drunken new year

कैसा हो नव वर्ष हमारा

Dec 29 • Samaj and the Society • 1790 Views • No Comments

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अभी हाल ही में एक खबर आई कि क्रिसमस व नए साल के जश्न में सराबोर कुछ युवक गाजियाबाद की सडकों पर हुडदंग करते हुए पकडे गए। बताया गया कि पकडे गए सभी युवक अच्छे घरों से सम्बन्ध रखते हैं। बारहवीं कक्षा से लेकर एम बी ए डिग्री धारी 22 से 25 वर्ष के ये छात्र शराब के नशे में धुत्त होकर सडक पर बेहद खतरनाक स्टंटबाजी कर राहगीरों की जान को तो जोखिम में डाल ही रहे थे साथ ही तेज आवाज में संगीत बजा कर युवतियों पर फ़ब्तियां भी कस रहे थे। अंग्रेजी कलेंडर के प्रथम दिवस यानि एकजनवरी के आने के एक सप्ताह पहले ही क्रिसमस व नए साल के आगमन की तैयारियों का जोश चारों ओर नजर आने लगता है। इस जोश में अधिकतर लोग अपना होश भी खो बैठते हैं। करोडों रुपए नव वर्ष की तैयारियों में लगा दिए जाते हैं। होटल, रेस्तरॉ, पब इत्यादि अपने-अपने ढंग से इसके आगमन की तैयारियां करने लगते हैं। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के बैनर, होर्डिंग, पोस्टर व कार्डों के साथ दारू की दुकानों की भी खूब चांदी कटने लगती है। कहीं कहीं तो जाम से जाम इतने टकराते हैं कि मनुष्य मनुष्यों से तथा गाड़ियां गाडियों से भिडने लगती हैं और घटनाऐं दुर्घटनाओं में बदलने में देर नहीं लगती। रात-रात भर जागकर नया साल मनाने से ऐसा प्रतीत होता है मानो सारी खुशियां एक साथ आज ही मिल जायेंगी। हम भारतीय भी पश्चिमी अंधानुकरण में इतने सराबोर हो जाते हैं कि उचित अनुचित का बोध त्याग अपनी सभी सांस्कृतिक मर्यादाओं को तिलान्जलि दे बैठते हैं। पता ही नहीं लगता कि कौन अपना है और कौन पराया। क्या यही है हमारी संस्कृति या त्योहार मनाने की परम्परा।

जिस प्रकार ईस्वी सम्वत् का सम्बन्ध ईसा जगत से है उसी प्रकार हिजरी सम्वत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हजरत मुहम्मद साहब से है। किन्तु भारतीय काल गणना के प्रमुख स्तंभ “विक्रमी सम्वत्” का सम्बन्ध किसी भी धर्म से न हो कर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत व ब्रह्माण्ड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है। इतना ही नहीं, ब्रह्माण्ड के सबसे पुरातन ग्रंथ वेदों में भी इसका वर्णन है। नव संवत् यानि संवत्सरों का वर्णन यजुर्वेद के 27वें व 30वें अध्याय के मंत्र क्रमांक क्रमश: 45 व 15 में विस्तार से दिया गया है। विश्व में सौर मण्डल के ग्रहों व नक्षत्रों की चाल व निरन्तर बदलती उनकी स्थिति पर ही हमारे दिन, महीने, साल और उनके सूक्ष्मतम भाग आधारित होते हैं।

इसी वैज्ञानिक आधार के कारण ही पाश्चात्य देशों के अंधानुकरण के बावजूद, चाहे बच्चे के गर्भाधान की बात हो, जन्म की बात हो, नामकरण की बात हो, गृह प्रवेश या व्यापार प्रारम्भ करने की बात हो, सभी में हम एक कुशल पंडित के पास जाकर शुभ लग्न व मुहूर्त पूछते हैं। और तो और, देश के बडे से बडे राजनेता भी सत्तासीन होने के लिए सबसे पहले एक अच्छे मुहूर्त का इंतजार करते हैं जो कि विशुद्ध रूप से विक्रमी संवत् के पंचांग पर आधारित होता है न कि अंग्रेजी कलेण्डर पर। भारतीय मान्यतानुसार कोई भी काम यदि शुभ मुहूर्त में प्रारम्भ किया जाये तो उसकी सफलता में चार चांद लग जाते हैं। वैसे भी भारतीय संस्कृति श्रेष्ठता की उपासक है। जो प्रसंग समाज में हर्ष व उल्लास जगाते हुए एक सही दिशा प्रदान करते हैं उन सभी को हम उत्सव के रूप में मनाते हैं। राष्ट्र के स्वाभिमान व देश प्रेम को जगाने वाले अनेक प्रसंग चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से जुडे हुए हैं। यह वह दिन है जिस दिन से भारतीय नव वर्ष प्रारम्भ होता है। यह सामान्यत: अंग्रेजी कलेण्डर के मार्च या अप्रेल माह में पडता है। इसके अलावा जापान फ़्रांस, थाईलेण्ड, इत्यादि अनेक देशों के नव वर्ष भी इसी दौरान पडते हैं। इनके अलावा चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन के सूर्योदय से ब्रह्मा जी ने जगत की रचना प्रारंभ की। भगवान श्री राम, चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य व धर्म राज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था। शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात्, नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। आर्य समाज स्थापना दिवस, सिख परंपरा के द्वितीय गुरू अंगददेव, संत झूलेलाल व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डा0 केशव राव बलीराम हैडगेवार का जन्म भी वर्ष प्रतिपदा के दिन ही हुआ था।

यदि हम इस दिन के प्राकृतिक महत्व की बात करें तो  वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष-प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है। फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसर इस दिन नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये शुभ मुहूर्त होता है।

क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिससे राष्ट्र प्रेम जाग सके, स्वाभिमान जाग सके या श्रेष्ठ होने का भाव जाग सके ? मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति का ही नतीजा है कि आज हमने न सिर्फ़ अंग्रेजी बोलने में हिन्दी से ज्यादा गर्व महसूस किया बल्कि अपने प्यारे भारत का नाम संविधान में “इंडिया दैट इज भारत” तक रख दिया। इसके पीछे यही धारणा थी कि भारत को भूल कर इंडिया को याद रखो क्योंकि यदि भारत को याद रखोगे तो भरत याद आएंगे, शकुन्तला व दुष्यन्त याद आएंगे, हस्तिना पुर व उसकी प्राचीन सभ्यता और परम्परा याद आएगी।

राष्ट्रीय चेतना के ऋषि स्वामी विवेकानन्द ने कहा था – “यदि हमें गौरव से जीने का भाव जगाना है, अपने अन्तर्मन में राष्ट्र भक्ति के बीज को पल्लवित करना है तो राष्ट्रीय तिथियों का आश्रय लेना होगा। गुलाम बनाए रखने वाले परकीयों की दिनांकों पर आश्रित रहने वाला अपना आत्म गौरव खो बैठता है”।

इसी प्रकार महात्मा गांधी ने 1944  की हरिजन पत्रिका में लिखा था ‘‘ स्वराज्य का अर्थ है – स्व-संस्कृति, स्वधर्म एवं स्व-परम्पराओं का हृदय से निर्वाह करना। पराया धन और पराई परम्परा को अपनाने वाला व्यक्ति न ईमानदार होता है न आस्थावान”।

आवश्यक है कि हम अपने नव वर्ष का उल्लास के साथ स्वागत करें न कि अर्ध रात्रि तक मद्यपान कर हंगामा करते हुए, नाइटक्लबों में अपना जीवन गुजारें। यदि इस तरह का जीवन जीते हुए हम लोग उन्मत्त होकर अपने ही स्वास्थ्य, धन-बल और आयु का विनाश करते हुए नव वर्ष के स्वागत का उपक्रम करेंगे, तो यह न केवल स्वयं के लिए बल्कि, अपनी भावी पीढ़ी के लिए भी घातक होगा।

नया वर्ष सूरज की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है। नववर्ष के ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से घर में सुगंधित वातावरण कर दिया जाता है। घर को भगवा ध्वज, पताका और तोरण से सजाया जाता है। कहा गया है कि जो लोग उदीप्यमान सूर्य को अर्घ देते हुए प्रार्थना करते हैं, जो सूर्योदय की पावन वेला में अग्नि में आहूति देकर यज्ञ करते हैं अर्थात जो सूर्य की उपासना करके पुरूषार्थ का आरंभ करते हैं, वे जीवन में समृद्धि के उपभोक्ता होते हैं। सूर्य आराधना, पितृ आराधना और देव आराधना के बाद अपने माता-पिता, संतों, आचार्यो व बडों को प्रणाम करना चाहिए। इसके उपरान्त ब्राह्मण, कन्या, गाय,कौआ और कुत्ते को भोजन कराए जाने की परिपाटी भी है। फिर सभी एक-दूसरे को नववर्ष की बधाई देते हैं, एक दूसरे को तिलक लगाते हैं और मिठाइयाँ बाँटते हैं। नए शुभ संकल्प भी लिए जाते हैं।

हम नववर्ष के दिन कुछ ऐसे कार्य कर सकते हैं, जिनसे समाज में सुख, शान्ति, पारस्परिक प्रेम तथा एकता के भाव उत्पन्न हों। जैसे हम गरीबों और रोगग्रस्त व्यक्तियों की सहायता करने, वातावरण को प्रदूषण से मुक्त रखने, वृक्षारोपण करने, समाज में प्यार और विश्वासबढ़ाने, शिक्षा का प्रसार करने तथा सामाजिक कुरीतियां दूर करने जैसे कार्यों के लिए संकल्प ले सकते हैं और पहल कर सकते हैं।

आइये! विदेशी दासत्व को त्याग स्वदेशी अपनाऐं और गर्व के साथ भारतीय नव वर्ष यानि विक्रमी संवत् को ही मनायें तथा इसका अधिक से अधिक प्रचार करें।

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