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कैथोलिक चर्च के शिकारी पादरी

एक बार फिर पोप फ्रांसिस ने ऐलान किया है कि नाबालिगों के यौन शोषण से जुड़े मामलों में पोप संबंधित मामलों की गोपनीयता का नियम लागू नहीं होगा। इससे पहले चर्च में यौन शोषण के मामलों पर अक्सर पर्दा डाल दिया जाता था। अब जो लोग अपने साथ उत्पीड़न होने की शिकायत करते हैं या कहते हैं कि वो पीड़ित रहे हैं, उनपर ये पाबंदी नहीं रहेगी। पोप का यह बयान उस भूचाल से जोड़कर देखा जा रहा है जब पिछले दिनों दुनियाभर में पादरियों द्वारा यौन उत्पीड़न की हजारों रिपोर्टें आने लगी थीं और वरिष्ठ पादरियों पर इस तरह के मामलों को छिपाने के आरोप लगे थे।

पोप के बयान को अगर आसान भाषा में समझे तो चर्च अपने लम्पट पादरियों के कारनामों को जगजाहिर करेगा। क्योंकि भारत समेत दुनिया भर में चर्च के पादरियों द्वारा नन से लेकर कान्वेंट में मासूम बच्चों को अपनी हवस का शिकार बनाकर मामलों को दबा दिया जाता रहा है। एक समय आयरलैंड धार्मिक ईसाइयों लिए स्वर्ग था, और कैथोलिक चर्च उस स्वर्ग संगीत। किन्तु यह संगीत जब पिछले तीन दशकों में मासूम बच्चों की चीखों और सिसकियों में बदलने लगा, पीड़ित नन तथा बच्चों के परिवार सड़कों पर उतरें तो आयरलेंड सरकार ने जाँच हेतु रयान आयोग का गठन किया। रयान आयोग ने साल 2009 में अपनी 2,600 पन्नों की रिपोर्ट प्रकाशित की इस रिपोर्ट के अनुसार सरकारी निरीक्षण और पर्यवेक्षण के बावजूद, कैथोलिक पादरियों ने दशकों तक हिंसक रूप से हजारों बच्चों का यौन एवं शारीरिक शोषण किया था।

रिपोर्ट में पाया गया कि अनाथालयों और कान्वेंट स्कूलों में बच्चों को गुलाम समझा जाता है। कुछ मामलों में तो अनेकों बच्चों को सेक्स गुलाम बनाया गया। एक संस्था मैग्डलीन लॉन्ड्रीज जहां लड़कियों और महिलाओं को जबरदस्ती रखेल बनाकर रखा गया था। इन संस्थानों की सही हालत का ब्यौरा देते हुए साल 2017 में एक  सरकारी रिपोर्ट में बताया गया था कि 1925 से 1961 तक, मदर एंड बेबी होम, जैसी कई संस्थाओं में लगभग 800 बच्चों की मौतें हुई थी। जिनको बड़े पैमाने पर कब्रों या गड्ढों में दबा दिया गया था। इस कांड में न केवल पादरी शामिल थे बल्कि अनेकों नन की भी सहभागिता पाई गयी थी।

कैथोलिक यौन-शोषण कांड की लहर जब आयरलेंड की सड़कों पर उठी तो अगस्त 2018 में, पोप ने आयरलैंड में एक के बाद कई धार्मिक यात्राएँ की। परन्तु उसी दौरान इस चिंगारी को हवा देते हुए जर्मनी के एक बिशप ने दूसरा खुलासा कर दिया कि 1946 से 2014 तक, 1,670 पादरियों ने 3,677 बच्चों का यौन तथा शारीरिक शोषण किया था। उक्त खुलासों से आहत अन्य देशों के नागरिक भी चर्च को बंद करने के लिए आक्रामक तरीके से आगे आने लगे। क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका में, 2018 में पेंसिल्वेनिया ग्रैंड जूरी ने आरोप लगाया कि 70 वर्षों के दौरान, अमेरिका में 300 से अधिक पादरियों द्वारा 1,000 से अधिक बच्चों के साथ यौन शोषण किया गया था। किन्तु वेटिकन चर्च के अधिकारियों ने पीड़ितों को सफलतापूर्वक चुप करा दिया था। लेकिन उसी दौरान एक अन्य घटना का खुलासा हुआ कि आरोपों में लिप्त अनेकों पादरी जीसस का इस्तेमाल कर रहे थे। यानि पीड़ित शोषित बच्चों को एक सोने के क्रॉस का उपहार दिया जाता था ताकि दूसरे शिकारी पादरी को पहचान हो सकें कि यह अपने यौन शोषण का विरोध नहीं करेगा।

कमाल देखिये पादरियों द्वारा की जा रही इन सब शर्मनाक करतूतों के बाद भी पोप फ्रांसिस ने आयरलैंड की अपनी यात्रा के दौरान ये तो कहा कि यह शर्मनाक और दुखद घटनाएँ लेकिन उन्होंने पादरियों को सुधारने के और दंड देने की आवश्यकता को समझने का कोई संकेत नहीं दिया। उसी समय अमरीका और यूरोप के लोग पोप के दरबार में गुहार लगा रहे थे कि हमें अपने बिशपों-पादरियों के यौन शोषण से बचाओ, तुम्हारा चर्च ऊपर से नीचे तक पाप में डूबा हुआ है।

कहने को आज दुनिया भर में 200,000 से अधिक कैथोलिक स्कूल और लगभग 40,000 कैथोलिक अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधाएं हैं, जो ज्यादातर विकासशील देशों में हैं। यानि इस समय देखा जाये तो वेटिकन चर्च पृथ्वी पर सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है, जो गरीबों की देखभाल करने का दावा करता है बीमारों को ठीक करते हैं। एक पल को इस संस्था का यह कार्य देखकर मन में चर्च की महानता का ख्याल आते ही दूसरी तरफ चर्च के कुकृत्य सामने खड़े होने लगते है। साल 2010 न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक खबर के अनुसार 90 के दौर में एक मामला पादरी लॉरेंस मर्फी को लेकर उठा था। पादरी पर आरोप था कि उन्होंने 230 ऐसे बच्चों का यौन शोषण किया जो मूक बधिर थे। मामला अखबारों में उठने के बावजूद भी पोप की बेशर्मी देखिये कि वर्तमान पोप ने इस मामले पर कोई कदम नहीं उठाया था।

ऐसा माना जाता रहा है कि जब मनुष्य का मन भोग.विलास से भर उठता है तो वह अध्यात्म की और मुड़ता है। भारत देश में बहुत सारे उदहारण सुनने देखने को मिलते है। परन्तु ईसाई समुदाय के अन्दर चर्चों के पादरियों को झांककर देखे तो लगता है जैसे इनके जीवन का उद्देश्य प्रार्थना उपासना के बजाय सिर्फ यौन शोषण ही रह गया हो। केवल यूरोप ही नहीं भारत में हर महीने पादरियों द्वारा किये जा रहे कान्वेंट स्कूलों में बच्चों और नन के शोषण की घटनाएँ आम हो चुकी है। इसके अलावा आस्ट्रलिया भी इन शिकारी पादरियों के चंगुल से अछूता नहीं है। ऑस्ट्रेलिया में धार्मिक और गैर धार्मिक जगहों पर होने वाले यौन शोषण की जांच करने की सबसे शीर्ष संस्था रॉयल कमीशन के अनुसार यौन शोषण की पीड़ितों की कहानियां काफी अवसाद भरी हैं। जिसमें बच्चों की उपेक्षा की गई, उन्हें सजा भी दी गई, आरोपों की जांच नहीं हुई, नतीजन पादरी और आसानी से बच गए। संस्था के अनुसार 1980 से 2015 के बीच ऑस्ट्रेलिया के 1000 कैथोलिक इंस्टीट्यूशनों में 4,444 बच्चों का यौन उत्पीड़न हुआ. इन बच्चों की औसत आयु लड़कियों के लिए 10.5 साल रही है, वहीं लड़कों की 11.5 साल। बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों पर नजर रखने वाली रॉयल कमीशन के पास 1980 से 2015 के बीच करीब 4,500 लोगों ने यौन शोषण होने की शिकायत दर्ज कराई थी।

भले ही आज पोप फ्रंसिस दावा कर रहे हो कि लम्पट पादरियों के सभी कारनामें सार्वजनिक किये जायेंगे लेकिन यह अभी अविश्वसनीय है, वर्षों से दबाएँ जा रहे सभी गुनाहों की जांच जब सामने आएगी तो वेटिकन में हिमस्खलन पैदा होगा। क्योंकि इन लम्पट पादरियों के लिए एक बड़ा अपराध आयोग बनाना पड़ेगा जो वेटिकन के चेहरे से मासूमियत का खोल उतार फेंकेगा।

लेख-राजीव चौधरी 

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