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बगदादी मीडिया के लिए आतंकी या संत महात्मा..?

Nov 7 • Samaj and the Society • 27 Views • No Comments

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दुनिया के सबसे बड़े आतंकी संगठन का सरगना जिसने इंसानियत और मानवता को शर्मसार किया हो, जिसने मजहब के नाम पर लाखों जाने ली हो, आखिरकार वह मारा गया। आपके और मेरे लिए शायद ये राहत की बात होगी लेकिन ये खबर सुनकर दुनिया भर के वामपंथी मीडिया की साँसे अटक गई। पूरी दुनिया में दहशत फैलाने और लाखों लोगों की हत्या करने वाले आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) के बारे में जो लोग जानते हैं वह बगदादी के मारे जाने का मतलब समझ सकते हैं। अबू-बकर अल-बगदादी जिसे बगदादी के नाम से पहचाना गया, उसका खात्मा हो गया है। जब भारत में दीपावली मनायी जा रही थी ठीक उसी समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्वीट कर बताया कि कुछ बहुत बड़ा हुआ है। यह ह्वाइट हाउस के लिए वास्तव में किसी बड़ी खबर का संकेत था। जहां खुद ट्रंप भी दीपावली उत्सव में शरीक हुए थे। अमेरिकी राष्ट्रपति ने बाद में बगदादी के मारे जाने का दावा किया था।

बगदादी कितना खतरनाक था इसे अमेरिकी राष्ट्रपति के शब्दों से समझा जा सकता है उन्होंने लिखा कि दुनिया के सबसे हिंसक और क्रूर संगठन का चीफ मारा गया। लेकिन जब इसी खबर लेकर दुनिया भर की मीडिया सामने आई तो उनके शीर्षक देखकर ऐसा लगा जैसे बगदादी कोई आतंकी नहीं बल्कि कोई संत रहा हो, दुनिया के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में शुमार वाशिंगटन पोस्ट ने लिखा कि “इस्लामिक स्टेट के शीर्ष धार्मिक विद्वान बगदादी की 48 साल की उम्र में मौत” जैसे ही इस शीर्षक को लेकर बवाल मचा तो अखबार की तरफ से इस खबर की हेडलाइन बदल दी गई।

वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक आईएस का आतंकवादी उसका मुखिया एक धर्मिक विद्वान था। अब जिसने भी यह खबर पढ़ी होगी उसे क्या सोचा होगा! शायद यही कि दुनिया में प्रेम और शांति के किसी मसीहा की मौत हो गयी हैं। कितने लोग खबर की तह तक गये होंगे? जबकि मीडिया के लोग सुनयोजित तरीके से एक ऐसे इंसान का महिमामंडन कर रहे थे जिसने सालों तक दुनिया में दहशत का माहौल बनाए रखा, जिसने हजारों लोगों को विस्थापित कर दिया, मासूम छोटी यजीदी बच्चियों को हजारों की संख्या में यौनदासी बनाया और ना जाने कितने मासूमों की जान ले ली, वो भी सिर्फ मजहब के नाम पर?

देखा जाये तो इस लिस्ट में वाशिंगटन पोस्ट ही शामिल नहीं है बहुत सारे मीडिया समूह है जो चाह कर भी अपने मन का शोक छुपा नहीं पा रहे है। दुनिया को इस आतंकी संगठन के बारे में आगाह करने कि जगह बीबीसी हमेशा से ही लोगों को भ्रमित करने वाली खबरे ही प्रकाशित करता रहा है। लगता है ये मीडिया संस्थान कभी भी बगदादी को आतंकवादी मानते ही नहीं थे। हमेशा इन्होने अपनी खबरों और लेखों में उसे लीडर कह कर संबोधित किया है, बीबीसी ने अपने सभी आर्टिकल में बगदादी को इतना सम्मान दिया है मानो वो कोई संत या महात्मा हो। बगदादी को मारे हुए अभी कुछ ही दिन गुजरे है एक बड़े चैनल तो इस्लामिक स्टेट्स का नया सरगना तलाशना भी शुरू कर दिया। इन्हें इस बात की चिंता सता रही है की कहीं इस संगठन के आतंकी अब अनाथ न हो जाए।

बीबीसी अपने लेख में लिखता है, “बगदादी ‘कथित‘ इस्लामिक स्टेट के ‘मुखिया थे, बगदादी का परिवार धर्मनिष्ठ था, बगदादी कंठस्थ करने के लिए जाने जाते थे। वह रिश्तेदारों को सतर्क नजर से देखते थे कि इस्लामिक कानून का पालन हो रहा है या नहीं। वो क़ैदियों को इस्लाम की शिक्षा देते थे बगदादी फुटबॉल क्लब के स्टार थे।” ऐसे लेख शायद बीबीसी ने किसी महात्मा के मरने पर भी नहीं लिखे होंगे। किन्तु दूसरी तरफ यही लोग भारत के संवैधानिक पदों पर आसिन योगी आदित्यनाथ जैसे लोगों के कट्टरपंथी लिखते है। यानि एक आतंकवादी संगठन के मुखिया को इतनी इज्जत और एक किसी देश के प्रधानमन्त्री या मुख्यमंत्री के लिए मिलिटेंट और कट्टर हिन्दू जैसे शब्द, ये काम सिर्फ वाशिंगटन पोस्ट और बीबीसी जैसे संस्थान ही कर सकते हैं।

मामला यही तक नहीं बल्कि भारत का एक प्रतिष्ठित न्यूज चैनल को बगदादी में एक महान फुटबॉल प्लेयर नजर आ गया, इनके अलावा हमारे देश की कथित सेकुलर मीडिया और नेताओं का बगदादी के मारे जाने पर कोई बयान नहीं आया। लगता है ये लोग अभी उस सदमे से उबर नहीं पाए हैं। यह सब आज ही नहीं हुआ याद कीजिए बुरहान वानी के बाद किस तरह उसे भी महिमामंडित किया था। भारत की एक बड़ी पत्रकार बरखादत्त ने लिखा था कि एक स्कूल हेडमास्टर का बेटा बुरहान मर गया। जहाँ देश की आम जनता ने एक आतंकी के मारे जाने पर राहत की सांस ली थी वही वामपंथी मीडिया के एक बड़े वर्ग ने तुरन्त ही बुरहान को रुमानियत का लिहाफ ओढ़ाना शुरू कर दिया था।

देश की जनता का ध्यान इस्लामिक कट्टरवाद और आतंकवाद से हटाने के लिए, बुरहान को पोस्टर बॉय से लेकर भगत सिंह तक की उपमाओं से नवाजने की घृणित कोशिशें होने लगी हैं। यह बात आम लोगों की समझ से परे की है कि आखिर ऐसी क्या वजह है कि दुनिया का एक तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग एक घोषित आतंकी के प्रति सहानभूति रखता हुआ दिख रहा है। दरअसल आतंकवादियों को शहादत  जैसे शब्द का जामा पहना कर और मानवतावाद के तराजू में तौल कर,  हर जगह संप्रभु राष्ट्रों की खिल्ली उड़ाई जा रही है।  क्योंकि आज  वामपंथ को अपना अस्तित्व समाप्त हो जाने का डर है। डरे हुए वामपंथी किसी भी तरह से दुनिया से लोकतंत्र को असफल और अस्थिर करने की फिराक में इस्लामिक आतंकवाद से हाथ मिलाने को तैयार दिख रहे हैं। क्योंकि दोनों ही विचारधाराएँ साम्राज्यवादी अवधारणा में विश्वास रखती है। इसलिए वर्तमान वामपंथ और सक्रिय इस्लाम आपको एक ही कोने में बैठे दिख रहे है।

 राजीव चौधरी

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