंचित विचलित नहीं कर पाये  थे। युवावस्था से  पूर्व तथा युवावस्था का कुछ समय विद्यार्जन मे लग जाता है। इसके बाद विवाह होता है और फिर व्यवसाय का चयन, सन्तति वृद्धि व सन्तानों की शिक्षा -दीक्षा के दायित्व होते  हैं ।  युवावस्था में  व्यक्ति अच्छे या बुरे , अपने स्वभावानु सार, ज्ञान, सामर्थ्य , अन्तः प्रेरणा आदि से  प्रभावित हो कर कार्य  करता है। युवावस्था के बाद परिपक्वता आती है जो  युवावस्था का सांध्यकाल होता है और इसके कुछ समय बाद वृद्धावस्था आरम्भ होती है। जीवन की विभिन्न अवस्थाओं  का अपना-अपना महत्व व उपयोगिता है और इसमें  नाना प्रकार के रंग होते  हैं। रंग अर्थात् जीवन की भिन्न-भिन्न अवस्थाये । अन्य अवस्थाओं को छोड़कर यदि युवावस्था पर दृष्टिपात करे  तो पाते  हैं कि वह आज के  युवा सब आधुनिकता के रंग मे  रंगे हैं जिसमें  बुद्धि का उपयोग नाममात्र है। हमें लगता है कि कुछ थोड़ी सी बाते अच्छी हो सकती हैं। आधुनिक जीवन शैली हमें  विनाश की ओर अधिक ले जा रही है परन्तु हमारे युवाओ मे  सोचने व समझने की अधिक क्षमता नहीं है । आजकल का सामाजिक व वैश्विक वातावरण भी अनुकूल न होकर प्रतिकूल है। हमें यहां  विवेक से  अपना मार्ग तय करना होगा। आज की हमारी युवापीढ़ी जो आधुनिकता की चकाचौंध से  सम्मोहित हो रही है  उसने वेद, वैदिक साहित्य, महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवन चरित्र और उनके सत्यार्थ प्रकाश आदि ग्रन्थ नहीं पढ़े हैं। यदि पढ़े होते तो फिर वह बुद्धि ज्ञान की आँखे बन्द करके आधुनिकता को न अपनाते  और अपना भला-बुरा समझ पाते । अतः होली का पर्व मनाते हुए हमें आत्म-चिन्तन कर अच्छे-बुरे में भेद कर भद्र या अच्छे को अपनाना होगा और अन्य अविवे की लोगों  की भांति आधुनिकता में  न बह कर सत्य, वैदिक ज्ञान व विवेक के मार्ग पर चलना होगा अन्यथा आधुनिक जीवन शैली भविष्य मे हमारे  लिए पष्चाताप का कारण होगी। अतः युवापीढ़ी को अपनी बुद्धि को सत्य व असत्य तथा अच्छे व बुरे का निर्णय करने मे सामर्थ बनाना चाहिये  और असत्य को त्याग कर सत्य को  ग्र हण करना चाहिये , यही होली पर विचार व चिन्तन करने का एक विषय हो  सकता है ।   हमारे  धर्म व संस्कृति का आधार वेद एवं  वैदिक साहित्य है। वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है। ईश्वर इस सृष्टि का

रचयिता व समस्त प्राणि जगत का उत्पत्तिकर्ता है। वह बड़े  से बड़े  वै ज्ञानिक से  अधिक ज्ञानवान, बड़े  से  बड़े मनुष्य आदि प्राणी से  कहीं अधिक बलवान ही नहीं अपितु  सर्वशक्तिमान , सर्वव्यापक, सत्य-चित्त-आनन्द स्वरूप, निराकार व सृष्टि का धारण व पोषण-कर्ता है। इसने हमें मनुष्य का जन्म किसी विशेष उद्देष्य व लक्ष्य की पूर्ति के लिये  दिया है। हमें उसे  जानना है। वह लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष है। दु:खो से  निवृत्ति व आनन्द की प्राप्ति का मार्ग वैदिक ग्रन्थों  का अध्ययन-स्वाध्याय, याज्ञिक कार्य व वैदिक जीवन है। धर्म अर्थात् कर्तव्य व वेद विहित कर्म यथा सन्ध्योपासना, अग्निहोत्र, पितृयज्ञ अतिथि-यज्ञ व बलिवैष्वदेव-यज्ञ आदि कर्म हैं। इनका पालन व आचरण ही धर्म है। मनुष्य को अपनी षारीरिक, बौद्धिक, मानसिक व आत्मिक उन्नति करनी है जो  वेदाध्ययन पर जाकर पूरी होती है। इन्हें जानना व इनका पालन करना

धर्म होता है। इनको करते  हुए धर्म  से अर्थ का उपार्जन करना व धर्म  व अर्थ से  जो सुख की सामग्री प्राप्त हो , उसका वैदिक-मर्यादाओं  के अनुसार उपभोग करना, ‘काम’ है। इनको करते  हुए उपासना-योग से  ई ईश्वर का साक्षात्कार होने  पर मोक्ष की प्राप्ति हो ती है। यहां  पहुंच कर जीवन का उद्देष्य पूरा हो  जाता है। जीवन का लक्ष्य मोक्ष समीप होता है।  यदि इस मार्ग का अनुसरण नहीं करेगें  तो हमारा यह जन्म व परजन्म दोनों  दु:खों  से  पूर्ण  व असफल हो गें । हमने देखा है कि कोई  भी समझदार व्यक्ति किसी अशिक्षित का अनुकरण व अनुसरण कभी नहीं करता, यदि करता है तो वह मूर्ख होता है। परन्तु यहां हम देखते  हैं  कि जीवनयापन के क्षेत्र में  हम मूर्खो  का प्रायः अनुकरण करते  हैं व कर रहे हैं। हमें जिन लोगों को शिक्षित करना था हमने उनके मूर्खतापूर्ण कार्यो का अपनी कामनाओं की पिपासा को भोग द्वारा शांत करने के लिए  अनुसरण किया। यह हमारी भारी भूल है जिसका सुधार हमें करना होगा अन्यथा इसका असुखद परिणाम कालान्तर में हमारे सामने आयेगा। अतः सत्यासत्य के विवेक में  देरी करना हानिकारक है। यहां  इतना अवश्य कहना है कि वेद व वैदिक साहित्य में  वर्तमान मे मनाई  जाने वाली होली का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। महर्षि दयानन्द ने  भी अपने विस्तृत साहित्य मे इस प्रकार की होली का उल्लेख या विधान नहीं किया है, केवल नवसस्येष्टि का ही उल्लेख उन्होंने किया है। पुराणों  में  भी इस प्रकार की होली का विधान होने का अनुमान नहीं है। पुराणो मे एक राजा हिरण्यककश्यपु , उसकी बहिन हो लिका व पुत्र प्रहलाद् की कथा आती है जिसका उद्देष्य ईश्वर की उपासना व भक्ति का सन्देष देना है  जिससे  लोग ईश्वर  भक्ति मे प्रवृत्त हो । इस कथा का वर्तमान की होली से कोई सीधा व लाभकारी सम्बन्ध नहीं है।   होली के दिन फाल्गुन मास समाप्त होता है तथा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष का आरम्भ होता है। चैत्र मास के  शुक्ल पक्ष से  नया वैदिक संवत्सर आरम्भ होता है। हमें लगता है कि होली का पर्व पुराने वर्ष को पूर्णिमा के दिन वृहत अग्निहोत्र-यज्ञ से  विदाई  देकर चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के दिन एक प्रकार से  नये  वर्ष के स्वागत का पर्व भी है। पौ राणिक परम्परा के अनुसार स्वागत के  लिए पुष्पो व पुष्प-मालाओं का प्रयोग करते  हैं। इस प्रकार पुष्प भेंट कर यह दिखाया जाता है  कि फूलों की तरह नाना रंगों से विभूषित व सुन्दर तथा उनकी सु गन्धि की महक से स्वयं को सुवासित कर रहे हैं।  प्रकृति इस दिन पहले से ही नाना रगों के फूलों  से सज-धज कर चैत्र मास के स्वागत के लिए तैयार होती है। वायु मण्डल व मौसम भी अपनी शीतलता को कम कर देता है। इस दिन, यदि वर्षा आदि न हो, तो बहुत सुहावना व अनुकूल मौसम होता है। लगता है कि प्रकृति अपने रंग-बिरंगे फूलों  व उनकी सुगन्ध से नये वर्ष के प्रथम महीने चैत्र का स्वागत कर रही है। हम यज्ञ से  वातावरण मे सुगन्ध उत्पन्न करते  हैं तो प्रकृति भी पुष्पो की सुगन्ध से  वातावरण को सुवासित करती है।  यह प्रकृति का स्वयं का सृष्टि-यज्ञ है। इसी का प्रतीक हमारा यज्ञ भी होता है। हमारा जीवन उत्साह, उमंग, जोश , विवेक,  ज्ञान, उपासना, अग्निहोत्र यज्ञ, आत्म-कल्याण की भावना, वेदों के प्रचार की कामना व भावना, सत्य के प्रति आग्रह का स्वभाव आदि से भरा होनी चाहिये । यही इस पर्व से द्योतित होता लगता है । इस अवसर पर हमारी सबको शुभकामनायें।

-मनमोहन कुमार आर्य

196 चुक्खूवाला-2, देहरादून-248001

फोनः 09412985121

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