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कबीर किसके दास किसके परमेश्वर..?

Nov 22 • Arya Samaj • 72 Views • No Comments

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20 नवम्बर को भारत की सोशल मीडिया पर “भगवान कौन” नाम से एक ट्रेंड चल पड़ा। इस ट्रेंड में सबसे ज्यादा भक्त जेल में सजा काट रहे कथित संत रामपाल के बताये गये। वेदों का नाम लेकर सभी भक्त भ्रामक पोस्ट डाल रहे थे कि वेदों में साफ-साफ लिखा है “उस पूर्ण परमात्मा का नाम कबीर है और कबीर साहेब भी कहते है कि वेद मेरा भेद है लेकिन मुझे पाने की विधि वेदों में नहीं है उसके लिए गीता में लिखा है कि तत्वदर्शी संत रामपाल ही उस परमात्मा को पाने की राह बतायेगा”

कबीर या ईश्वर के कथित अवतार रामपाल के बारे में शायद ही कोई ऐसा हो जिसनें सुना न हो। कुछ की नजरों में वह आज भी संत है तो बड़ी संख्या में लोग उसे एक अपराधी के तौर पर जानते है। साल 2006 से 2008 के बीच वह जेल में रहा। बाद में बेल पर बाहर आ गया 2008 से 2010 के बीच सुनवाई में अदालत भी आता रहा लेकिन 2010 से 2014 के बीच पेश ही नहीं हुआ। आखिर 17 नवम्बर 2017 को कोर्ट ने उन्हें सजा सुना दी। कहा जाता है कोर्ट के फैसले वक्त जितने सैनिक चीन सीमा के पास डोकलाम में तैनात थे, उससे कहीं ज्यादा सैनिक हरियाणा पंजाब में उत्पात मचाने को आतुर रामपाल के भक्तों के लिए तैनात किए गये थे।

भक्तो को भी क्या कहा जाये यथा गुरु तथा चेले। देखा जाये तो भारत भूमि धर्म और यज्ञ की भूमि है। समय-समय पर ऋषि मुनियों महर्षियों ने जन्म लिया, जनसमुदाय को धर्म का ज्ञान दिया समाज में रहने, ईश्वर की भक्ति और मुक्ति का मार्ग बताया। लेकिन इसमें भी कोई दोराय नहीं है कि यहाँ समय-समय विधर्मी और धर्म मार्ग से भटकाने वाले लोग भी जन्म लेते रहे है। वह जमाना लुप्त हो गया जब ऋषि-मुनि,साधू सन्यासी घर-घर घूम कर लोगो को धर्म की शिक्षा देते थे। अचानक दुनिया में बड़ा बदलाव आया देश आधुनिक हुआ और इस आधुनिक काल का लाभ उठाया आधुनिक बाबाओ ने। कोई इच्छाधारी बाबा सामने आया तो कोई कंप्यूटर बाबा कोई तिलकधारी बाबा बना तो कोई निर्मल बाबा। कोई दयालु बाबा बना तो कोई कृपालु बाबा।

बाबाओं की इस आधुनिक फौज का एक हिस्सा बना संत रामपाल। जिसनें कबीर को भगवान बनाया और खुद को उसका अवतार। चूँकि जैसा कि कबीर दास की जाति हिंदी साहित्य में जुलाहा पढाई जाती है तो इस कारण बहुत से लोग जातिगत रूप से कबीर से आस्था रखते थे। उन्हें अचानक एक ऐसा हाईप्रोफाइल बाबा मिला तो उनका मत मजबूत हुआ कि देखों हम ही नहीं इतना बड़ा बाबा भी कबीर को परमेश्वर मान रहा है। भक्तो की संख्या बढ़ी तो हरियाणा के करौंथा गाँव में एक सतलोक आश्रम का निर्माण भी कर दिया गया।

संख्या में इजाफा हुआ तो धीरे धीरे कबीर ईश्वर और रामपाल स्वयम्भू जगतगुरू बन गया। किन्तु जगतगुरू की अज्ञानता की हालत यह है कि उन्हें अपने गुरू का पूरा नाम और उसका अर्थ भी नहीं पता। क्योंकि कबीर का   अरबी भाषा में अर्थ है बड़ा। और दास को हिंदी भाषा में गुलाम या सेवक कहा जाता है। इस कारण कबीर दास के नाम का अर्थ हुआ, ‘बड़े का दास‘ अर्थात ईश्वर का दास। जो कबीर दास अपने दोहों में ख़ुद को जिंदगी भर ईश्वर का दास बताते रहे और लोगों ने उन्हें परमेश्वर घोषित कर दिया। रामपाल और उसके अंधभक्त भी यही कर रहे हैं। जबकि कबीर दास खुद अपने दोहे में ईश्वर से प्रार्थना कर रहे है कि ईश्वर इतना दीजिये जा मे कुटुम समाय. मैं भी भूखा न रहूं साधु भी भूखा न जाय। अब जिन्हें अपने गुरू के ही पूरे नाम का पता न हो,  उन्हें ईश्वर वेद और उसकी भक्ति का क्या पता होगा आप खुद समझ सकते है।

कबीर दास एक दूसरे दोहे में मर्यादा पुरुषोत्तम रामचन्द्र जी का नाम लेते हुए कहते है कि कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाउँ। गलै राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित जाऊँ। मतलब राम के सामने कबीर दास जी अपनी हैसियत बताते हुए कहते हैं कि मेरे गले में राम की रस्सी बंधी है। वह जिधर खींचता है, मुझे उधर ही जाना पड़ता है अर्थात अपने ऊपर मेरा स्वयं का अधिकार नहीं है बल्कि राम का है। लेकिन कबीर दास जी के इस दोहे के विपरीत रामपाल उसे ही परमेश्वर बनाने पर उतारू है।

देखा जाये तो भारत धर्म प्रधान देश है सदियों पहले देश के लोग सीधे सादे थे तब के साधू संत भी सीधे सादे और साधारण हुआ करते थे। आज के दौर में जब देश तरक्की कर रहा है, देश में माध्यम वर्ग का तेजी से फैलाव हो रहा है ऐसे में शोपिंग मॉल संस्कृति के तरह बाबा संस्कृति का भी तेजी से विकास हुआ और धडाधड एक के बाद एक बाबा बाजार में आये और धर्म को दुकान बना डाला।

कोई स्वघोषित ईश्वर का अवतार बन गया तो कोई समोसा खिलाकर भाग्य बदलने लगा। जब बाबाओं की कमाई और साम्राज्य देखें तो अन्य मजहबों के लोग भी हिन्दुओं की अज्ञानता का लाभ लेने दौड़ पड़े। कौन भुला होगा वो खबर जब यौन शोषण में गिरप्तार हुए आशु महाराज का असली नाम आशिफ खान निकला था।  लेकिन भक्त इतने अंधे होते है कि सच जानने के बावजूद भी इनकी आस्था इनसे नहीं डिगती। इस का नतीजा है कि यहाँ बाबा बनने बड़ा आसान मार्ग बन गया है। धर्म की शिक्षा व योग्यता या ज्ञान का भक्तो को यहाँ कोई मतलब नहीं, ये सब तुच्छ चीजे है। बाबा जितना बड़ा अज्ञानी होगा, भक्त उतना ही ज्यादा उसके दरबार में चढ़ावा चढ़ाकर झूमेंगे। तत्पश्चात टी.वी. चैनलों का निमंत्रण मिलने लगता है चैनल पर आने के बाद इनकी प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। दुसरे चैनल वाले इन्हें अपनी टी.आर.पी बढ़ाने के लिए बुलाने लग जाते है। देखते ही देखते एक सामान्य सा इन्सान किसी को परमेश्वर बना देता है या उसका अवतार बन जाता है। लोग उसके सामने शीश झुका अपने मूल धर्म और शिक्षा को भूल जाते है।

लेख-राजीव चौधरी 

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